#इस्लामी अर्थव्यवस्था_ग़रीबी की समस्या का पुख़्ता और एकमात्र हल!

#इस्लामी अर्थव्यवस्था_ग़रीबी की समस्या का पुख़्ता और एकमात्र हल!

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अल्लाह سبحانه وتعالى फरमाता है :

كُنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ

“तुम खैर उम्मत हो, तो इंसानो के लिए पैदा की गई है। क्योंकि नेक काम करने का हुक्म देते हो और बुरे कामों से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो”.

अल्लाह سبحانه وتعالى ने हमे खुसुसी मुकाम अता फरमाया है, बेहतरीन उम्मत करार दिया क्योंकि हम बुराई से रोकते है और अच्छाई का हुक्म देते है यानी अम्र बिल मारूफ और नहीं अनिल मुन्कर करते है। हमे अहसास होना चाहिए के ये हमारी ज़िम्मेदारी है के हम तमाम बुराई और ज़ुल्म के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलन्द करे। आलमी सतह पर उन तमाम बुराईयों में, जिन्हे हम आज देख रहे है, से एक बुराई इक्तियादी ज़ुल्म (आर्थिक अत्याचार) और जब्रियत है जो इस वक्त दुनिया में सरमायादाराना (Capitalist /पूंजीवादी) आर्थिक व्यवस्था की वजह से है।

हालिया आर्थिक संकट (economic crisis) ने पश्चिमी दुनिया में भरोसे को बुरी तरह हिला दिया है और आज़ाद बाज़ार (free market) की पोल खोल कर रख दी है। फिर भी पश्चिमी दुनिया जब इसका मुतबादिल (विकल्प) तलाष करती है तो उसे सिर्फ समाजवाद (socialism) नजर आता है या फिर आर्थिक व्यवस्था मंल हुकूमत की कुछ हद तक दखल अन्दाज़ी। और यही वजह है के आजाद बाज़ार (free Market) में यकीन रखने वालो ने ज़्यादा से ज़्यादा सरकार की तरफ से नियमितता (Regulation), पार्दरशिता (transparency) या फिर उपरी परिवर्तन यानी सरमायादाराना निज़ाम (पूंजीवादी व्यवस्था) में कुछ रद्दो-बदल या मरम्मत का सिलसिला जारी रखा। एक बार एक इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था) (economics/ अर्थशास्त्र ) के प्रोफेसर से गुफ्तगु मे उनके सामने सरमायादाराना निज़ाम (पूंजीवादी व्यवस्था) की खामियां बयान की गई। काफी बहस के बाद उन्होंने मायूसाना अंदाज में कहा के सरमायादाराना निज़ाम (पूंजीवादी व्यवस्था) बदतरीन व्यवस्थाओं मे सबसे बेहतर है। फिर उनके इस्लामी आर्थिक व्यवस्था को एक विकल्प के तौर पर बयान किया तो उन्होने कहा के उन्होंने कभी इस्लाम को एक विकल्प के तौर पर समझा ही नहीं और न ही कभी इसका मुताअला किया। ये मआशी बोहरान (आर्थिक संकट) मुसलमानों को एक मौका फराहम करता है ताकि वह इस्लामी निज़ामे इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था) (अर्थव्यवस्था) को एक मुतबादिल (विकल्प) के तौर पर पेश करे। हमें इस बात को महसूस करना है के जब कार्ल माक्र्स (Carl Marx) ने बर्तानिया में बैठकर 1800 इसवी में अपनी कम्यूनिज़्म की थ्योरी लिखी तब हांलाकि बहुत सोर लोगो ने इसकी मुखालिफत की, फिर भी उसे मुमकिन विकल्प (Viable alternative) के तौर पर देखा गया और यही सबब है के लेनिन ( Lenin ) ने इन अफकार (विचार) ( Ideas/ विचारों ) को लेकर एक पार्टी बनाई और फिर आखिरकार वह एक रियासत में तब्दील हो गया। और ये उस वक्त हुआ जब ये अफकार (विचार) नए थे और उनके निफाज की कोई तारीख भी मौजूद नहीं थी।

