सच के लिए बोलोगे तो अकेले ही अपनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी

सच के लिए बोलोगे तो अकेले ही अपनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी

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Pratima Jaiswal
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‘सभी को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है.’ सबसे पहले स्कूल के दिनों में ये बात सुनी थी. जिसे समझा कॉरपोरेट की दुनिया में आकर. बहरहाल, ऑफिस में हर दिन इस बात को सच होते पाया. कई बार ऐसा महसूस हुआ कि अगर आपकी बात गलत है और उसे 2-4 ऊंचे औदे वाले लोगों का समर्थन मिल जाता है, तो आप आधी लड़ाई तो ऐसे ही जीत जाते हैं. वहीं सच के लिए बोलोगे, तो अकेले ही अपनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. कोई नहीं आने वाला.
अब आपको अकेले लड़ने की आदत पड़ चुकी होती है. लड़ना यानि अपने लिए बोलना. खुद को सही साबित करने के लिए नहीं बल्कि वो आपको गलत साबित कर रहे हैं इसलिए बोलना. इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में आप कब अकेले खड़े रहकर मजबूत हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता. अब यहां से एक और कहावत दबे पैर आ जाती है ‘मजबूत होने का सबसे बड़ा नुकसान ये है कि कोई भी आपकी तरफ हाथ नहीं बढ़ाता क्योंकि उन्हें पता है कि आप मजबूत हैं. उनके मुताबिक आपको किसी बात से फर्क नहीं पड़ता.
बचपन में मुझे लगता कि कोई मेरे लिए भी बोले कि मुझे लगे कि फलां को मेरी फिक्र है. मेरे लिए किसी से भी लड़ जाए. फिर इस एक उम्मीद ने वक्त आने पर कई सो कॉल्ड दोस्तों के नकाब उतारे. कभी किसी ने अपने निजी रिश्ते खराब होने के डर से चुप्पी साधे रखी, तो कभी फायदों के चलते चुप रहे. धीरे-धीरे जो जान से प्यारे थे, वहीं जान लेने लगे. फिर आदत पड़ गई, उन खास लोगों के बिना रहने की और अकेले खड़े रहने की भी.
अब जब लोग किसी और के लिए मुझसे लड़ने आते हैं, तो चेहरे पर एक मुस्कान ही आती है. मन धीरे से कहता है ‘अरे यार ये तो मेरा सपना था’.
खैर, यादों के डिब्बे में एक शख्स कभी-कभी याद आ जाते हैं. ‘अमन भईया’ जो एकलौते ऐसे इंसान रहे, जिन्होंने मेरे लिए एक दिन सभी के सामने कितनी ही गालियां खाई थी.
जब मैं फ्रेशर थी और नया-नया ऑफिस ज्वाइन किया था. ऑफिस में किसी बात पर एक सीनियर ने मुझे कुछ कहा, बीच में ही वो बहस में कूद पड़े थे और 1 घंटे तक सुनते रहे.
धीरे-धीरे वक्त बीतता गया और अमन भईया जाने कहां चले गए. वो उम्र में मुझसे काफी बड़े थे, लेकिन दिल से बच्चे थे.
लोग कहते हैं कि मुझे किसी की जरूरत नहीं है. ये सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. यही जवाब दे पाती हूं ‘हां, सच में मुझे किसी की भी जरूरत नहीं. खैर. हर कोई जवाब समझ नहीं पाता और हमें समझाना नहीं आता.
‍~प्रतिमा