भारत का इतिहास पार्ट 48 : पूर्व मध्यकालीन भारत-240 ईपू– 800 ई_गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक

भारत का इतिहास पार्ट 48 : पूर्व मध्यकालीन भारत-240 ईपू– 800 ई_गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक

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गुर्जर-प्रतिहार वंश के शासक
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-नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.)
-वत्सराज (783 – 795 ई.)
-नागभट्ट द्वितीय (795 – 833 ई.)
-मिहिरभोज (भोज प्रथम) (836 – 889 ई.)
-महेन्द्र पाल (890 – 910 ई.)
-महिपाल (914 – 944 ई.)
-भोज द्वितीय
-विनायकपाल
-महेन्द्रपाल द्वितीय
-देवपाल (940 – 955 ई.)
-महिपाल द्वितीय
-विजयपाल
-राज्यपाल
-यशपाल

नागभट्ट प्रथम

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नागभट्ट प्रथम गुर्जर प्रतिहार वंश का प्रथम ऐतिहासिक पुरुष था। इसे ‘हरिशचन्द्र’ के नाम से भी जाना जाता था।

हरिशचन्द्र की दो पत्नियाँ थीं- एक ब्राह्मण थी और दूसरी क्षत्रिय।
माना जाता है कि, ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न पुत्र ‘माला’ पर शासन कर रहा था तथा क्षत्रीय पत्नी से उत्पन्न पुत्र जोधपुर पर शासन कर रहा था।
किन्तु इस वंश का वास्तविक महत्त्वपूर्ण राजा नागभट्ट प्रथम (730 – 756 ई.) था।
उसके विषय में ग्वालियर अभिलेख से जानकारी मिल ती है, जिसके अनुसर उसने अरबों को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया।
इसी अभिलेख में बताया गया है कि, वह नारायण रूप में लोगों की रक्षा के लिए उपस्थित हुआ था तथा उसे मलेच्छों का नाशक बताया गया है।

वत्सराज
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वत्सराज राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव धारावर्ष का समकालीन था। वह ‘सम्राट’ की उपाधी धारण करने वाला गुर्जर प्रतिहार वंश का पहला शासक था। इसे प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।

नागभट्ट प्रथम के दो भतीजे ‘कक्कुक’ एवं ‘देवराज’ के शासन के बाद देवराज का पुत्र वत्सराज (783-795 ई.) गद्दी पर बैठा।
वत्सराज के समय में ही कन्नौज के स्वामित्व के लिए त्रिदलीय संघर्ष आरम्भ हुआ।
राजस्थान के मध्य भाग एवं उत्तर भारत के पूर्वी भाग को जीतकर वत्सराज ने अपने राज्य में मिला लिया।
उसने पाल वंश के शासक धर्मपाल को भी पराजित किया, पर वह राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव से पराजित हुआ।

नागभट्ट द्वितीय
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नागभट्ट द्वितीय (795 से 833 ई.), वत्सराज का पुत्र एवं उसका उत्तराधिकारी था।

उसने गुर्जर प्रतिहार वंश की प्रतिष्ठा को बहुत आगे बढ़ाया।
ग्वालियर अभिलेख के अनुसार उसने कन्नौज से चक्रायुध को भगाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
नागभट्ट द्वितीय ने सम्राट की हैसियत से ‘परभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’ तथा ‘परमेश्वर’ आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।
मुंगेर के नजदीक उसने पाल वंश के शासक धर्मपाल को पराजित किया था, परन्तु उसे राष्ट्रकूट नरेश गोविन्द तृतीय से हार खानी पड़ी।
ग्वालियर अभिलेखों में नागभट्ट द्वितीय को ‘तुरुष्क’, ‘किरात’, ‘मत्स्य’, ‘वत्स’ का विजेता कहा गया है।
चन्द्रप्रभास कृत ‘प्रभावकचरित’ से जानकारी मिलती है कि, नागभट्ट द्वितीय ने पवित्र गंगा नदी में जल समाधि के द्वारा अपना प्राण त्याग किया।
नागभट्ट द्वितीय के बाद कुछ समय (833 से 836 ई.) के लिए उसका पुत्र रामभद्र गद्दी पर बैठा।
रामभद्र को पाल वंश के शासक से हार का मुँह देखना पड़ा।