हमे ये समझना है कि बजाए उसके के माकर्स ( Marx ) ने अल्लाह के वजूद का ही इन्कार किया और उसके अफकार (विचार) कम्यूनिज़्म की नाकामी के साथ गलत साबित हो गए, हमारे पास अल्लाह (سبحانه وتعالى) की तरफ से वाजेह हक़ है और इसके साथ ही इस्लाम के एक हज़ार साल से ज़्यादा लागू होने की एक मुकम्मल तारीख (इतिहास) है। इसलिए ये हमारे लिए निहायत अहम है के हम इस्लाम को एक मुतबादिल (विकल्प) के तौर पर पेश करे और ये बहुत ज़रूरी है के इस्लामी निज़ामे इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था) (अर्थव्यवस्था) को लोगो के सामने रखे जो के इस्लामी बैकिंग ( Islamic banking ) और इस्लामी मालियात ( Islamic finance ) से कही ज़्यादा विस्तृत विषय है। इस्लामी बैंक और इस्लामी मालियात (Islamic finance) को ताल्लुक उन व्यक्तियों या गिरोहों ( Group ) से है जो मोजूदा व्यवस्था में शरीअत के नियमों को तोडना नहीं चाहते, जैसे सूद (ब्याज) वग़ैराह से बचना चाहते है और इस व्यवस्था मे रहकर फाइदा उठाना चाहते है.

इस्लामी निज़ामे इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था) (अर्थव्यवस्था) इससे कही विस्तृत विषय है और समायादारान निज़ाम (पूंजीवादी व्यवस्था) का सही मुतबादिल (विकल्प) है। हालांकि आज इस्लामी रियासत मौजूदा नहीं है, फिर भी हमारे पास इस्लामी निज़ामे इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था) (अर्थव्यवस्था) है जो के क़ुरआन व सुन्नत से अखज़ किया हुआ है ओर इसके लागू होने का एक हजार साल से ज़्यादा की तारीख मौजूद है। इसकी बुनियाद पर हमे बायां पक्ष ( Left ) और दांया पक्ष ( Right ) मे यह विचार पैदा करना चाहिये कि इस्लाम सिर्फ एक मज़हब नहीं बल्कि एक मुकम्मल जाब्ता ए हयात (जीवन व्यवस्था) है जो के मौजूदा आर्थिक संकट को हल करने की योग्यता रखता हे जिससे इस समय पूरी इन्सानियत जूंझ रही है।

इस्लामी अर्थव्यवस्था

(इस्लामी निज़ामे इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था))

बेशक इस मुख्तसर मज़मून में इस्लामी इक़्तिसाद (अर्थशास्त्र) की तफ्सीलात मे नहीं पहुंचा जा सकता लेकिन इस मे पूरी कोशिश की जायेगी के इसके अहम पहलूओ का ज़िक्र किया जाये, खास करके इस ताल्लुक से के किस तरह इस्लाम इस मौजूदा बोहरान (संकट) को हल कर सकता है। जिस तरह से एक इक़्तिसाद (अर्थशास्त्र) का विद्यार्थी अपना पहला सबक शुरू करता है, हमें आर्थिक समस्या की परिभाषा ( Defination ) से शुरू करना है जो के किसी भी अर्थव्यवस्था ( economy ) में बुनियादी हैसियत रखती है। सरमायादाराना निज़ाम (पूंजीवादी व्यवस्था) में लोग इस बात पर यकीन रखते है के इन्सान की ज़रूरते असीमित (ला महदूद) है और संसाधन (ज़रिए) सीमित है इसलिए मईशियत ( economy/अर्थशास्त्र ) का केंद्र बिन्दू पैदावार की तरफ होनी चाहिए। इसलिए इनका मानना है के पैदावार ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाई जाए ताकि लोग ज़्यादा से ज़्यादा उपभोग (इस्तिमाल) कर सके। इसे ‘Trickle down economics’ के नाम से भी जाना जाता है जिसमें निगाह इस बात पर केन्द्रित की जाती है कि रोटी का नाप ( Size ) बढ़ाई जाए ताकि किसी तरह ये भूखे लोगो के पेट तक पहुंच जाए। यही वजह है के यह GDP (Gross Domestic Product) या GNP (Gross National Product) पर अच्छा खासा ज़ोर देते है, इसलिए हमने देखा के बिजेपी (BJP½ ‘India Shining’ की बात कर रही थी जब इंणिया का GNP बढ़ गया था। हांलाकि वह ज़्यादगी पूंजीवादियों के बैंक अकाउंट्स में चली गइ और आम आदमी तक तो ये पहुंची ही नहीं।

