इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 16

इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 16

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जीवन व्यतीत करने का अधिकार इंसान का मूल अधिकार है।

इस्लाम के अनुसार जीवन दो प्रकार का है, भौतिक एवं आध्यत्मिक। भौतिक जीवन शरीर से संबंधित सांसारिक जीवन है। आध्यात्मिक जीवन का इंसान की आत्मा से मज़बूत संबंध है और आत्मा ईश्वरीय प्रकृति पर आधारित होती है। इंसान एक अमर प्राणी है और भौतिक जीवन के बाद उसका आध्यात्मिक जीवन शुरू होता है।

क़ुरान की दृष्टि से इस मूल सिद्धांत की तीन विशेषताए हैं। पहली यह कि इसे केवल और केवल ईश्वर की चाहत होती है। दूसरे यह कि समस्त इंसानों में पायी जाती है और तीसरे यह कि हर प्रकार के नुक़सान व परिवर्तन से सुरक्षित है। ईश्वर ने क़ुरान के सूरए रूम की 30वीं आयत में फ़रमाया है, यह वही फ़ितरत है, जिसके आधार पर ईश्वर ने इंसानों को पैदा किया है, ईश्वर की सृष्टि में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

इसलिए इंसान की प्रकृति मिट्टी से जुड़ी हुई है और उसकी फ़ितरत का स्रोत ईश्वरीय आत्मा है। इंसान के समस्त गुण उसकी फ़ितरत से और उसकी समस्त कमज़ोरियां उसके स्वभाव से जुड़ी होती हैं। इन दोनों के बीच निंरतर संघर्ष चलता रहता है, जिसे सबसे बड़ा जेहाद कहा जात है। इस संघर्ष में जब फ़ितरत या प्रकृति भारी पड़ती है तो समस्त फ़रिश्ते इंसान के सामने सजदा करते हैं और जब बुरे स्वभाव को सफलता मिलती है तो वह जानवरों से अधिक महत्वहीन हो जाता है।

क़ुरान ने दो प्रकार के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन की ओर संकेत किया है। क़ुरान के अनुसार, अगर इंसान इन दोनों में से किसी एक के चयन के लिए मजबूर हो जाए उसे भौतिक जीवन को त्याग देना चाहिए और आध्यात्मिक जीवन का चुनाव करना चाहिए।

सूरए निसा की 74वीं आयत में ईश्वर कहता है जिन लोगों ने भौतिक जीवन को आध्यात्मिक जीवन पर क़ुरबान कर दिया है, उन्हें चाहिए कि ईश्वर के मार्ग में जंग करें लेकिन जिन लोगों ने ऐसा नहीं किया है, वे प्रलय के दिन नुक़सान उठायेंगे। जैसा कि क़ुरान में उल्लेख है कि काश अपने इस जीवन के लिए पहले से कुछ तैयारी कर लेता।

एक दूसरे बिंदु की ओर क़ुरान संकेत करते हुए कहता है कि आध्यात्मिक जीवन भौतिक जीवन से कहीं अधिक लाभदायक है। यही कारण है कि आध्यात्मिक जीवन के लिए ख़तरा, भौतिक जीवन के लिए ख़तरे से कहीं अधिक है। पिछले कार्यक्रम में हमने उल्लेख किया था कि भौतिक जीवन हत्या से छीन लिया जाता है और पथभ्रष्टता द्वारा आध्यात्मिक जीवन छीन लिया जाता है। जो कोई किसी को सही रास्ते से भटकाता है वह उसका आध्यात्मिक जीवन छीन लेता है। क़ुराने करीम सूरए बक़रा की 191 और 217वीं आयत में उल्लेख करता है कि फ़ितना व बूराई हत्या से भी बड़ा पाप है। फ़ितने का अर्थ है, लोगों के धार्मिक विश्वासों और आध्यात्मिक जीवन को छीन लेना। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण, भ्रष्ट विचारों और अनैतिकता का प्रचार प्रसार है। इसीलिए फ़ितने का मुक़ाबला काफ़ी कठिन और ज़रूरी है और यह हत्या जैसे अपराधों से मुक़ाबले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

