इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 15

इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 15

Posted by

हमने मानवाधिकार के आधार के संबंध में इस्लाम और पश्चिम के दृष्टिकोण में अंतर का उल्लेख किया था।

इसी मूल अंतर को विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र के अनुच्छेद के संकलन में मद्देनज़र रखा गया है। विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र का आधार कभी कभी दूसरी भूमि के लोगों की संस्कृति एवं उनके धार्मिक विचारों से मेल नहीं खाता। यही कारण है कि दुनिया के बहुत से देशों के लोगों को विश्व मानवाधिकार के घोषणापत्र और दस्तावेज़ के उन अनुच्छेदों पर आपत्ति हैं जिसके दायरेमें पूरी दुनिया के देशों को शामिल किया गया है।

जैसा कि हम सब जानते हैं कि मानव समाज विविध संस्कृति, विचारधारा और माहौल से संपन्न है। इसी प्रकार मानव समाज विभिन्न धर्मों, नैतिक सिद्धांतों व क़ानून के ज़रिए संचालित होता है। इसलिए मानवाधिकार और उसके अनुच्छेद को इस तरह परिभाषित किया जाए कि सभी समाज व राष्ट्र उसे स्वीकार करे या यह कि उसकी व्याख्या व परिभाषा में गंभीर टकराव की स्थिति पैदा न हो। अगर मानवाधिकार को वैश्विक अधिकार का स्थान देना है तो ज़रूरी है कि पूरी दुनिया के लोगों के लिए क़ानून व कर्तव्य निर्धारित हो चाहे वे किसी भी धर्म, संस्कृति व विचारधारा को मानते हों।

इस समय दुनिया में एक हुकूमत नहीं है और न ही सभी सरकारें एक शक्ति के अधीन हैं कि दुनिया के सभी लोगों को एक सरकार के अधीन समझा जाए और उन पर अपने देश के क़ानून का पालन अनिवार्य हो जाए। इसलिए यह बात मुमकिन नहीं है कि इंसान मानवाधिकार से संबंधित सभी नियमों व अनुच्छेदों को आंख मूंद कर माने और उस पर अमल करे। इसलिए मानवाधिकार घोषणापत्र के अनुच्छेदों की अनेक व्याख्याएं होना स्वाभाविक लगता है।

जब किसी समाज के लोग उसके क़ानून व नियम का पालन करते हैं तो उन्हें इस बात का विश्वास होता है कि क़ानून बनाने वालों ने उनके भौतिक व आत्मिक हितों को मद्देनज़र रख कर पूरी निष्ठा से क़ानून बनाया है। दूसरी ओर हर समाज के लोग चुनाव के ज़रिए अपने प्रतिनिधि को चुनते हें ताकि वे क़ानून बनाएं और उन्हें उन पर विश्वास होता है। इसके अलावा उस समाज के लोगों में संस्कृति, धर्म, जीवन शैली और राष्ट्री हितों की दृष्टि से समानता होती है।

आज यह बात दावे से नहीं कही जा सकती कि सभी समाज के लोगों ने पश्चिमी सरकार की क़ानून व कर्तव्य के निर्धारण की योग्यता को स्वीकार किया है। इसी प्रकार ऐसी निष्ठा प्रमाणित नहीं हुयी जिससे सभी राष्ट्र व जातियां संतुष्ठ हो सकें।

अब मानवाधिकार के अनुच्छेदों में वर्णित एक एक अधिकार की मिसाल के साथ समीक्षा करेंगे और इस्लामी मत व पश्चिमी विचारधारा की अलग अलग व्याख्याओं को बयान करेंगे। इस तरह ईश्वरीय दृष्टिकोण और पश्चिम के भौतिक दृष्टिकोण में अंतर को भलिभांति समझा जा सकता है।

ज़िन्दा रहने का अधिकार इंसान के मूल अधिकारों में है। ज़िन्दगी ईश्वर की ओर से इंसान को दी गयी मुख्य अनुकंपा है। विभिन्न धर्मों व मतों में इंसान के लिए जो अधिकार माने गए हैं उनमें ज़िन्दा रहने का अधिकार उस सोते के समान है जिससे अन्य अधिकार निकलते हैं। इंसान के जिस अधिकार को मद्देनज़र रखा जाए या जिस परिपूर्णतः तक इंसान पहुंचना चाहता है वह ज़िन्दा रहने या ज़िन्दगी पर निर्भर है। अगर कोई व्यक्ति मानवीय मूल्यों के अंतिम चरण तक पहुंचना चाहता है तो उसके लिए ज़रूरी है ज़िन्दा रहे। जो व्यक्ति ईश्वरीय व प्राकृतिक अनुकंपाओं से लाभ उठाना चाहता है उसके लिए ज़िन्दा रहना ज़रूरी है।