इस्लाम दौलत की तक्सीम (बटवारे) पर तवज्जोह देता है न की सिर्फ पैदावार के बढ़ाने पर ही:
इस्लाम आर्थिक समस्या को बुनियादी तौर पर मुख्तालिफ नज़रिए से देखता है। इस्लाम पैदावार के साथ-साथ माल की तक्सीम (बंटवारे) पर भी अपना पूरा ध्यान तवज्जोह देता है। ग़रीबी की समस्या इससे हल नहीं होगी के पैदावार में इजाफा हो और उससे इस्तेफादा (फायदा) हासिल करे बल्कि ये तब हल होगी जबकि हर व्यक्ति की बुनियादी ज़रूरीयात (मौलिक आवश्यकताऐं) पूरी हो। दुनिया में हर आदमी की बुनियादी ज़रूरीयात पूरी करने के लिए काफी प्राकृतिक संसाधन मौजूद है। इस्लाम हर एक व्यक्ति के फलाह व बहबूद पर इन्फिरादी (व्यक्तिगत) तौर पर निगाह रखता है। न की पूरे राष्ट्र की इकटठी आय (income) के स्तर पर। ये हर एक व्यक्ति को इस तरह से देखता है के इसकी बुनियादी ज़रूरीयात (खाना, कपड़ा और मकान) को मुकम्मल तौर पर पूरा किया जाए। इनके बाद ही वह वक्ति की आसाइषी ज़रूरीयात (विलासिता) को पूरी करने पर तवज्जो देता है।

तमाम बुनियादी ज़रूरीयात की जमानत
अहकामे शरईया ने हर व्यक्ति (शहरी) की बुनयादी ज़रूरीयात (मौलिक आवश्यताओं) यानी रोटी, कपड़ा और मकान की ज़रूरीयात पूरी करने का ज़िम्मा दारूल इस्लाम की रियासत को बनाया है। रसूललाह (صلى الله عليه وسلم) फरमाते है : ”आदम की ओलाद को ये हक़ है कि उसके पास एक घर हो जिसमे वह रहे, एक कपड़ा जिससे वह तन ढांके, रोटी, हवा और पानी हो” (तिर्मीजी)

जो लोग अपनी ज़रूरीयात पूरी न कर सके और न ही उनके खानदान वाले उनकी ज़रूरीयात पूरी कर सके तो ऐसे लोगो के लिए ज़रूरत का सामान मुहैया कराना इस्लामी रियासत की ज़िम्मेदारी है। मशहूर खलीफा उमर बिन अब्दुल अजीज ने बसरा (ईराक) में अपने आमिलों (Amil/collector) को हुक्म दिया के शहरियों मे से ऐसे लोगो को तलाश किया जाए जो बूढे हो और कमा न कर सकते हो तो उनको बैअतुलमाल में से मुस्तकिल तौर पर वज़ीफे दिए जाए। (अबू उबैद, अल अमवाल, पेज: 507)

इस्लामी रियासत में लोगो के लिए ग़ुस्लखाने होते थे, मुसाफिरो के लिए मुसाफिर खाने होते थे। जहां वह मुफ्त मे रह सके और मतबख (रसोईघर) हुआ करते थे। मिसाल के तौर पर बोसनिया में खिलाफते उस्मानिया के दौरान रसोईघर थे जहां गरीब लोग जाकर मुफ्त में खाते थे। दुनिया का पहला सुव्यवस्थित अस्पताल काहिरा ( Cairo ) मिस्र, में 872 ईसवी में इस्लामी हुकूमत के दौरान बना। अहमद इब्ने तोलून अस्पताल में हर मरीज का ईलाज मुफ्त में किया जाता था और दवाईयां वगैराह भी मुफ्त में तक्सीम की जाती थी, इसमें मर्दो और औरतो के लिए अलग-अलग हम्माम (ग़ुस्लखाने), कुतुब खाने (लाईब्रेरी) ओर दिमागी तौर पर बिमार लोगों के लिए भी इन्तेज़ाम था। मरीज को अस्पताल में जाने के लिए अपने कपड़े वहां जमा कराने पड़ते थे और अस्पताल के लिए अलग कपड़े हुआ करते थे ताकि संक्रमण न हो। इनके लिए अलग बिस्तरो का भी माकूल इन्तेजाम था यही नहीं हर मरीज़ का अपना तिब्बी दस्तावेज़ ( record ) भी होता था।

माल की तक्सीम ( circulation ) फर्ज़ है
अल्लाह इस बात का हुक्त देता है के माल कुछ के दरमियान ही गर्दीश ( Circulate/संचारित ) न करे। अल्लाह माल का ज़िक्र करते हुए क़ुरआन में फरमाता है:

كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْأَغْنِيَاءِ مِنْكُمْ

“ताकि माले गनीमत कुछ के दरमियान न रहे”

