ईश्वरीय वाणी पार्ट 18 : सूरए हूद : : पवित्र क़ुरआन अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है!

ईश्वरीय वाणी पार्ट 18 : सूरए हूद : : पवित्र क़ुरआन अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है!

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वह वही है कि जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिन में बनाया और उसका अर्श (प्रभुत्व) पानी पर था, ताकि तुम्हें परखे कि तुम में से कौन सबसे अधिक भलाई करने वाला है।

वह वही है कि जिसने आसमानों और ज़मीन को छः दिन में बनाया और उसका अर्श (प्रभुत्व) पानी पर था, ताकि तुम्हें परखे कि तुम में से कौन सबसे अधिक भलाई करने वाला है। (हे पैग़म्बर) अगर तुम उनसे कहोगे कि मरने के बाद पुनः जीवित किए जाओगे, तो काफ़िर कहेंगे कि निःसंदेह यह स्पष्ट रूप से जादू है।

यह आयत कि जो क़ुरान के चमत्कारों में से एक मानी जाती है विज्ञान की एक वास्तविकता की ओर संकेत करती है और इस बात को स्पष्ट करती है कि ब्रह्माण्ड का मूल तत्व पानी है और ईश्वर ने ब्रह्माण्ड का आधार उसे ही बनाया है। वैज्ञानिकों की नज़र में, यह जीवन तरल पदार्थ के रूप में था, उसके बाद इस पदार्थ में महाविस्फोट हुआ जिसके परिणामस्वरूप तेज़ हलचल हुई और उसकी सतह से निरंतर कुछ भाग बाहर की ओर उछल कर गिरता रहा। परिणामस्वरूप अंतरिक्ष की वर्तमान मान्यताएं अस्तित्व में आईं। ब्रह्माण्ड का अस्तित्व इसी तरल पदार्थ पर आधारित था। सूरए अंबिया की 30वीं आयत में भी इस सिद्धांत की ओर संकेत किया गया है। क्या वे लोग जो ईश्वर का इनकार करते हैं आंखों से इस वास्तविकता नहीं देखते कि प्रारम्भ में आसमान और ज़मीन आपस में जुड़े हुए थे, उसके बाद हमने उन्हें अलग अलग किया, और हर जीवित प्राणी को हमने पानी से जीवन प्रदान दिया।

यह जीवन एक ही झटके में नहीं हुआ बल्कि छः लम्बे चरणों की प्रक्रिया से गुज़रने के बाद ऐसा हुआ।

दूसरा बिंदु जिसकी ओर यह आयत संकेत करती है, ब्रह्माण्ड के निर्माण का उद्देश्य है, ऐसा उद्देश्य जिसका महत्वपूर्ण भाग इन्सान की ओर पलटता है। आयत कहती है कि इसे इसलिए अस्तित्व प्रदान किया गया ताकि तुम्हें परखा जाए ताकि यह देखा जाए कि तुम में से कौन सबसे भला कार्य करता है।

क़ुरान की दृष्टि में ब्रह्माण्ड के निर्माण एवं इन्सान को जीवन देने का उद्देश्य उसका विकास है। इन्सान को शिक्षा एवं दीक्षा द्वारा विकास के मार्ग पर चलकर ईश्वर से निकटता प्राप्त करनी चाहिए। ऐसा केवल इम्तेहान और परीक्षा देकर ही संभव है। ईश्वरीय व्यवस्था में जो कोई भी अच्छा काम अंजाम देगा तो उसे उच्च स्थान प्राप्त होगा। ईश्वरीय परीक्षा लोगों की आंतरिक एवं मानसिक स्थिति को जानने के लिए नहीं बल्कि लोगों की शिक्षा-दीक्षा के लिए होती है। दिलचस्प बात यह है कि इस आयत में हर व्यक्ति के मूल्य को उसके अच्छे कामों से जोड़कर देखा गया है न कि काम के अधिक होने से, इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम काम की गुणवत्ता को महत्व देता न कि काम की अधिक मात्रा को।

इससे पहले के कार्यक्रम में हमने ईश्वरीय दूत हज़रत नूह (अ) और उनकी क़ौम की स्थिति की चर्चा की थी। उसके बाद, सूरए हूद की आयतों में हज़रत हूद (अ) और उनकी क़ौम का उल्लेख है।