संभव है कि यहां यह सवाल पेश आए कि मानवाधिकारों के विषय से जीवन को भौतिक एवं आध्यात्मिक दो भागों में बांटने का क्या संबंध है? इसके जवाब में कहा जा सकता है कि इंसान की सबसे स्पष्ट विशेषता उसका शरीर है, जो विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न स्थितियों में होता है। उदाहरण के रूप में नस्लों की भिन्नता और भौगोलिक स्थिति के अंतर के कारण, विभिन्न राष्ट्रों और समुदायों की शारीरिक स्थिति भिन्न होती है। यहां तक कि एक इलाक़े में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार, वनस्पतियों का असर भी अलग होता है। कभी कभी ऐसा होता है कि किसी गर्म इलाक़े में उगने वाली जड़ी बूटी का असर कुछ और ठंडे इलाक़े में उगने वाली उसी प्रकार की जड़ी बूटी का असर कुछ और होता है। इसीलिए एक वैद्य पूरे विश्वास से नहीं कह सकता कि एक जड़ी बूटी संसार के सभी लोगों के लिए एक प्रकार से लाभदायक है। महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इंसान केवल शरीर तक ही सीमित नहीं है। शरीर के अलावा उसमें आत्मा भी है। समस्त इंसानों में एक संयुक्त एवं स्थिर बिंदु पाया जाता है। यही संयुक्त बिंदु इंसान को सौभाग्य बना सकता है। क़ुरान इस संयुक्त बिंदु को आत्मा कहता है और उल्लेख करता है कि यह आत्मा ईश्वरीय आत्मा है।

इंसान की आत्मा भौगोलिक सीमाओं में सीमित नहीं हो सकती। यह आत्मा एक साथ ही पूरब और पश्चिम में उपस्थित हो सकती है। भूमध्यरेखा में भी आत्मा की वही विशिष्टता होगी जो ध्रुव पर। आत्मा न ही ज़मीन में सीमित है और न ही आसमान में, इसके बावजूद वह ज़मीन पर भी है और आसमान में भी। दूसरे शब्दों में आत्मा, शरीर के विपरीत एक है, स्थिर है और उसमें बदलाव नहीं होता।

इंसान की आत्मा ईश्वर को समुद्र, ज़मीन, आसमान और किसी भी जगह प्राप्त कर सकती है। ईश्वर क़ुराने मजीद की 115वीं आयत में फ़रमाता है, जिस ओर भी रुख़ करोगे, वहां ईश्वर है।

इससे पहले भी हमने इस बिंदु की ओर संकेत किया था कि समस्त इंसानों के बीच संयुक्त बिंदु ईश्वरीय फ़ितरत है। यहां पुनः इस बिंदु पर बल देना उचित होगा कि अगर ईश्वरीय फ़ितरत मानवाधिकारों का स्रोत नहीं बनेगी तो मानवाधिकारों के न ही संकलन का कोई लाभ होगा और न ही उसकी व्याख्या और उसके कार्यान्वयन का। इस वास्तविकता का रहस्य यह है कि ईश्वरीय फ़ितरत के अलावा कोई भी चीज़ व्यक्तिगत लाभ के मार्ग में रुकावट नहीं बन सकती। हक़ीक़त में कौन सी ऐसी चीज़ है जिसके कारण इंसान अपने व्यक्तिगत लाभ के बजाए समस्त इंसानों के संयुक्त लाभ का ध्यान रख सकता है। स्पष्ट है कि मानवाधिकारों के स्रोतों की जानकारी और उनके निर्धारण के लिए इस संयुक्त सिद्धांत के अलावा किसी और चीज़ पर भरोसा नहीं किया जा सकता और इंसान के स्वभाव की स्रोत नहीं बनाया जा सकता।