इस्लाम ने इस बात को फर्ज़ करार दिया है के माल व दौलत तमाम शहरीयो ( Citizen ) के दरमियान गर्दिश करे और इस बात को हराम करार दिया है कि इसकी तक्सीम कुछ ही लोगो के दरमियान हो। और बाकी को नज़रअन्दाज कर दिया जाए। दौलत की जमाखोरी या एकाधिकार (hoarding and monopoly) भी हराम है। पैदावार करने वाले या दुकानदार माल की न तो जमाखोरी कर सकते है और न ही एकाधिकार ( Monopolize ) कर सकते है ताकि क़ीमते बढ़े। रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) खाने पीने के सामान की इजाराहदारी (एकाधिकार) से मना फरमाया है . इसकी बुनियाद नबी करीम (صلى الله عليه وسلم) का फरमान है, ”जिसने भी (माल की) इजारादारी (एकाधिकार) की वह गुनाहगार है।”

सूद (ब्याज) की हराम होना और सरमायाकारी ( Investment/पूंजीनिवेश ) की हौसला अफज़ाई (प्रोत्साहन):
इस्लाम ने सूद पर आधारित सभी तरह के सौदेबाज़ी/समझौतों को समाप्त करके ऐसे सौदेबाज़ी का हुक्म दिया जिसमें नफा व नुकसान ( return and risk ) की हिस्सेदारी हो। अल्लाह तआला फरमाता है :

وَأَحَلَّ اللَّهُ الْبَيْعَ وَحَرَّمَ الرِّبَا

अल्लाह ने सोदे (खरीद व फरोख्त) को हलाल किया व सूद को हराम किया। (सूरह बकरा : 552)

सूद की हुरमत (हराम होना) लोगो को इस बात के लिए आमादा करती है के वह अपना माल बैंको मे सूद के इन्तिजार में न रखे बल्कि इनके बिना उपयोगी माल पर ज़कात का हुक्म दिया। ये लोगों को इस बात की तरफ प्रोत्साहित करता है के वह सरमायाकारी (पूंजीनिवेश) करे जो आर्थिक गतिविधी ( Economic Activity ) पैदा करता है और ये बेहतर इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था) के लिए निहायत ज़रूरी अमल हैं. ज़्यादा पूंजीनिवेश ( investment ) से ज़्यादा काम-धन्धा पैदा होता हैं। लोगो को ज़्यादा से ज़्यादा रोज़गार मिलता है और माल का ज़्यादा से ज़्यादा बटवारा होता है।

क़र्ज़ और सूद के तसव्वुर को भी मुख्तसरन बयान कर दिया जाये। लोग सूद के शोषण करने मिजाज को महसूस नहीं करते। इस्लाम में क़र्ज़ अखलाकी बुनियाद पर दिए जाते है ताकि अल्लाह की तरफ से जज़ा हासिल हो सके। नबी करीम (صلى الله عليه وسلم) फरमाते है : “हर कर्जा एक सदक़ा है।”

सरमायादाराना निज़ाम (पूंजीवादी व्यवस्था) में जो क़र्ज़ देता है वह नफा में तो शिरकत करता है लेकिन नुकसान में हिस्सेदार नहीं होता। ये एक किस्म की नाइन्साफी और ज़ुल्म है। इस्लाम का हुक्म है के अगर आप मुनाफे में शिरकत करना चाहते है तो आपको नुकसान भी सहना पड़ेगा और यही इस्लाम में शिरकतदारी ( Partnership ) और कम्पनी के ढांचे की बुनियाद हैं। जैसे की मुज़ारबा की साझेदारी है जिसमें कोई शख्स सरमायाकारी (पूंजीनिवेश) करता है और दूसरा शख्स अपनी सेवा (काम) देता है और दोनो नफा व नुकसान को बर्दाष्त करते है। इस्लाम का निज़ाम बराबरी का नमूना पेश करता है, जिसमें दोनों शरीक नुकसान बर्दाष्त करते है और मुनाफा भी। जबकि सूदी निज़ाम ज़ुल्म व इस्तेहसाल (शोषण) का अलमबरदार है।

आज के दौर में सूद पर मबनी क़र्ज़ ने सारी क़ौमों को अपने षिकंजे में ले रखा है। हजरत अली (رضي الله عنه) दोरे जाहिलीयत यानी इस्लाम के कब्ल (पहले) के दौर की तरफ ईशारा करते हुए फरमाते है, ”हमने लोहे की मार बर्दाष्त की, पत्थरो की और कोड़ो की भी लेकिन हम क़र्ज़ का बोझ नहीं उठा पाए।” (दोरे जाहिलीयत में अरब में सूदी निज़ाम था)

