मस्जिद और इबादत part 9_इस्लाम में मस्जिद की अहमियत!

मस्जिद और इबादत part 9_इस्लाम में मस्जिद की अहमियत!

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इस्लाम एक सामाजिक एवं सामूहिक धर्म है और समाज से कटकर अलग थलग रहकर तपस्या करने का इस्लाम में कोई महत्व नहीं है।

हमने उल्लेख किया था कि इबादत इस्लाम के मूल सिद्धांतों में से एक है और ईश्वर से संपर्क के लिए बेहतरीन स्थान मस्जिद है। मस्जिद एक ऐसा पवित्र स्थान है कि जहां इंसान ईश्वर के अलावा सभी चीज़ों से दूर होकर केवल ईश्वर से संपर्क स्थापित कर सकता है। इसीलिए कुछ लोग एक निर्धारित अवधि तक मस्जिद में ठहरकर ईश्वर की इबादत करते हैं। इबादत के इरादे से मस्जिद में ठहरने को एतकाफ़ कहा जाता है। जिसमें नमाज़, रोज़ा, क़ुरआन की तिलावत और दुआ शामिल है।

इस्लाम ऐतकाफ़ को बंदे के ख़ुद अपनी ओर और अपने पालनहार की ओर पलटने के एक अवसर के रूप में देखता है। इस तरह भौतिक जीवन में डूबे इंसान को ख़ुद को पाने और ईश्वर से संपर्क का अवसर प्राप्त होता है। अर्थात ऐतकाफ़ में इंसान अपनी आत्मिक एवं आध्यात्मिक स्थिति का आंकलन करता है और ईश्वर से अपने संबंध के बारे में चिंतन मनन करता है।

ऐतकाफ़ में नमाज़, रोज़ा, क़ुरान की तिलावत, तौबा और ईश्वर से क्षमा मांगी जाती है। इन समस्त इबादतों का एक ही मूल उद्देश्य होता है और वह है ईश्वर से निकट होना, हालांकि इनमें से प्रत्येक इबादत का एक अलग उद्देश्य भी है। उदाहरण स्वरूप, नमाज़ इंसान को बुराईयों से रोकती है और रोज़ा रखने से धैर्य और सब्र की शक्ति प्राप्त होती है। एतकाफ़ का इन इबादतों के अलावा एक अन्य उद्देश्य भी है और वह है ईश्वर के अलावा हर चीज़ से संपर्क तोड़ लेने का अभ्यास करना।

ऐतकाफ़ करने वाला ऐतकाफ़ के समय अपने समस्त दुनियावी संबंध तोड़ लेता है और अपना सारा समय इबादत करने में बिताता है। वह मस्जिद से बाहर नहीं निकलता है। क़ुरान, नमाज़ और दुआ के अलावा ज़बान पर कोई और बात नहीं लाता है। वह ईश्वर के इच्छा के अनुरूप ही कोई निर्णय लेता है और उसके लिए रोज़ा रखकर पूरा दिन भूखा और प्यासा रहता है और नमाज़ पढ़ता है। वह इबादत में इतना अधिक लीन हो जाता है कि कहता है, हे ईश्वर दुनिया से मेरा संपर्क तोड़कर ख़ुद से जोड़ ले।

ऐतकाफ़ इस्लाम धर्म से ही विशेष नहीं है, बल्कि दूसरे धर्मों में भी पाया जाता है। जैसा कि हज़रत मूसा (अ) के कांधों पर लोगों के मार्गदर्शन की ज़िम्मेदारी थी, लेकिन अपने ईश्वर से संपर्क जोड़ने के लिए तूर पहाड़ पर जाते थे। ईश्वरीय दूत हज़रत सुलेमान बैतुल मुक़द्दस में ऐतकाफ़ करते थे। इसके अलावा हज़रत मरयम और ईश्वरीय दूत हज़रत ज़करिया भी बैतुल मुक़द्दस में ऐतकाफ़ करते थे। हिजाज़ के वे लोग भी जो हज़रत इब्राहीम के अनुयाई थे, अलग थलग स्थान पर जाकर ऐतकाफ़ करते थे। वे लोग सृष्टि के बारे में चिंतन मनन करते थे और सत्य की खोज करते थे। पैग़म्बर की घोषणा से पहले हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) भी हर साल कुछ महीने हिरा नामक ग़ुफ़ा में ऐतकाफ़ करते थे। लेकिन इस्लामी शासन की स्थापना के बाद, पैग़म्बरे इस्लाम ने मस्जिद में ऐतकाफ़ का प्रचार किया। ख़ुद पैग़म्बरे इस्लाम (स) रमज़ान के महीने के अंतिम दस दिनों में मस्जिद में ऐतकाफ़ करते थे। इस तरह से मुसमलानों के बीच एतकाफ़ का रिवाज पैदा हुआ। आज भी विभिन्न इस्लामी देशों में रमज़ान के अंतिम दस दिनों में बहुत ही शानदार तरीक़े से मस्जिदों में एतकाफ़ की व्यवस्था की जाती है। मस्जिदुल हराम, मस्जिदुन्नबी और मस्जिदे कूफ़ा रमज़ान में एतकाफ़ के लिए विशेष स्थान हैं।