लगभग 700 वर्ष ईसा पूर्व आद नामक एक क़ौम यमन के इलाक़े में रहती थी। वे लम्बे और गठीले शरीर के हुआ करते थे। इसी कारण युद्ध में दक्षता रखते थे। काफ़ी हद तक वे लोग सभ्य थे। उनके शहरों की स्थिति अच्छी थी और उनके पास हरे भरे खेत एवं बाग़ थे। यह क़ौम एक समय तक बहुत अच्छी स्थिति में रही, लेकिन अधिकांश धनवान लोगों की तरह उनमें अंहकार उत्पन्न हो गया और वे अत्याचार करने लगे। उन्होंने अत्याचारियों को अपने नेतृत्व के लिए चुना और मूर्ति पूजा करने लगे, यहां तक कि ईश्वर ने हज़रते हूद को उनके मार्गदर्शन के लिए भेजा।

हज़रते हूद की क़ौम की स्थिति की कहानी क़ुरान की ज़बानी सुनते हैं।

“हमने आद (समुदाय) की ओर उनके भाई हूद को भेजा, (उन्होंने) कहा, हे मेरी क़ौम, अल्लाह की इबादत करो, उसके अतिरिक्त कोई पूजनीय नहीं है, तुम केवल निराधार आरोप लगाते हो।”

इसके बावजूद, हज़रत हूद को आभास हुआ कि लोग सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे। इसीलिए उनसे क्षमा याचना की मांग की ताकि पापों से पाक होने और ईश्वरीय अनुकंपा के द्वारा खुलने के लिए भूमि प्रशस्त हो सके। उन्होंने लोगों को अल्लाह की अनगिनत अनुकंपाएं याद दिलायीं ताकि संभव है इस प्रकार लोग सीधे रास्ते पर आजायें।

“हे मेरी क़ौम, अपने रब से माफ़ी मांगो और फिर तौबा करो ताकि वह तुम्हारे लिए आसमान से मूसलाधार बारिश बरसाए और तुम्हारी शक्ति में वृद्धि करे और मुंह मोड़कर पाप न करो।”

पापों पर पछताने या तौबा करने से सूखे और अकाल से मुक्ति प्राप्त होती है और बारिश बरसती है, इस प्रकार विकास की भूमि प्रशस्त होती है। इन आयतों में क़ुरान ने पापों से तौबा करने और अल्लाह की ओर पलटने को विकास का कारण बताया है। इस प्रकार क़ुरान ने भौतिक एवं आध्यात्मिक मामलों के बीच सुन्दर तालमेल स्थापित किया है। निःसंदेह जिस समाज में हिंसा, विश्वासघात, पाखंड, अत्याचार और भ्रष्टाचार व्याप्त होता है और उसके सदस्य अपराधों में लिप्त होते हैं वह स्थिर नहीं रहता है और अल्लाह की अनुंकपा एवं रहमत उससे उठ जाती है।

आद समुदाय इतना अधिक भौतिक मामलों एवं लोभ में डूब चुका था कि हज़रत हूद के उपदेशों का उन पर कोई प्रभाव नहीं हो रहा था। वे स्पष्ट रूप से हज़रत हूद से कहते थे कि “हम अपने ख़ुदाओं को नहीं छोड़ेंगे और तुम पर विश्वास नहीं करेंगे।”

ऐसे समय में ईश्वरीय दंड के चिन्ह प्रकट होने लगे और तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। इस दौरान हज़रत हूद उनसे कहते थे कि ईश्वर से क्षमा याचना करो और उसकी ओर पलट आओ। लेकिन इसके बावजूद वे उनकी बात पर कान नहीं धर रहे थे यहां तक कि ईश्वर को प्रकोप उन पर नाज़िल हो गया।

“यह हूद की क़ौम थी जिसने अपने ईश्वर की निशानियों से झुटलाया और उसके दूतों की बात नहीं मानी और वास्तविकता के शत्रुओं का आज्ञापालन किया।