इस्लामी अर्थव्यवस्था एक वास्तविक अर्थव्यवस्था ( real economy ) है और इस्लाम मौजूदा सूद पर आधारित सरमाया के बाजारो ( Financial market/ वित्तीय बाज़ारो ) को रोकता है
इस्लामी मईशत (अर्थव्यवस्था) की बुनियाद ऐसे माल के पैदावार से है जहां साझेदार (partners) सरमायाकारी ( Investment/पूंजीनिवेश ) करते है, रोज़गार पैदा करते है और एक वास्तविक अर्थव्यवस्था के मुताबिक तिजारत करते है। इस्लाम में दोहरी मईशीयत ( Dual economy ) नहीं होती, जहां पर वास्तविक अर्थव्यवस्था अपने साथ वित्तीय विभाग ( Financial sector/ सरमायाकारी वाले शोबे ) को साथ-साथ लेकर चलाती है। बल्कि इस्लामी मईशत (अर्थव्यवस्था) सभी शिराकतदारो को मद्देनजर रखत हुए वास्तविक अर्थव्यवस्था पर तवज्जो देती है और ये रोज़गार, मुनाफा, ज़मीन का इस्तेमाल, पैदावार ( Manufacturing ) के सबब मुमकिन होती है, और दौलत एक ही शोबे (विभाग) पैदा होता है। इससे माल का फाइदा एक ही शोबे ( Sector ) में तक्सीम होता है – वास्तविक अर्थव्यवस्था मे – जिसमें के हर व्यक्ति शामिल हो सकता है।

इस्लाम मौजूदा सरमायाकारी के बाजारो ( Financial Market / वित्तीय बाज़ारो) को उनकी मौजूदा शक्ल में क़ुबूल नहीं करता, जिसमें के एक शख्स शेयर खरीद व फरोख्त कर सकता है जबकि वह इस कम्पनी की कारकर्दगी (फायदा व नुकासान) में शामिल नहीं होता। हांलाकि शेयर इस कम्पनी में उस शख्स की हिस्सेदारी की नुमाईन्दगी करते है। इस्लाम में मिल्कियत (Ownership ) का मतलब ये है कि इस कम्पनी मे सीधे तौर पर अपना किरदार अदा करे न की सिर्फ अपने पास शेयर के सर्टिफिकेट रख कर जिसे स्टोक मार्केट कभी भी बेचने और फिर बार-बार बेचने की इजाज़त देता है। सिधे तौर पर इस साझेदारी मे शामिल नहीं होने के सबब ही कम्पनी मे बहुत ज़्यादा सट्टेबाजी चलती है. यह वित्तीय बाज़ार (Financial Market) माल और सेवाओं के लेन-देन वाली वास्तविक अर्थव्यवस्था से बिल्कुल अलग होता है. पूंजीवाद मे यही समस्याओं की जड है. दुनिया मे स्टोक मार्केट के मूल्य का अन्दाज़ा 51 ट्रिलियन डालर, और डेरिवेटिव मार्केट के मूल्य 480 ट्रिलियन आंका जाता है, जो की अमरीका की अर्थव्यवस्था का 30 गुना और दुनिया की अर्थव्यवस्था का 12 गुना है.

पब्लिक लिमिटेड कम्पनी (PLC) के हराम होने की कई वजुहात (वजह) है। इनमें से एक ज़िम्मेदारी का मामला है। पब्लिक लिमिटेड कम्पनी की व्यवस्था कम्पनी को सीमित तौर पर जवाबदेह ( Limited liability ) बनाता है, जिसका मकसद बड़े सरमायाकारो (investors/निवेशकों) और ताजिरो (businessmen) को बचाना है, ऐसे वक्त में जबकि कम्पनी दिवालिया हो गई हो, जिससे के दूसरे सरमायाकार (Investors/ निवेशक) कम्पनी से घांटा होने की सूरत मे मुआवजे की मांग न कर सके। चाहे उसका पूंजीनिवेश कितना ही ज़्यादा क्यो न हो। माली मुतालिबे (आर्थिक मांगे) वही तक हो सकते है जो कम्पनी में पूंजी की शक्ल में बच गए है। ये व्यवस्था हर पहलू से शरीयत के मुखालिफ है। शरीयत इस बात को फर्ज़ करार देती है के सरमायाकार (पूंजीनिवेशक/investor) को पूरा-पूरा क़र्ज़ वापस किया जाए ओर उनके माल की वापसी में ज़रा भी कमी हराम है।

बुखारी में अबू हुरैरा (رضي الله عنه) से रिवायत है के रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) फरमाते है, ”वह शख्स जो अदा करने की नियत से लोगो से माल लेता है उसको अल्लाह वापस कराएगा और जो इसको बरबाद करने की नियत से माल लेता है तो अल्लाह उस शख्स को बरबाद कर देगा।”

अहमद अबू हुरैरा से रिवायत करते है के नबी (صلى الله عليه وسلم) ने फरमाया, ”तुम हक़ वालो को उनका हक़ रोजे कयामत में लौटाओंगे यहां तक के एक बगैर सिंग की बकरी सिंग वाली बकरी को मार करके अपना बदला पूरा करेगी।”

