लफ़्ज़ खो आए हैं मानी अपने, बात कह दें ख़मोशियां शायद!

लफ़्ज़ खो आए हैं मानी अपने, बात कह दें ख़मोशियां शायद!

Posted by

Dhruv Gupt
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कुछ हवा में हैं तल्खियां शायद
आंधियों में हो कुछ बयां शायद

लफ़्ज़ खो आए हैं मानी अपने
बात कह दें ख़मोशियां शायद

अभी ज़िस्मों की आंच बाकी है
आज उजड़ा है आशियां शायद

उस जगह हर कोई अकेला है
जिस जगह हैं बुलंदियां शायद

बच्चे उलझे हैं किताबों में अभी
मुंतज़िर होंगी तितलियां शायद

कितनी गहरी उदासियां हैं अभी
नींद कुछ दे तसल्लियां शायद

रब है ऊपर, ज़मीन पर हम हैं
बीच में है बहुत धुआं शायद

ख़त लिखेंगे उन्हें सलीके से
आज़ कांपेंगी उंगलियां शायद

ध्रुव गुप्त
पेंटिंग – कुंवर रवीन्द्र