इस बहस का लाभ क़ानूनी प्रक्रिया में देखा जा सकता है। मानवीय नियम शरीर के आधार पर और ऐसे लोगों द्वारा बनाए जाते हैं जो ख़ुद अपने शरीर में क़ैद हैं। यही कारण है कि यह नियम शरीर और जलवायु के अंतर के मद्देनज़र, विभिन्न होते हैं और यह वैश्विक नहीं हो सकते। लेकिन धर्म जिसका आधार आत्मा होती है और वह उस ज़ात की ओर से है जो भौतिकता एवं शरीर में सीमित नहीं है, वह वैश्विक है और समय एवं स्थान की सीमितता से परे है।

स्पष्ट है कि क़ानून एवं नियम समेत धर्म के समस्त क्षेत्रों की यही विशेषता होती है। यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों ने अटूट विश्वास के साथ एक ऐसे ईश्वरीय धर्म का प्रचार किया है जो स्थिर और अपरिवर्तनीय है। भौतिक ज्ञान में कदापि निश्चित एवं अंतिम परिणाम पर नहीं पहुंचा जा सकता, जैसा कि हम देखते हैं विश्व में प्रतिदिन नए सवाल पुराने सवालों का स्थान ले लेते हैं और यह प्रतिक्रिया यूं ही जारी रहती है। लेकिन इसके मुक़ाबले में धर्म के बुनियादी सिद्धांत, कभी पुराने नहीं होते और समय एवं स्थान के बदलाव के साथ सही तालमेल बैठाते हैं, लेकिन ख़ुद कभी नहीं बदलते।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र के तीसरे अनुच्छेद में उल्लेख है, प्रत्येक व्यक्ति को जीवन व्यतीत करने, आज़ादी और शांति से रहने का अधिकार प्राप्त है। इस्लामी शिक्षाओं में भी हर एक व्यक्ति के जीवन, आज़ादी और शांति को औपचारिकता प्रदान की गई है। लेकिन यहां महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जीवन के अधिकार से अभिप्राय यहां कौन सा जीवन है। भौतिक जीवन का अधिकार या आध्यात्मिक जीवन का अधिकार।

इस अनुच्छेद में जीवन का मतलब वही भौतिक जीवन और इंसान की जान की सुरक्षा है। भौतिक एवं पश्चिमी विचारधार के कारण घोषणापत्र में इसी को ध्यान में रखा गया है और इंसान के अध्यात्मिक आयाम एवं संयुक्त सिद्धांत को नज़र अंदाज़ कर दिया है।

अब अगर पश्चिमी विचारधारा के अनुसार, इंसान के जीवन को एकमात्र भौतिक जीवन स्वीकार कर लेंगे तो इस वास्तविकता का महत्व कदापि भौतिक स्तर से ऊपर नहीं उठेगा। इसलिए इस संदर्भ में जो नियम बनाए जाते हैं, सिर्फ़ उस इंसान के लिए होते हैं जो केवल इस भौतिक दुनिया में सीमित है और उसके मरने के साथ ही उनका भी अंत हो जाता है।

जहां इस प्रकार की विचारधारा होगी जिसके आधार पर इंसान का जीवन इसी दुनिया में सीमित होगा और इंसान की आत्मा की उपेक्षा की जाएगी, वहां किन कारणों के आधार पर इंसान के लिए उत्कृष्ट मूल्यों को साबित किया जा सकता है?

यहां भौतिक एवं ईश्वरीय विचारधारा का अंतर अच्छी तरह स्पष्ट हो जाता है। ईश्वरीय विचारधारा के अनुसार, ईश्वर ने इंसान को आत्मा प्रदान की है, जिसके कारण वह अमर हो गया है। इसीलिए मानवाधिकारों का स्रोत भी इंसान का यही मूल्य है। इस स्थिति में इंसान को इन अधिकारों के लिए ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं और उसके कार्यान्वयन के लिए ईश्वरीय विवेक का सहारा ले सकते हैं। इसी आधार पर इंसानों को समझाया जा सकता है कि मानवाधिकारों और आज़ादी का सम्मान करें, यद्यपि तुम्हारे भौगोलिक, सामाजिक एवं व्यक्तिगत लाभ उन अधिकारों से टकरा रहे हों।