भारत का इतिहास पार्ट 47 : पूर्व मध्यकालीन भारत-240 ईपू– 800 ई_गुर्जर प्रतिहार वंश

भारत का इतिहास पार्ट 47 : पूर्व मध्यकालीन भारत-240 ईपू– 800 ई_गुर्जर प्रतिहार वंश

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गुर्जर
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गुर्जर समाज, प्राचीन एवं राज्य करने वाले समाज में से एक है। गुर्जर अभिलेखो के अनुसार ये सूर्यवंश या रघुवंश से सम्बन्ध रखते हैं। प्राचीन महाकवि राजसेखर ने गुर्जरो को रघुकुल-तिलक तथा रघुग्रामिणी कहा है।7वीं से 10वीं शताब्दी के गुर्जर शिलालेखो पर सूर्यदेव की कलाकृतिया भी इनके सूर्यवंशी होने की पुष्टि करती है।राजस्थान में आज भी गुर्जरो को सम्मान से मिहिर बोलते हैं, जिसका अर्थ सूर्य होता है।कुछ इतिहासकरो के अनुसार गुर्जर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र (अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए आर्य योद्धा थे। संस्कृत के विद्वानों के अनुसार, गुर्जर शुद्ध संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ शत्रु का नाश करने वाला अर्थात् शत्रु विनाशक होता है।प्राचीन महाकवि राजशेखर ने गुर्जर नरेश महिपाल को अपने महाकाव्य में दहाड़ता गुर्जर कह कर सम्बोधित किया है।

गुर्जर साम्राज्य
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इतिहास के अनुसार 5वी सदी में भीनमाल गुर्जर साम्राज्य की राजधानी थी तथा इसकी स्थापना गुर्जरो ने की थी। भरुच का साम्राज्य भी गुर्जरो के अधीन था। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग अपने लेखों में गुर्जर साम्राज्य का उल्लेख किया है।

छठी से 12 वीं सदी में गुर्जर कई जगह सत्ता में थे। गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी। मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बंगाल के पाल वंश और दक्षिण-भारत के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी। 12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए। अरब आक्रान्ताओं ने गुर्जरो की शक्ति तथा प्रशासन की अपने अभिलेखों में भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

इतिहासकार बताते है कि मुग़ल काल से पहले तक राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा (गुर्जरो से रक्षित देश) या गुर्जर-भूमि के नाम से जाना जाता था।अरब लेखकों के अनुसार गुर्जर उनके सबसे भयंकर शत्रु थे तथा उन्होंने ये भी कहा है कि अगर गुर्जर नहीं होते तो वो भारत पर 12वीं सदी से पहले ही अधिकार कर लेते।

गुर्जर प्रतिहार वंश
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‘प्रतिहार वंश’ को गुर्जर प्रतिहार वंश (छठी शताब्दी से 1036 ई.) इसलिए कहा गया, क्योंकि ये गुर्जरों की ही एक शाखा थे, जिनकी उत्पत्ति गुजरात व दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में हुई थी। प्रतिहारों के अभिलेखों में उन्हें श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है, जो श्रीराम के लिए प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य करता था। कन्नड़ कवि ‘पम्प’ ने महिपाल को ‘गुर्जर राजा’ कहा है। ‘स्मिथ’ ह्वेनसांग के वर्णन के आधार पर उनका मूल स्थान आबू पर्वत के उत्तर-पश्चिम में स्थित भीनमल को मानते हैं। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार उनका मूल स्थान अवन्ति था।

गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक
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-नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.)
-वत्सराज (783 – 795 ई.)
-नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.)
-मिहिरभोज (भोज प्रथम) (836 – 889 ई.)
-महेन्द्र पाल (890 – 910 ई.)
-महिपाल (914 – 944 ई.)
-भोज द्वितीय
-विनायकपाल
-महेन्द्रपाल द्वितीय
-देवपाल (940 – 955 ई.)
-महिपाल द्वितीय
-विजयपाल
-राज्यपाल
-यशपाल