भोज प्रथम
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भोज प्रथम अथवा ‘मिहिरभोज’ गुर्जर प्रतिहार वंश का सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् शासक था। उसने पचास वर्ष (850 से 900 ई.) पर्यन्त शासन किया। उसका मूल नाम ‘मिहिर’ था और ‘भोज’ कुल नाम अथवा उपनाम था। उसका राज्य उत्तर में हिमालय, दक्षिण में नर्मदा, पूर्व में बंगाल और पश्चिम में सतलुज तक विस्तृत था, जिसे सही अर्थों में साम्राज्य कहा जा सकता है। भोज प्रथम विशेष रूप से भगवान विष्णु के वराह अवतार का उपासक था, अत: उसने अपने सिक्कों पर आदि-वराह को उत्कीर्ण कराया था।

प्रारम्भिक संघर्ष
भोज प्रथम ने 836 ई. के लगभग कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया, जो आगामी सौ वर्षो तक प्रतिहारों की राजधानी बनी रही। उसने जब पूर्व दिशा की ओर अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहा, तो उसे बंगाल के पाल शासक धर्मपाल से पराजित होना पड़ा। 842 से 860 ई. के बीच उसे राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने भी पराजित किया। पाल वंश के शासक देवपाल की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी नारायण को भोज प्रथम ने परास्त कर पाल राज्य के एक बड़े भू-भाग पर अधिकार कर लिया। उसका साम्राज्य काठियावाड़, पंजाब, मालवा तथा मध्य देश तक फैला था।

यात्री विवरण
भोज प्रथम के शासन काल का विवरण अरब यात्री सुलेमान के यात्रा विवरण से मिलता है। अरब यात्री सुलेमान उसे ‘बरुआ’ कहता है। भोज प्रथम के बारे में सुलेमान लिखता है कि-

“इस राजा के पास बहुत बड़ी सेना है और अन्य किसी दूसरे राजा के पास उसकी जैसी सेना नहीं है। उसका राज्य जिह्म के आकार का है। उसके पास बहुत अधिक संख्या में घोड़े और ऊंट है। भारत में भोज के राज्य के अतिरिक्त कोई दूसरा राज्य नहीं है, जो डाकुओं से इतना सुरक्षित हो।”

उपाधियाँ
भोज प्रथम ने ‘आदिवराह’ एवं ‘प्रभास’ की उपाधियाँ धारण की थीं। उसने कई नामों से, जैसे- ‘मिहिरभोज’ (ग्वालियर अभिलेख में), ‘प्रभास’ (दौलतपुर अभिलेख में), ‘आदिवराह’ (ग्वालियर चतुर्भुज अभिलेखों), चांदी के ‘द्रम्म’ सिक्के चलवाए थे। सिक्कों पर निर्मित सूर्यचन्द्र उसके चक्रवर्तिन का प्रमाण है। अरब यात्री सुलेमान के अनुसार वह अरबों का स्वाभाविक शत्रु था। उसने पश्चिम में अरबों का प्रसार रोक दिया था।

साम्राज्य
गुजरात के सोलंकी एवं त्रिपुरा के कलचुरी के संघ ने मिलकर भोज प्रथम की राजधानी धार पर दो ओर से आक्रमण कर राजधानी को नष्ट कर दिया था। भोज प्रथम के बाद शासक जयसिंह ने शत्रुओं के समक्ष आत्मसमर्पण कर मालवा से अपने अधिकार को खो दिया। भोज प्रथम के साम्राज्य के अन्तर्गत मालवा, कोंकण, ख़ानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी का कुछ भाग शामिल था। उसने उज्जैन की जगह अपने नई राजधानी धार को बनाया।

विद्या तथा कला का संरक्षक
भोज प्रथम एक पराक्रमी शासक होने के साथ ही विद्वान् एवं विद्या तथा कला का उदार संरक्षक था। अपनी विद्वता के कारण ही उसने ‘कविराज’ की उपाधि धारण की थी। उसने कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रंथ, जैसे- ‘समरांगण सूत्रधार’, ‘सरस्वती कंठाभरण’, ‘सिद्वान्त संग्रह’, ‘राजकार्तड’, ‘योग्यसूत्रवृत्ति’, ‘विद्या विनोद’, ‘युक्ति कल्पतरु’, ‘चारु चर्चा’, ‘आदित्य प्रताप सिद्धान्त’, ‘आयुर्वेद सर्वस्व श्रृंगार प्रकाश’, ‘प्राकृत व्याकरण’, ‘कूर्मशतक’, ‘श्रृंगार मंजरी’, ‘भोजचम्पू’, ‘कृत्यकल्पतरु’, ‘तत्वप्रकाश’, ‘शब्दानुशासन’, ‘राज्मृडाड’ आदि की रचना की। ‘आइना-ए-अकबरी’ के वर्णन के आधार पर माना जाता है कि, उसके राजदरबार में लगभग 500 विद्धान थे।

