आज की दुनिया की हक़ीक़त_एक मरा हुआ आदमी, एक ज़िंदा आदमी को मार रहा है!

आज की दुनिया की हक़ीक़त_एक मरा हुआ आदमी, एक ज़िंदा आदमी को मार रहा है!

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RP विशाल
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एक मरा हुआ आदमी
एक ज़िंदा आदमी को मार रहा है।
चीख़ रहे हैं दोनों ही-
एक मारने की उत्तेजना में
दूसरा मरने के ख़ौफ़ में।
वह आदमी जो मार रहा है
पहले ही अपने को मार चुका है।
और उसके माथे पर सवार है भूत
कि पूरी दुनिया को मरघट होना चाहिए
कि मरी हुई दुनिया ,
उसके जैसे ही मरे हुए लोगों की दुनिया होनी चाहिए ।
वह बड़े इत्मिनान से , ठंडे दिमाग से
मौत के कृत्य की ‘ जीवंत तस्वीरें ‘ उतार रहा है
क्योंकि उसे यकीन है कि
इस बेशुमार भीड़-भाड़ वाली दुनिया में
अकेले- थकेले कमज़ोर पड़े लोग
निरीह , मुर्दा चुप्पी के साथ जीने के आदी हो चुके हैं ।
कि ज़िंदगी मरघटों के बीच से
इत्मिनान से घसीटी जा सकती है।
वह आदमी जो मर रहा है ,
सिर्फ़ चिल्ला सकता है –
इस आशा में कि शायद उसकी चिल्लाहट को
किसी आवाज़ का साथ मिल जाए
कि शायद सुन ली जाए उसकी चीख़
और कि शायद बच जाए वह , वह –
जिसे पता ही नहीं है
कि क्यों की जा रही है उसकी हत्या !
झिटक लिए गए
अपने ही मुर्दा संचित श्रम की गिरफ़्त में फँसी
गर्दनों की छटपटाहटें मानो बस इंतज़ार कर रही हैं
एक विशाल मुर्दाघर में उठाकर फेंक दिए जाने का….!
सजाए गए हैं मरघट
मरघट के चारों कोने
लहरा रहे हैं विशाल पताके
कहीं काले , कहीं केशरिया , कहीं सफ़ेद
तो कहीं जमे हुए ख़ून की तरह बैंगनी-नीले ।
चल रहे हैं जीवन की निःसारता के प्रवचन ।
‘अधर्म का नाश हो , धर्म की जय हो ‘
के उदघोष के साथ गाड़ी जा रहीं हैं
तमाम किस्म की अभिमंत्रित नुकीली कीलें
अस्लाह जैसे कि लपलपाती जहरीली जीभ
बारूद , खंज़र और तलवार ।
कई खंज़र आर-पार हैं उनके खुद के माथे के
और एक छुरी ह्रदय के पार ।
सिर्फ ख़ून और बस ख़ून बक रहे हैं लोग
लाउडस्पीकरों से – सुबह , दोपहर , शाम ।
और इस तरह तमाम मरे हुए लोग
तमाम ज़िंदा लोगों को घेरे खड़े हैं
मरने- मारने के अनुष्ठान में
मरने – मारने पर तुले अड़े हैं…..
दुनिया सोच में पड़ी है
इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में
कैसी अजीबो-गरीब मोड़ पर खड़ी है ,
जहाँ हत्यारों के हुजूम का सामना करो
या नहीं तो मरो !
यह वाकई निर्णायक घड़ी है –
जब एक मरा हुआ आदमी
एक ज़िंदा आदमी को मार रहा हैl

आज की दुनिया की हकिकत।।