ज़िन्दा रहने के अधिकार के बारे में एक दूसरे से भिन्न दो व्याख्याएं की जाती हैं। एक का आधार ईश्वरीय विचारधारा है और दूसरे का आधार लिब्रल या उदारवादी विचारधारा है। इन दोनों व्याख्याओं का विश्व मानवाधिकार और इस्लामी मानवाधिकार के घोषणापत्र में उल्लेख है। विश्व मानवाधिकार घोषणापत्र के तीसरे अनुच्छेद में आया है, “ हर व्यक्ति को ज़िन्दा रहने, आज़ादी और सुरक्षा का अधिकार है।” नागरिक व राजनैतिक अधिकार के अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र के छठे अनुच्छेद में तय किया गया है, “ ज़िन्दगी का अधिकार इंसान के व्यक्तिगत अधिकारों में है। इस अधिकार का समर्थन होना चाहिए। किसी व्यक्ति को मनमाने तरीक़े से जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता।”

इस आधार पर मानवाधिकार के पश्चिमी दार्शनिकों का मानना है कि इंसान को ज़िन्दा रहने का अधिकार है और किसी व्यक्ति को इस अधिकार को ख़त्म करने का अधिकार नहीं है। यही कारण है कि सिर्फ़ बहुत बड़े अपराध को छोड़ कर मौत की सज़ा की हिंसा के रूप में निंदा की गयी है और इसे अवैध क़रार दिया गया है। दूसरी ओर चूंकि ज़िन्दा रहना इंसान का व्यक्तिगत अधिकार है इसलिए हर व्यक्ति अपने इस अधिकार को छोड़ कर ख़ुदकुशी कर सकता है। इन दोनों आदेश का अधिकार वही लिबरल विचारधारा है जो यह कहती है कि हर व्यक्ति का जीवन उसका अपना है इससे समाज और ईश्वर का कोई संबंध नहीं है और वह जिस तरह चाहे अपने जीवन के साथ व्यवहार करे।

इसके विपरीत ईश्वरीय विचारधारा में चूंकि ईश्वर का इंसान पैदा करने वाला है और पूरी सृष्टि ईश्वर की है इसलिए किसी व्यक्ति को न तो ख़ुद को और न ही किसी दूसरे को जान से मारने का अधिकार है। इसका कारण यह है कि इस्लामी सहित सभी ईश्वरीय धरमों में ज़िन्दगी को ईश्वरीय अनुकंपा और उसकी ओर से दिया गया अधिकार माना गया है। इसलिए जब भी यह अधिकार दूसरों की हत्या का माध्यम बने या समाज में भ्रष्टाचार का कारण और समाज की उचित व्यवस्था में उथल पुथल का कारण बने तो इस अधिकार को दूसरों के हितों के लिए ख़त्म कर दिया जाएगा।

पवित्र क़ुरआन में इंसान के जिस अधिकार का सबसे पहले उल्लेख है वह ज़िन्दा रहने का अधिकार है। इस्लाम की परिभाषा में जीवन भौतिक व आत्मिक दो भाग में बटा हुआ है। किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे के भौतिक व आत्मिक जीवन का अधिकार छीने। भौतिक जीवन का अधिकार हत्या के ज़रिए छिनता है। पवित्र क़ुरआन की नज़र में यह कृत्य पूरे समाज के सर्वनाश के समान है मगर यह कि इसके पीछे कोई सही तर्क हो। पवित्र क़ुरआन के मायदा नामक सूरे की 37वीं आयत में ईश्वर कह रहा है, “जो कोई किसी व्यक्ति का अकारण क़त्ल करे तो ऐसा है मानो उसने पूरी मानव जाति का क़त्ल किया।”

इंसान के आत्मिक जीवन को बुराइयों के ज़रिए छीना जाता है। अगर कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को बुरायी के ज़रिए गुमराह करता है तो वह उसका आत्मिक जीवन ख़त्म करता है। अलबत्ता आत्मिक जीवन को खोने का अर्थ सही मार्ग को खोने के अर्थ में है क्योंकि इंसान की आत्मा कभी भी तबाह नहीं होती। यही कारण है कि पवित्र क़ुरआन में आत्मिक जीवन को नास्तिकता के मुक़ाबले में पेश किया गया है। अर्थात जो कोई नास्तिक हो जाए उसके हाथ से कल्याण चला जाता है। इस प्रकार वह आत्मिक दृष्टि से मर जाता है। इस तुलना को पवित्र क़ुरआन के यासीन नामक सूरे की 70वीं आयत में ईश्वर यूं बयान करता है, जिसका मन जीवित हो उसे प्रकोप से डराए और जो नास्तिक है उसके लिए प्रकोप का वचन सिद्ध हो जाए।