रसूले अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने इस बात का हुक्म दिया है और इसे फर्ज़ करार दिया है के किसी का हक़ इस ज़िन्दगी में ही अदा कर दिया जाए और अगर ऐसा नहीं करते तो फिर रोज़े कयामत में उसे करना होगा। ये बात उन लोगो के लिए एक चेतावनी का काम करती है जो लोगो का हक़ मारते है।

इस्लाम में कम्पनी के ढांचे ( Structure ) के खुद अपने नियम हैं। ये पांच तरह के है, जिनका ताल्लुक लोगों और पूंजी के दर्मियान वास्तविक साझेदारी/हिस्सेदारी से है. और ये निम्नलिखित हैं: 1. अलअनान (बराबरी),

अलअबदान (अजसाम),
मदारबा (दो या ज़्यादा),
अल वुजुह (शक्लें)
अल मफावदाह (लेन-देन) है।
दारे क़ुतनी में अबु हुरैरा (رضي الله عنه) रिवायत करते है के रसूल्लाह (صلى الله عليه وسلم) का फरमान है ”अल्लाह तआला फरमाता है के मै दो हिस्सेदारो के साथ तीसरा हूँ, जब तक उनमे से एक अपने साथी को धोका नहीं देता और अगर उसने धोका दे दिया तो मैं उनसे अलग हो जाता हूँ।”

इस्लाम इजारादारी (एकाधिकार) के खिलाफ है और प्रतिस्पर्धा (competition/कम्पिटीशन) की हौसला अफज़ाई करता है।

पब्लिक लिमिटेड कम्पनी बहुत बड़ी तादाद में माल इकट्ठा कर लेती है यहॉ तक के कुछ कम्पनियों की मिलकियत कुछ देशों की कुल आर्थव्यवस्था की किमत से भी ज़्यादा हो जाती है। इस्लामी निज़ाम में यह नहीं हो सकता क्योंकि इसमें ऐसी कम्पनी (PLC) का वजूद ही नहीं होगा जो लोगो में शेयर को तक्सीम करके माल इकट्ठा करती है और इसका अर्थव्यवस्था पर साकारात्मक असर होगा क्योंकि आज के दौर में बड़ी-बड़ी कम्पनीयां एकाधिकार, बेचने वालों की तादाद कम कर के मार्केट में अपना गलबा कायम कर लेती है। मिसाल के तौर पर माइक्रोसोफ्ट, कोकाकोला, पेप्सी वगैराह।

पूंजीवादी विचारक भी इस बात का इकरार करते है के एकाधिकार नाकारात्म हक़ीक़त है और एडम स्मिथ (Adam Smith) ने जो के सारमायादाराना निज़ाम का बानी है, एक ऐसी अर्थव्यवस्था का ख्वाब देखता है जिसमें मुकम्मल कम्पीटीशन हो जो के एक मिसाली अर्थव्यवस्था होगी जिसे वोह हालिया दौर में आजाद मण्डी (free market) होने की वजह से कभी पूरा नहीं कर सकते।

इस्लामी अर्थव्यवस्था में अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से कम्पीटिशन वाली अर्थव्यवस्था की तरफ धकेलती है क्योंकि उसमें छोटी और दरमियानी कम्पनीयां एक दूसरे के साथ कम्पीटिशन कर सकती है और ये बात अर्थव्यवस्था के लिए निहायत ही फायदेमन्द हैं क्योंकि मुकाबले की वजह से क़ीमते कम होती है और वस्तुओं का स्तर (Quality) बढ़ता है। मिसाल के तौर पर मषरू बात (Soft Drink) के बाज़ार में आज पूरी दूनिया पर सिर्फ 3 कम्पनी ही को क्यों गलबा हासिल है? वह पूरी तरह से बाज़ार पर दबदबा रखती है। इनके पास इतना माल है के वह अपनी किसी भी मुकाबले की कम्पनी को खरीद सकती है। जैसा के कोकाकोला ने थम्स-अप (Thums-up) के साथ हिन्दुस्तान में किया। इजाराहदारी या एकाधिकार वाली कम्पनियों के पास इतनी ताक़त होती है की घटिया किस्म की वस्तुओं को बाज़ार में बेच सकती है और लोगो के पास कोई मुतबादिल (विकल्प) नहीं होता। हिन्दुस्तान में पेप्सी की बोतलों मे मौजूद पेस्टी साइड वाले धोटाले के बारे में हम सब वाकिफ है।

