शहंशाहे बग़दाद “हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रअ की बारगाह में सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी!

शहंशाहे बग़दाद “हज़रत शेख़ अब्दुल क़ादिर जिलानी रअ की बारगाह में सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी!

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Mohammad Arif Dagia
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#ग़ौसे आज़म दस्तगीर पीरों के पीर हैं जिनका सूरज क़यामत तक अस्त नही होगा .” शहंशाहे -बग़दाद ” हजरत शेख अब्दुल कादिर जिलानी ( रहमतुल्लाह अलैह ) ने उस दौर में मृतप्राय पड़े इस्लाम को दुबारा जिंदा किया, जिसके कारण आपको ” मोहियुद्दीन ” याने दीन -इस्लाम को जिंदा करने वाला -कहा जाता है. आप अल्लाह के ऐसे मुक़द्दस वली हैं जिन्हें ” पीरों का पीर ” कहा जाता है. .आपकी ही तहरीक का असर था कि दुनिया ए इस्लाम ने सलाहुद्दीन अय्यूबी जैसा मुजाहिदे आज़म देखा जिन्होंने बरसों से बातिल ताक़तों के क़ब्ज़े में पड़े बैतूल मुक़द्दस को आज़ाद किया और वहां परचमे इस्लाम लहरा दिया । आपको मालूम ही होगा की हज़रत सलाहुद्दीन अय्यूबी के वालिद मोहतरम आपके बचपन के दौर में आपको हुज़ूर ग़ौसे आज़म की बारगाह में ले कर गए थे और हुज़ूर ग़ौसे आज़म से दरख्वास्त की कि हुज़ूर ! इस बच्चे के लिए दुआ कर दीजिये कि अल्लाह इसको दीन का मुजाहिद बनाये !!!
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हुज़ूर ग़ौसे आज़म ने क्या क्या दुआएं की होंगीं और किन किन नेमतों से नवाज़ा होगा ; इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि आज गुलामी की बेड़ियों में कराह रहे फिलिस्तीन को फिर किसी सलाहुद्दीन अय्यूबी की तलवार और ग़ौसे आज़म की उन्ही दुआओं का इंतज़ार है ;जिसने इतिहास का रुख बदल कर रख दिया था ///

.यहाँ मैं हजरत ग़ौसे आज़म रज़ि अल्लाहो तआला अन्हो का ही लिखा हुआ एक कसीदा पेश कर रहा हूँ ,जिसमे आप जमाते-अवलिया और गिरोहे -सुफिया से मुखातिब हैं और अपने उस मंसबे-वाला ( बुलंद दर्जे ) की की तरफ इशारा करते हैं जो बारगाहे -नबुव्वत से आपको अता किया गया है ///
.इससे पहले मैं शेख हजरत अब्दुल हक मुहद्दीस देहलवी ( रहमतुल्लाह अलैह )की किताब ” जुबदतुल असरार ” में लिखे उनके ये शब्द पेश कर रहा हु , जिनमे हुजुर गौसे आज़म ( रहमतुल्लाह अलैह ) फरमाते हैं —

“मेरी आँखें लौहे-महफूज़ में रहती हैं और मैं अल्लाह के इल्मों के समन्दरों में गोता लगाता हूँ”/ //
हजरत का लिखा हुआ कसीदा पढ़िये और अपने ईमान को कुव्वत और अपने अकीदे को ताजगी दीजिये ///

………कसीदा -गौसिया ……
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सागर भरे हैं इश्क ने बज्मे-विसाल के ,
ला, जिस क़दर भी खुम हैं शराबे -जमाल के ///

आवाज़ दे रहा हूँ के अकताबे-दहर आओ ,
ख्वाहाँ हो तुम अगर अभी इसलाहे-हाल के ///

मैं तो गरीक जल्वए हुस्ने क़दीम हूँ ,
काफी करम हैं मुझको मेरे जुल जलाल के ///

मेरा बड़ा घराना है , दादा हसन मेरे ,
हैं पाँव गर्दनों पे तमामी रिजाल के ///

हूँ जिरहबाज़ सारे सुयुखाने -दहर का ,
किस को मिले हैं औज ये फज्लो-कमाल के ///

मुर्दा अगर सुने जो भी मेरे राज़ को ,
जी उठे , ये करम हों मेरे जुल जलाल के ///

सब मुल्क मेरे सामने यूं हैं कि ख़ाक पर ,
फेंके हो जैसे राई के दाने उछाल के ///

पानी समन्दरों में न बाकी रहे कहीं ,
मैं उनपे खोल दूं जो रमूज अपने हाल के ///

यानी नबी ए हाशिम , मक्की शहे-हिजाज़ ,
सदक़ा उन्ही का हैं ये मरातिब कमाल के ///

( मोहम्मद आरिफ दगिया )

12/01/2018