जैसा कि इस आयत से स्पष्ट है कि जो लोग नास्तिक नहीं है उन्हें जीवित कहा गया है और जो नास्तिक है वे ऐसे हैं कि उन्होंने जीवन से लाभ नहीं उठाया।

पवित्र क़ुरआन की नज़र में जीवन का अधिकार ईश्वर ने इंसान को दिया है इसलिए इस अधिकार में किसी तरह का हस्तक्षेप करने का अधिकार सिर्फ़ ईश्वर को हासिल है। इसलिए ईश्वर की अनुमति के बिना भौतिक और आत्मिक जीवन को ख़ुद से ख़त्म करना या किसी दूसरे के ज़रिए उसका ख़त्म होना वर्जित है। दूसरे शब्दों में इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि जीवन इसान का अधिकार है, उसका कर्तव्य भी है कोई व्यक्ति अपने इस कर्तव्य से पीछा नहीं छुड़ा सकता।

जैसा कि इस बात का उल्लेख किया ज़िन्दा रहने का अधिकार इंसान का सबसे पहला अधिकार है। दूसरी ओर पैग़म्बरे इस्लाम के परपौत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अधिकारों का स्रोत ईश्वर की पहचान को मानते हैं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन की इस बात का राज़ उसी पहली वाली बात में निहित है कि जो व्यक्ति ईश्वर को न पहचाने और नास्तिक हो जाए तो मानो उसने ज़िन्दा रहने के अधिकार से फ़ायदा नहीं उठाया। तो ईश्वर की पहचान ही आत्मिक जीवन से संपन्नता का चिन्ह है।

इंसान, जानवर, वनस्पति सहित सभी चीज़ों में भौतिक जीवन को माना गया है। पवित्र क़ुरआन की अनेक आयतों में इस बात का उल्लेख है कि जिस प्रकार ईश्वर बारिश भेज कर वनस्पति को उगाता है उसी तरह वह इंसान को भी ज़िन्दा रखता है। अंबिया नामक सूरे की आयत नंबर 30 में ईश्वर कह रहा है, हर जीवित चीज़ को पानी से पैदा किया। यह जीवन वानस्पतिक जीवन की तरह हुआ। वह इंसान वानस्पतिक जीवन की तरह ज़िन्दगी गुज़ारता है जिसकी हर कोशिश का लक्ष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना पेट पालना और भोग-विलास का जीवन गुज़ारना होता है। इस तरह के लोग जानवर के जैसा भी जीवन नहीं बिताते इंसान की तरह जीवन बिताना तो बहुत दूर की बात है। वनस्पति के जीवन का लक्ष्य बढ़ना होता है।

इस चरण से बेहतर चरण जानवर के जीवन का चरण है। इस चरण में प्रेम, मित्रता और दुश्मनी जैसी भावना पायी जाती है। पवित्र क़ुरआन में जिस जगह पर जानवरों के जीवन का उल्लेख किया है इंसान के जीवन को भी उसी के समान कहा है। जैसा कि नाज़ेआत नामक सूरे की आयत नंबर 33 में ईश्वर कह रहा है, ये नेमतें तुम्हारे और तुम्हारे जानवरों के फ़ायदे के लिए हैं।

क़ुरआन की बातें बहुत ही शिष्टाचारिक अंदाज़ में बयान की गयी हैं। इस तरह की बातें बयान करने का उद्देश्य संदेश को पहुंचाना है। वह संदेश यह है कि ये अनुकंपाएं तुम्हारें और जानवरों के लिए समान हैं किन्तु इन अनुकंपाओं से मन लगाना तुम्हें जानवर के स्तर पर रोके रखेगा। किन्तु जब इंसानी ज़िन्दगी का वर्णन होता है तो इंसान के नाम का फ़रिश्तों के साथ वर्णन होता है।

खेद के साथ कहना पड़ता है कि मौजूदा दुनिया की व्यवस्था जानवरों के समान जीवन पर आधारित है। पश्चिमी दृष्टिकोण में मानव जाति के मानवीय जीवन को मानवीय दृष्टि से नहीं देखा गया है। यह निश्चेतना बहुत से मूल कमियों का स्रोत और ईश्वरीय विचारधारा से भिन्नता का कारण है।