मस्जिदे कूफ़ा इस्लाम की चार प्रमुख मस्जिदों में से एक है। यह मस्जिद इराक़ के कूफ़ा नगर में स्थित है। मस्जिदे कूफ़ा मक्के में मस्जिदुल हराम और मदीने में मस्जिदुन्नबी के बाद इस्लामी जगत की सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, यहां तक कि कुछ विद्धवानों ने इसे मस्जिदुल अक़सा से अधिक महत्वपूर्ण बताया है। कुछ हदीसों के मुताबिक़, प्रथम ईश्वरीय दूत हज़रत आदम (अ) ने इस मस्जिद की बुनियाद रखी थी, उसके बाद हज़रत नूह (अ) ने तूफ़ान के बाद उसका पुनर्निमाण किया। इतिहास में है कि हज़रत अली ने कूफ़े के लोगों से कहा, ईश्वर ने तुम्हें एक ऐसी चीज़ प्रदान की है जो दूसरों को नहीं दी, ईश्वर ने इस स्थान (मस्जिदे कूफ़ा) को विशेष विशिष्टता प्रदान की है। यह मस्जिद, आदम का घर, नूह का स्थान, इदरीस का गंतव्य, इब्राहीमे ख़लील का मुसल्ला या नमाज़ पढ़ने का स्थान और मेरे भाई ख़िज़्र और मेरी नमाज़ का स्थान है। एक समय आएगा जब यही मस्जिद, अंतिम ईश्वरीय मुक्तिदाता और हर मोमिन की नमाज़ का जगह होगी। कभी भी उससे दूर न होना और उससे संपर्क नहीं तोड़ना। इसमें नमाज़ पढ़ो और उस नमाज़ के ज़रिए ईश्वर के निकट हो जाओ और अपनी ज़रूरतों को ईश्वर के समक्ष पेश करो।

इमाम सादिक़ ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) के हवाले से इस संदर्भ में फ़रमाया है, निश्चित रूप से यह स्वर्ग के बागों में से एक बाग़ है, निश्चित रूप से उसमें वाजिब नमाज़ पढ़ना हज़ार नमाज़ों के बराबर है और सुन्नत नमाज़ पढ़ना पांच सौ नमाज़ों के बराबर है, उसमें तिलावत और ईश्वर का नाम जपने के बिना ही बैठना इबादत है। अगर लोगों को यह पता चल जाए कि उसका क्या महत्व है तो उसकी ओर जायेंगे, यहां तक कि बच्चों की तरह ख़ुद को ज़मीन पर खींचकर ले जायें।

सन् 17 हिजरी को जब मुसलमानों की सेना वर्तमान ईरान-इराक़ की सीमा पर पहुंची तो तत्कालीन ख़लीफ़ा ने सलमाने फ़ार्सी और हुज़ैफ़ा बिन यमान को ज़िम्मेदारी दी कि सेना के पड़ाव के लिए कोई उचित स्थान तलाश करें। वे इधर उधर गए और कूफ़े का चयन किया। उन्होंने वहां दो रकअत नमाज़ पढ़ी और ईश्वर से प्रार्थना की कि उस स्थान को शांति और स्थिरता का स्थान क़रार दे। उस स्थान पर सबसे पहला जो निर्माण किया गया वह कूफ़े की मस्जिद थी। इसलिए कि प्राचीन काल में किसी भी शहर के निर्माण के समय सबसे पहले मस्जिद के लिए जगह निर्धारित की जाती थी, उसके बाद उस मस्जिद तक आसानी से पहुंचने को मद्देनज़र रखकर सड़कों का डिज़ाइन तैयार किया जाता था। दूसरे शब्दों में मस्जिद शहर का केन्द्र होती थी और उसके चारो ओर घर और प्रशासनिक कार्यालयों का निर्माण किया जाता था। अभी भी इस्लामी शहरों के पुराने इलाक़ों में इस तरह की इमारतों को देखा जा सकता है।