जो चीज आपकी मिल्कियत में न हो उसे बेचना हराम है
आज के दौर में शॉर्ट सेलिंट (Short selling) या फरवर्ड सेलिंग (Forward selling) की वजह से लोग उस चीज़ को भी बेचते है जो उनकी मिल्कियत में नहीं है। इस्लाम इस चीज को लाज़मी करार देता है के सौदे की जाने वाली वस्तु बेचने वाले की मिल्कियत में हो। हकीम बिन जज़म (رضي الله عنه) रिवायत करते है के ‘मैने कहा: “ऐ रसूल्लाह (صلى الله عليه وسلم) एक शख्स मेरे पास आता है और ऐसी चीज फरोख्त करने को कहता है जो मेरे पास नहीं है, तब में उसे बाज़ार से खरीदता हॅूं. रसूल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने फरमाया: “वह चीज फरोख्त न करो जो तुम्हारे पास न हो।”

इस्लाम न आजाद बाज़ार (Free Market) में यकीन रखता है और न नियंत्रित अर्थव्यवस्था (Controlled economy) में

इस्लाम का इक्तिसादी निज़ाम (अर्थव्यवस्था) न ही सरमायादाराना है जहॉ बाज़ार को आजाद छोड़ दिया जाए जो लोगों को तबाही की तरफ ले जाये जैसा की हम आज देख रहे है और न ही इष्तिराकी (साम्यवादी/communist) है, जिसको हुकूमत नियंत्रित करती है. इस्लाम अवामी मिल्कियत (जन सम्पत्ती), रियासती मिल्कियत (राष्ट्रिय सम्पती) और इन्फिरादी मिल्कियत (व्यक्तिगत सम्पत्ती) में फर्क करता है। इस्लाम बड़ी तादाद में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों जैसे तेल, गैस, लोहा वगैराह की मिल्कियत को एक व्यक्ति के लिए हराम करार देता है। जैसा की हम आज देखते है की पश्चिमी कम्पनीयां मुस्लिम देशो मे इन संसाधनों को पाने के लिये आपस मे लड रही है और किसी भी हद तक गुज़रने को तैयार रहती हैं।

रसूल्लाह (صلى الله عليه وسلم) का फरमान है:

«الناس شركاء في ثلاث الماء والكلأ والنار»

”अवामुन्नास (जनता) की हिस्सेदारी तीन चीजो में है – आग, पानी और चरागाहे”। (अबू दाउद)

अनस (رضي الله عنه) इब्ने अब्बास से रिवायत करते है के ”उन चीजो की खरीद व फरोख्त हराम है।” इसके अलावा हम जानते है के रसूल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने लोगो को ज़मीन तक्सीम करने के बाद वापस ली जब उन्हे मालूम हुआ के ज़मीन मे बड़ी तादाद में कुदरती वसाईल (प्राकृतिक संसाधन) जैसे कि नमक है।

इस्लामी रियासत में तेल और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधन से हासिलषुदा माल का इस्तिमाल लोगो के फायदे के लिए होगा न कि हुक्काम (शासकों) के ज़ाति खर्च के लिए जो कि इन पैसो को अपने स्विट्जरलैंड ( Switzerland ) बैंक अकांउट में जमा करते है और इसका इस्तिमाल अपने मफाद के लिए करते है और इसकी बेहतरीन मिसाल खलीजी मुमालिक (अरब देशों) के हुक्कमा (शासक) हैं।

रसूल्लाह (صلى الله عليه وسلم) फरमाते है:

«…الإمام راع وهو مسؤول عن رعيته »

”ईमाम यानी खलीफा, चरवाहा है और वह जिम्मेदार है।”

करन्सी का मियार सोना और चांदी है
आज की करन्सी (मुद्रा), कागज़ी मुद्रा है, जिसकी पीछे उसकी क़िमत का निर्धारण किसी वास्तविक चीज़ (जैसे सोना-चान्दी वगैराह) से नहीं होती है, बल्कि इसकी बुनियाद सिर्फ भरोसे पर होती है और यही वजह है कि आज मंहगाई दिन-बा-दिन बढ़ती जा रही है। इसका ईलाज इस्लाम के पास है क्योंकि इस्लाम में करन्सी की बुनियाद सोना और चॉदी है। रसूल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने इस्लामी करन्सी की बुनियाद दिरहम (सोना) और दिनार (चान्दी) पर रखी जो कि हक़ीक़ी चीज़े है जिनकी क़िमत होती है। इस्लाम ने क़ुरआन व सुन्नत के जरिए ज़कात की निसाब सोने और चांदी पर मुकरर की है।

