इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 19

इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 19

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बच्चों की हत्या हर इंसान के दिल को दहला देती है।

इंसान क़त्ल किए गए बच्चों के शवों को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। लेकिन आज ख़ुद मां बाप एक बड़ी संख्या में अपने ही बच्चों को पैदा होने से पहले ही ख़त्म कर देते हैं और उन्हें दुनिया में आकर ज़िंदगी गुज़ारने के अधिकार से वंचित कर देते हैं।

क़ुराने मजीद के सूरए अनआम की 151वीं आयत में ईश्वर बच्चों की हत्या से रोकता है। ईश्वरीय दूत हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) की ज़िम्मेदारी है कि ईश्वर के संदेश को लोगों तक पहुंचाएं, कह दो, आओ तुम्हारे पालनहार ने जो तुम्हारे लिए हराम किया है, उसकी तुम्हें जानकारी दूं, ग़रीबी और भुखमरी के डर से अपने बच्चों की हत्या मत करो, यह वह चीज़ है जिसकी ईश्वर ने तुमसे सिफ़ारिश की है, शायत इसे समझ सको।

भ्रूण हत्या एक ऐसा अपराध है, जो प्राचीन काल से जाहिल समाजों में प्रचलित रहा है। अज्ञानता के ज़माने में बहुत से समुदाय अपने बच्चों की हत्या कर दिया करते थे। वे इसके विभिन्न कारण बयान करते थे। कभी अपनी लड़कियों की हत्या किया करते थे। इसलिए कि उनका मानना था कि अगर युद्ध भड़क उठे और उनकी बेटियों को बंदी बना लिया जाएगा तो यह उनके लिए कलंक होगा।

क़ुराने मजीद के सूरए नहल की 58वीं आयत में उल्लेख है, अरब में अज्ञानता के दौर में जब यह सूचना मिलती थी कि तुम्हारे यहां बेटी हुई है, तो ग़ुस्से से उनका चेहरा काला पड़ जाता था, इस बुरी ख़बर को सुनकर और आम लोग जो इसे बुरा समझते थे, उनके दबाव में आकर वे छुप जाते थे और गहरी चिंता में पड़ जाते थे कि क्या इस शिशु को ज़िंदा रहने दें और बेटी का बाप होने के अपमान को सहन करें या ज़िंदा ही उसे मिट्टी में दबा दें, जैसा कि अधिकांश लोग नवजात बेटियों के बारे में किया करते थे।

कभी कभी सूखा पड़ने के डर से अपने बच्चों की हत्या कर दिया करते थे। इस संदर्भ में क़ुरान उनसे कहता है, ग़रीबी के डर से अपने बच्चों की हत्या मत करो। हम उन्हें भी और तुम्हें भी आजीविका प्रदान करते हैं।

कभी कभी मूर्तियों के सामने अपने बच्चों की बलि चढ़ा दिया करते थे, ताकि उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें। इस जघन्य अपराध से भी क़ुरान ने रोका है, सूरए अनआम की 140वीं आयत में ईश्वर कहता है, निश्चित रूप से जिन लोगों ने अज्ञानता और नादानी के कारण अपने बच्चों की हत्या की है, घाटे में हैं, इसलिए कि ईश्वर ने उन्हें जो रिज़्क़ दिया था, उन्होंने उसे ख़ुद से दूर कर दिया।

एक एकेश्वरवादी और ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त, बच्चों की हत्या न करना है। इस प्रकार से कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) से महिलाओं के बैयत करने की एक शर्त यह है कि उन्होंने अपने बच्चों की हत्या नहीं की हो। सूरए मुमतहना की 12 आयत में पैग़म्बरे इस्लाम से ईश्वर कहता है, हे ईश्वरीय दूत, जब महिलाएं तुम्हारे पास आएं और बैयत करें, वे अपने बच्चों की हत्या न करें, तो उनकी बैयजत स्वीकार कर लो।

इस्लाम ऐसे लोगों के कृत्य की कड़ी निंदा करता है, जो ग़रीबी और भुखमरी के डर से अपने बच्चों या बेटियों की हत्या कर देते हैं। इसके अलावा, इस्लाम भ्रूण हत्या को हराम क़रार देता है।

इस्लामी शिक्षाओं के मुताबिक़, भ्रूण हत्या विशेषकर उसमें जान पड़ने के बाद, एक प्रकार की नस्ल कुशी है और क़ुरान इसे महा पाप बताता है। क़ुराने मजीद के सूरए इसरा की 31वीं आयत में ईश्वर कहता है, ग़रीबी के डर से अपनी संतान की हत्या न करो, हम उन्हें और तुम्हें रिज़्क़ देते हैं, निश्चित रूप से उनकी हत्या महा पाप है।