इससे इस्लामी समाज में मस्जिदों के महत्व और भूमिका का पता चलता है। मस्जिदे कूफ़ा भी शुरू से ही शहर का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रही है। सन् 36 हिजरी में जब हज़रत अली ने कूफ़े में प्रवेश किया, तो सबसे पहले मस्जिदे कूफ़ा में गए और वहां लोगों को संबोधित किया। मस्जिदे कूफ़ा में विभिन्न स्थान विभिन ईश्वरीय दूतों और उसके विशिष्ट प्रतिनिधियों के नामों से विशेष हैं। इन स्थानों को मक़ाम कहते हैं। इन मक़ामों में विशेष इबादत की सिफ़ारिश की गई है।

इन मक़ामों में से एक जो मुसलमानों विशेषकर शियों के लिए विशेष महत्व रखता है, हज़रत अली की मेहराब है। यह स्थान पैग़म्बरे इस्लाम (स) के प्रथम प्रतिनिधि हज़रत अली के नमाज़ पढ़ने का विशेष स्थान है। इसी मेहराब में ख़्वारिज के एक तत्व इब्ने मुलजिम मुरादी ने सजदे के दौरान हज़रत अली के सिर पर तलवार से वार किया था। हज़रत अली के सिर में गहरा घाव हो गया और उनका चेहरा ख़ून से लथपथ हो गया और वे मेहराब में ही गिर पड़े और फ़रमाया, काबे के रब की क़सम मैं कामियाब हो गया।

मस्जिदे कूफ़ा में दक्कतुल क़ज़ा एक ऐसा स्थान है, जहां हज़रत अली मुक़दमों का फ़ैसला किया करते थे। इस जगह पर एक छोटा सा स्तंभ था, जिस पर यह आयत लिखी हुई थी, ईश्वर न्याय और भलाई का आदेश देता है। मस्जिदे कूफ़ा का सातवां स्तंभ हज़रत आदम (अ) के मक़ाम के नाम से जाना था। यह वह स्थान है, जहां ईश्वर ने हज़रत आदम की तौबा स्वीकार की थी। इसी प्रकार, हज़रत अली इस स्तंभ के निकट नमाज़ पढ़ते थे, इसीलिए वह मक़ामे अमीरुल मोमेनीन के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

इस मस्जिद का एक स्तंभ हज़रत जिबरईल के नाम से मशहूर है। शबे मेराज में पैगम़्बरे इस्लाम (स) मस्जिदुल हराम से मस्जिदुल अक़सा की ओर जब जा रहे थे और जब इस स्थान पर पहुंचे तो जिबरईल ने कहा, हे पैग़म्बरे इस्लाम, अब आप मस्जिदे कूफ़ा के निकट हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वर की आज्ञा से इस मस्जिद में दो रकअत नमाज़ पढ़ी।

इस पवित्र मस्जिद में एक स्थान मक़ामे हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन से विशेष है। इतिहास में है कि अबू हमज़ा समाली कहते हैं, एक दिन मैं मस्जिदे कूफ़ा में बैठा हुआ था। मैंने एक बहुत ही सुन्दर व्यक्ति को देखा, जो पाक साफ़ वस्त्रों में मस्जिद में दाख़िल हुआ और सातवें स्तंभ के पास खड़ा हो गया। उसने वहां 4 रकअत नमाज़ पढ़ी। जब मैंने ग़ौर किया तो देखा हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन हैं। मैंने उनके पवित्र हाथों को चूमा और मस्जिद में आने का कारण पूछा। उन्होंने फ़रमाया, मस्जिदे कूफ़ा में नमाज़ के लिए। सफ़ीनए नूह मस्जिदे कूफ़ा के विशेष स्थानों में से है। यह वह स्थान है, जहां हज़रत नूह की नाव ठहरी थी।