इस्लाम इस बात की इजाज़त देता है के नोट कागज के हो मगर उसकी पुष्त-पनाही सोने और चांदी से होनी चाहिए यानी उन नोटों को असली सोने और चान्दी से कभी भी बदला जा सके और सरकार उतने ही नोट जारी करे जितना की उसके पास सोना हो। इसलिए इस्लामी रियासत में बैतुलमाल में जाकर कागजी नोट को सोने या चांदी में बदल सकते। इस वजह से मंहगाई खत्म हो जाएगी क्योंकि सोने चांदी की कीमते मजबूत होती है। इस्लामी रियासते को इस बात की इज़ाज़त नही है की वोह बिना सोने और चाँदी/या दूसरी क़िमती सम्पती की कमी मे नोट छाप सके और हवा मे पैसा पैदा कर सके जैसे की आज हो रहा है. आज के दौर मे चल रहा आर्थिक संकत और मंहगाई की वजह से हम देख सकते है के लोग अब पैसा जमा/इकट्ठा करने के बजाए ऐसी चीजे खरीद रहे है जिनकी हकीकी कीमत हो जैसे सोना, चांदी वगैराह।

नतीजा

अब ये बात निहायत वाजेह है के इस्लामी निज़ामे इक़्तिसाद (अर्थव्यवस्था) (economic system), इस्लामी बैंक (Islam banking) या इस्लामी फायनेन्स (Islamic Finance) से कहीं ज़्यादा फैला हुआ है और ये भी बिल्कुल वाज़ेह है कि ये निज़ाम वही हुकूमत नाफिज कर सकती है जो शरीअत की मुकम्मल तौर पर लागू करे और एक आजाद रियासत हो न की मगरिब (पश्चिम) की ऐजेन्ट। ये बात वाज़ेह कर देना हम पर लाज़िम है के इस्लाम का इक्तिसादी निज़ाम एक बेहतरीन विकल्प है और उसको इस्लाम की दूसरी व्यवस्थाओं से अलग नहीं किया जा सकता।

अमरीका, बरतानिया और दूसरी पूंजीवादी सरकारें प्राईवेट कम्पनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिये बेल-आउट (bail out) की रक़म देती हैं. यह रक़म जनता की गाढी कमाई से दी जाती हैं जो उसने जनता से टेक्स के ज़रिये इकट्ठा की. इस तरह वोह अपनी अर्थिक और वित्तीय व्यवस्था को बचाती है. लोगों को समझना चाहिये की इस्लाम के पास दुनिया के देने के लिये एक व्यवहारिक विकल्प है.

इस बात की दलील ये भी है कि बाकसरत गैर-मुस्लिम इतिहासकारों ने इस्लामी हुकूमत के दौरान साइंस और टेक्नोलोजी की तरक्की की तारीफ की है।

फ्लिप हित्ती (Philip Hitti) अपनी किताब ”अरबो की मुख्तसर तारीख” में लिखता है के ”नवी (9वी) सदी ईसवी से लेकर बारहवी (12वी) सदी ईसवी तक इंसानी तरक़्क़ी के लिये जितना काम अरबों ने किया उतना किसी ने नहीं किया. अरब सिर्फ वही नहीं जो सरजमीने अरब में रहते है बल्कि हर वोह शख्स अरबी है, जिसकी जबान (भाषा) अरबी है और सदियों तक अरबी भाषा उलूम व फनून (ज्ञान और कला) और अक्ली तरक्की ( Intellectual Progress ) का ज़रिया रही।

हमे ये बात भी वाजेह करनी ज़रूरी है के इस्लामी व्यवस्था पूरी इन्सानियत के लिए है। अल्लाह तआला फरमाता है:

وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا رَحْمَةً لِلْعَالَمِينَ

”और (ऐ मुहम्मद صلى الله عليه وسلم) हमने तुमको जहान के लिए रहमत बनाकर भेजा है”.

इस्लाम का निज़ाम वह निज़ाम है जो इन्सानी दिमाग के पैदा किये हुए अफकार (विचार) नहीं है बल्कि वह खालिके काईनात (सृष्टी के रचयता) की तरफ से नाज़िल करदा है और बनी-नो-इन्सान के लिए कामिल तरीन निज़ाम हैं. जिसके लिये सभी लोगों को इस व्यवस्था को दोबारा कायम करने के लिए संघर्ष करना चाहिये ।

हसन बसरी रिवायत करते है कि रसूलल्लाह (صلى الله عليه وسلم) ने फरमाया, ”जो शख्स इस हाल में मरता है कि इल्म हासिल करे ताकि इसकी मदद से इस्लाम को तक़वीयत पहुंचा सके तो जन्नत में उसके और अंबिया के दरमियान सिर्फ एक दरजे का फासला होगा।