अंततः तेज़ एवं भीषण तूफ़ान आया, उनके मज़बूत क़िले ध्वस्त हो गए और उनके शव हवा के तेज़ झोकों में तितर बितर हो गए। लेकिन हज़रत हूद और उनके विश्वसनीय साथी इस प्रकोप से बचे रहे। हज़रत हूद की क़ौम के जीवन की कथा हर अत्याचारी एवं तानाशाह के लिए एक पाठ है।

सूरए हूद की अगली आयतों में समूद क़ौम और ईश्वरीय दूत हज़रत सालेह के बारे में उल्लेख है। क़ुरान उन्हें भला भाई क़रार देता है जिनका अपनी क़ौम की भलाई के अलावा और कोई उद्देश्य नहीं था।

“और हमने समूद जाति की ओर उनके भले भाई सालेह को भेजा। उसने कहा, हे मेरी क़ौम, अल्लाह की इबादत करो, उसके अलावा तुम्हारा कोई अल्लाह नहीं है, उसी ने तुम्हें धरती से जन्म दिया और उसी ने तुम्हें उस पर आबाद किया, उससे माफ़ी की याचना करो, और उसके बाद उसकी ओर पलट आओ निःसंदेह मेरा रब निकट है और स्वीकार करने वाला है।”

हज़रत सालेह का उद्देश्य भी दूसरे ईश्वरीय दूतों की तरह अपनी क़ौम का मार्गदर्शन था। हज़रत सालेह ने अपनी क़ौम से कहा, एक ईश्वरीय की इबादत करो, उस अल्लाह की जिसने तुम्हें मिट्टी से जन्म दिया और तुम्हे उस पर आबाद किया, किसी को उसका साथी नहीं बनाओ।

लेकिन समूद क़ौम के सदस्यों ने भी हज़रत सालेह की बातों को मानने से इनकार कर दिया। वे अनेक प्रकार के बुतों की पूजा करने लगे और भौतिक लोभ में ग्रस्त हो गए। उन्होंने न केवल हज़रत सालेह की वास्तविक बात को स्वीकार नहीं किया बल्कि ईश्वरीय दूत पर व्यर्थ बातें करने और बड़बड़ाने का आरोप लगाया और कहा, उन्होंने अपनी बुद्धि खो दी है और सोचते हैं कि ईश्वरीय दूत हैं। उन्होंने हज़रत सालेह से कहा कि वे कोई चमत्कार दिखाएं ताकि यह सिद्ध हो सके कि वे ईश्वर के दूत हैं।

ईश्वर ने ऊंट को अपरम्परागत ढंग से जन्म दिया, उसे उन लोगों के पास भेजा और आदेश दिया कि उसे कोई क्षति नहीं पहुंचाएं। न ही उसे कष्ट दें और न ही उसे भड़कायें और न ही उस पर सवारी करें और न ही उसे ज़िब्ह करें। ईश्वर ने उसे पानी पिलाने का दिन निर्धारित किया और एक दूसरे दिन लोगों को पानी से लाभ उठाने के लिए निर्धारित किया, और उन्हें चेतावनी दी कि अगर वे ऊंट को नूक़सान पुहंचायेंगे तो उन पर प्रकोप होगा। लेकिन उन्होंने ईश्वर के आदेश की अवहेलना की और ऊंट को मार डाला और इस प्रकार उन पर ईश्वर का प्रकोप नाज़िल हुआ।

सूरए हूद में अनेक ईश्वरीय दूतों का विवरण पेश किया गया है और उल्लेख किया गया है कि समस्त ईश्वरीय दूतों का उद्देश्य एक ही था। उनका मानना था कि मनुष्य की मुक्ति का एकमात्र मार्ग एकेश्वरवाद में है। इसलिए कि अनेकेश्वरवाद समस्त समस्याओं की जड़ है। उन सभी का नारा ईश्वर के मार्ग में आस्था और स्थिरता था। यद्यपि विभिन्न क़ौमों ने इन महान ईश्वरीय दूतों के सामने अतार्किक प्रतिक्रिया जताई।

दूसरे शब्दों में समाज का वास्तविक सुधार, एक ईश्वर पर विश्वास के अतिरिक्त संभव नहीं है। इसलिए कि किसी भी समाज की एकता एवं समरसता एकेश्वरवाद से प्रेरित होती है। उसके विपरीत अनेकेश्वरवाद विभाजन और फूट का स्रोत है।