भ्रूण हत्या से अभिप्राय यह है कि गर्भ में ही भ्रूण को मार देना और कोई भी ऐसा कार्य करना जिससे वह ज़िंदा न बच सके। भ्रूण हत्या संभव है गर्भवति महिला द्वारा जानबूझकर कुछ ऐसा करने या दवाई लेने के कारण हो, या डॉक्टर या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भ्रूण को नुक़सान पहुंचाकर यह अपराध किया जाए।

दूर्भाग्यवश आज भी हम देखते हैं कि प्रति वर्ष लाखों भ्रूण हत्याएं होती हैं। आज अधिकांश भ्रूण हत्याओं का कारण यह है कि आज के लोग निरंकुशता से जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। वर्षों से अनिच्छुक गर्भधारण के लिए गर्भपात कराने की समस्या आज के समाज में बहस का विषय बनी हुई है।

ख़राब स्वास्थ्य सेवाओं और अनाड़ी चिकित्सकों द्वारा गर्भपात के कारण विश्व में प्रतिवर्ष लाखों महिलाएं अपनी जान दे देती हैं और आज यह समस्या एक संकट का रूप धारण कर चुकी है। इससे महिलाओं के स्वास्थ्य को काफ़ी ख़तरा है।

फ़ेमिनिस्ट्स या नारीवादियों का कहना है कि इंसान होने के रूप में हर महिला को अपने शरीर और जान पर अधिकार प्राप्त है, इस वैध अधिकार के आधार पर उसे गर्भपात का हक़ हासिल है। इस दृष्टिकोण के मुताबिक़, भ्रूण जब तक गर्भ में है, उस समय तक वास्तव में वह मां के शरीर का ही एक भाग है और किसी भी समस्या के कारण मां को यह अधिकार हासिल है कि वह उसे ख़ुद से जुदा कर दे।

हालांकि वास्तविकता यह है कि भ्रूण मां के शरीह का हिस्सा नहीं है, बल्कि ख़ुद एक पूर्ण इंसान है या होने वाला है। इंसान होने के नाते उसका वही सम्मान है जो मां का है।

इस्लाम, गर्भ में पलने वाले बच्चे या भ्रूण के जीवन के लिए सम्मान का क़ायल है। इस्लामी दृष्टिकोण के मुताबिक़, भ्रूण भविष्य का एक व्यक्ति है, जिसमें मानवीय चरणों को तय करने की योग्यता पायी जाती है, अन्य इंसानों की भांति जीवन समेत उसे समस्त अधिकार प्राप्त हैं। इसलिए गर्भपात द्वारा उसके जीवन का अंत करना एक अपराध है और जो यह अपराध करेगा, वह सज़ा का पात्र है। इसलिए कि इंसान का अस्तित्व दो सेल्स या कोशिकाओं के मिलने से वजूद में आता है, क़ुरान के मुताबिक़, किसी भी चरण में उसे नष्ट करना मानवता को नष्ट करने के समान है।

इसी प्रकार हर व्यक्ति की बुद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि अत्याचार करना बुरा है। इसलिए कि अत्याचार से अत्याचारग्रस्त व्यक्ति के अधिकार का हनन होता है। जवीन, हर इंसान का अधिकार है। अगर किसी से यह अधिकार छीन लिया जाएगा तो यह उस पर अत्याचार होगा और उसके अधिकार का हनन। गर्भपात से भ्रूण के जीवन के अधिकार को छीन लिया जाता है, इसलिए यह अत्याचार है।

इस्लामी शिक्षाओं पर ध्यान देने से पता चलता है कि भ्रूण के विभिन्न चरण होते हैं, उनमें से सबसे महत्वपूर्ण उसमें जान पड़ने से पहले और उसके बाद का चरण है। भ्रूण में जब जान पड़ चुकी होती है तो वह गर्भ में हिलने जुलने लगता है, सामान्य रूप से यह गर्भ धारण के चार महीने बाद होता है। जिस भ्रूण में जान पड़ चुकी होती है, वह इंसान की श्रेणी में आता है और उसकी हत्या करना एक इंसान की हत्या करने के समान है।

हालांकि कुछ इस्लामी विद्वानों के मुताबिक़, इस्लाम में विशेष परिस्थितियों में गर्भपात हराम नहीं है। ऐसी स्थिति में कि जब मां की जान को ख़तरा हो तो गर्भपात कराया जा सकता है। इसी प्रकार भ्रूण के गर्भ में रहने से मां की जान को गंभीर ख़तरा हो, इस प्रकार से कि या मां की जान बच सकती है या केवल भ्रूण की जान। ऐसी स्थिति में शरीअत की दृष्टि में मां की जान को बचाना अधिक महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार जब यह सुनिश्चित हो जाए कि मां के गर्भ में मौजूद भ्रूण पूरा नहीं है।