जनतंत्र की आड़ में आम जन का लहू पिया जा रहा है

जनतंत्र की आड़ में आम जन का लहू पिया जा रहा है

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Abhay Vivek Aggroia 

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ऐसा न हो कि “न्याय प्रणाली ” पर जनता का विश्वास उठ जाये –आज सभी मीडिया और टीवी में बड़े जोर शोर से इसे उजाला या उठाला जा रहा है –जस्टिस लोदी का रहसमंय निधन और फि र न्याय प्रणाली की धांधले बाजी -जिसके कारण आज चार जजों ने अपनी कहानी जनता के सामने ले कर आयी है जिसे देस के चीफ जस्टिस ने सुनने से इंकार कर दिया .!!
में पूछता हूँ कि ये किस ने समझा लिया कि आम जनता को न्याय प्रणाली पर विश्वास है !
यह व्यवस्था ही ऐसी है जिसमे आम जन को न्याय मिल ही नहीं सकता –कभी कभी कुछ टुकड़े हमारे सामने डाल कर एक आंखमिचोली खेलते रहते हैं और हमसे विश्वासघात करते रहे हैं और करते रहेंगे —-
मैं काफी दिनों से इस से पीछा नही छुड़ा रहा हूँ !
मैं समझ कर या भावनावश लिखता हूँ और महसूस करता हूँ और हर बार एक ही बात पर अटक जाता हूँ
क्या यह केवल अपने अहम को बरक़रार और वृद्धि करने के लिए है ,या फिर एक टीस को शब्दों में ढाल मन को हल्का करने का एक सस्ता सा साधन है .
क्या कोई बदलाव आ पायेगा
जैसे जातपात , धर्म , संस्कार , शोषण , अत्याचार , भ्रष्टाचार , सामाजिक न्याय , दलित-अल्पसंख्यंक-महिलाओं -बच्चों के विशेष मसले; और राजनीती पर मेरा एक मत है और शोध भी करता हूँ.
उसका क्या वजूद होता है ,मैं नही जानता .
मेरा कोई दावा ही नही है कि मैं एक लेखक हूँ –हाँ इस सत्य से भी इंकार नही कि मैं लिखता हूँ और इसमें मैं कोई बेईमानी नही करता साफ लिखने की कोशिश रहती है लेकिन कंही लक्ष्य से कई कदम परे रह जाता हूँ, ऐसा महसूस करता हूँ .
मसलन–
मैं कहना चाहता हूँ कि धर्म का आधार ही समाज विरोधी है,चाहे कोनसा भी धर्म हो
फिर धर्म ग्रंथों के चीथड़े उखाड़ना , चाहे किसी भी धर्म के हों .
भगवान को अपना रास्ता दिखा कर विदा करना चाहता हूँ .
सभी राजनितिक नेताओं के चरित्र और बदचारी को नंगा करना .
न्याय प्रणाली की धोखेबाजी के चीथड़े उखाड़ सब के सामने लाना चाहता हूँ.
पण्डे, पंडित , मौड़े , मौलवी को बताना चाहता हूँ कि तुम्हारा असली मकसद और जगह कहाँ है .
जनतंत्र की आड़ में आम जन का लहू पिया जा रहा है,
फिर मैं सोचता हूँ –
मैं अकेला क्या कर सकता हूँ .
फिर हताश होता हूँ.
तो नए सवेरे में ठीक हो जाता हूँ और कुछ लिखने की फिर ऐक कोशिश करता हूँ-
कोई पढता भी है क्या मेरे ब्लॉग्स को !
मैने फेसबुक पर ऐक ग्रुप शुरू किया हुआ है
विश्वास है कि मेरे साथ ऐक कारवां जुड़ जायेगा
=================अभय===============
—समझें और सामझाएं ——
पहल करें ——पहिये का रुख बदलने का
मुश्किल है ————-नामुमकिन तो नही

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(Abhay Vivek Aggroia)