#फुरसतनामा : स्त्री कामुकता बनाम चरित्रहीनता

#फुरसतनामा : स्त्री कामुकता बनाम चरित्रहीनता

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ज्युडिथ का कहना है कि यदि सेक्सुअलिटी हमारी ज़िंदगी को पैशनेटली जीने की ताक़त देती है तो इसे सहज दिनचर्या से कट ऑफ करके हम अपनी फीलिंग पावर कम करते हैं। कामुकता हर जीवित प्राणी के व्यवहार का सहज हिस्सा है तो इसे लैंगिकता के आधार पर विभाजित करना गलत है। यदि पुराणों, उपनिषदों में धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष को जीवन के प्रमुख आधार स्तम्भ माने गए हैं तो कामुकता शब्द आते ही सबके कान क्यों लाल हो जाते हैं?? उस पर यदि सवाल स्त्री कामुकता की आये तो यह मुद्दा मूलभूत शारीरिक हार्मोनल प्रकृति की जगह वह चरित्रहीनता का मुद्दा मान लिया जाता है।
मज़े की बात देखिये हिंदी फिल्मों में गाँव के ज़मीदार का बेटा पनघट जाती ग्वालन का आँचल खींच ले तो सेंसर बोर्ड को समस्या नही है। स्मूच, फ्रेंच किस, चमकदार शरीर दिखाती नायिकाओं के डबल मीनिंग के आइटम सांग्स सब सेंसर सर्टिफिकेट लेकर स्क्रीन पर आ जाते हैं। गौरतलब है ये सभी पुरुष कामुकता को संतुष्ट करने वाले सीन हैं। ऑडिएंस को लुभाया जाता है या मेल ऑडिएंस??

अब बात आती है फायर या मार्गरीटा विथ स्ट्रॉ की…दोनों ही फिल्मों की नायिकाएं महिला कामुकता का उत्सव मनाती हैं। स्त्रियों के समलैंगिक सम्बन्ध हो या हस्तमैथुन का…एक सहज शारीरिक वृत्ति है। लगभग हर औरत हस्तमैथुन करती है , जो सामान्य है लेकिन वह दबी जुबान में भी यह यदि स्वीकार कर ले तो उसे चरित्रहीन होने का टैग लादना होगा। इन दोनों फिल्मों में ऐसा ही कुछ समाहित रहा लेकिन इस पर जबरदस्त सेंसर लगा..क्यों??? दरअसल सिर्फ भारत नही बल्कि कई बाहर के देशों में भी स्त्री कामुकता को केवल पुरुष कामुकता को संतुष्ट करने का साधन मात्र माना गया है। स्त्री और पुरुष कामुकता को लेकर समाज में यह विरोधाभास क्यों…?? अगर स्त्री बाँझ है या किशोरी को समय से मासिक न हो तो यह चिंता का मुद्दा होता है, समाज में उन्हें उचित सम्मान नही मिलता तो कामुकता का होना तो सामान्य हुआ न???

स्त्री की कामुकता हेय क्यों?

इसकी वजह है कामुकता की गलत सामाजिक परिभाषा को समाज में मान्यता प्राप्त होना। कामुकता’ पद के मूल में ‘काम’ शब्द है परन्तु कामुकता केवल ‘काम’ अर्थात् ‘सेक्स’ मात्र नहीं हैं। यह मात्रजैविक या शारीरिक नहीं है। दरअसल कामुकता जितनी जैविक है यह उतनी ही सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भी है। जीवविज्ञान, मनोविज्ञान, मानवविज्ञान, चिकित्साविज्ञान, इतिहास और समाजशास्त्र के अध्येताओं ने अपने-अपने विषयों के आधार पर कामुकता को परिभाषित किया क्योकि मानव कामुकता में जैविक क्षमता, मनोवैज्ञानिक विशेषताएं, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव निहित हैं। जीव विज्ञानी हमें कामुक उत्तेजना और उसकी प्रतिक्रिया देने वाले शारीरिक तंत्र की जानकारी देते हैं तो मनोवैज्ञानिक यह बताते हैं कि कैसे हमारा यौन-व्यवहार और मनोवृत्ति हमारी अनुभूति, समझ, विचार, भाव, व्यक्तित्व और प्रेरणा आदि से आकार पाते हैं। समाज और संस्कृति के अध्येता यौन-व्यवहार और धर्म, जाति एवं वर्ग आदि के संबंधों की पड़ताल करते हैं। तो मानवविज्ञानी विभिन्न संस्कृतियों में यौन-व्यवहारों की समानता और असमानता का अध्ययन प्रस्तुत करते हैं।

चूंकि मैं यहाँ आज स्त्री कामुकता की बात कर रही हूँ तो जातिका एक लड़की ही रहे तो सही होगा। लड़की अगर किशोर अवस्था में आती है, प्रकृति उसके नितम्ब गोल करती है,वक्ष उन्नत करती है।उसके शरीर के साथ मन भी काम को लेकर कौतुक हो जाता है। उसका सजना सँवरना, तरह तरह की ड्रेसेज़ पहनना, लड़कों की तरफ आकर्षित होना, सेक्स को लेकर उत्सुक होना सब उसकी कामुकता ही है, जो इस संसार को चलाने के लिए ज़रूरी है। मोर का पंख पसार कर नाचना और मोरनी को आकर्षित करना भी कामुकता है, मेंढ़क का टर्राना भी कामुकता है। कामुकता को डर्टी सेक्स प्रैक्टिस से अलग करके यदि समझ लिया जाता तो फायर या मार्गरीटा विथ द स्ट्रॉ जैसी फिल्मों को न सेंसर बोर्ड बैन करता, स्त्री कामुकता को उसके चरित्र का काला पक्ष समझा जाता। मेरे लिए जितना एक स्त्री होना गर्व की बात है, मासिक रजस्वला होना सामान्य बात है तो कामुक होना भी सहज बात है। स्त्री कामुकता को उसके सौंदर्य का पक्ष मानकर स्वीकारें, उसकी कामेच्छा को कलुषित या पोषित भाव से न देख कर,सहज वैज्ञानिक प्राकृतिक वृत्ति मानकर स्वीकार करें। देखियेगा समाज में स्त्री पुरुष सम्बन्धों में सकारात्मक परिवर्तन आयेगा।