भोज प्रथम के दरबारी कवियों में ‘भास्करभट्ट’, ‘दामोदर मिश्र’, ‘धनपाल’ आदि प्रमुख थे। उसके बार में अनुश्रति थी कि वह हर एक कवि को प्रत्येक श्लोक पर एक लाख मुद्रायें प्रदान करता था। उसकी मृत्यु पर पण्डितों को हार्दिक दुखः हुआ था, तभी एक प्रसिद्ध लोकोक्ति के अनुसार- उसकी मृत्यु से विद्या एवं विद्वान, दोनों निराश्रित हो गये।

निर्माण कार्य
भोज प्रथम ने अपनी राजधानी धार को विद्या एवं कला के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित किया था। यहां पर भोज ने अनेक महल एवं मन्दिरों का निर्माण करवाया, जिनमें ‘सरस्वती मंदिर’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। उसके अन्य निर्माण कार्य ‘केदारेश्वर’, ‘रामेश्वर’, ‘सोमनाथ सुडार’ आदि मंदिर हैं। इसके अतिरिक्त भोज प्रथम ने भोजपुर नगर एवं भोजसेन नामक तालाब का भी निर्माण करवाया था। उसने ‘त्रिभुवन नारायण’, ‘सार्वभौम’, ‘मालवा चक्रवर्ती’ जैसे विरुद्ध धारण किए थे।

महेन्द्र पाल
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महेन्द्र पाल (890-910 ई.), मिहिरभोज का उत्तराधिकारी था। उसने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का विस्तार मगध एवं उत्तरी बंगाल तक किया।

लेखों के अनुसार उसे ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’ तथा ‘परमेश्वर’ कहा गया है।
उसे ‘महेन्द्रपुह’ और ‘निर्भयनरेन्द्र’ के नामों से भी जाना जाता है।
वह कश्मीर के शासक शंकर वर्मन से युद्ध में परास्त हुआ था।
महेन्द्र पाल के शासन काल में प्रतिहार साम्राज्य की अभूतपूर्व प्रगति हुई।
इसके काल में कन्नौज का गौरव अपने शिखर पर था।
राजशेखर के ‘बाल रामायण’ में कन्नौज की प्रशंसा इस प्रकार मिलती है, “उस पवित्र नगर के लोग नई कविता के समान लालित्यपूर्ण थे, वहां की स्त्रियों के वस्त्र मनमोहक थे तथा उनके गहनों, केश प्रशासन और बोली की नकल अन्य प्रदेश की स्त्रियां करती थीं।”
संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान् ‘राजशेखर’, महेन्द्रपाल के गुरु थे।
राजशेखर की प्रसिद्ध कृति हैं- ‘कर्पूर मञ्जरी’, ‘काव्य मीमांसा’, ‘विद्वशालभंजिका’, ‘बाल रामायण’, ‘भुवकोश’ और ‘हरिविलास’।
राजशेखर ने अपनी रचनाओं में महेन्द्र पाल का वर्णन ‘निर्भयराज’ और ‘निर्भय नरेन्द्र’ के रूप में किया है।

महिपाल
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महिपाल (910-940 ई.) महेन्द्र पाल के बाद गुर्जर प्रतिहार वंश का शासक था। महिपाल के शासन काल में लगभग 915-918 ई में राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण कर नगर को उजाड़ दिया।

सम्भवतः उसके शासन काल के दौरान (915-916 ई.) में ही बग़दाद निवासी ‘अलमसूदी’ गुजरात आया था।
अलमसूदी ने गुर्जर प्रतिहारों को ‘अलगुर्जर’ एवं राजा को ‘बौरा’ कहा था।
पुनः लगभग 963 ई. में कृष्ण तृतीय ने गुर्जर प्रतिहार वंश के अधिकार से मध्य भारत के क्षेत्र को छीन लिया, इससे कन्नौज का केन्द्रीय शक्ति के रूप में ह्मस हो गया।
राज्यपाल के समय तक गुर्जर प्रतिहारों की शक्ति कन्नौज के आस-पास तक सिमट कर रह गयी।
1018 ई. में जब महमूद गज़नवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया, तो महिपाल कन्नौज छोड़कर भाग खड़ा हुआ।
इसके बाद उसने गंगा पार कर ‘बारी’ में अपनी राजधानी बनाई।
उसके इस कायरपन से दुःखी होकर चन्देल शासक गंडदेव ने उसकी हत्या कर दी तथा ‘त्रिलोचन पाल’ को राजा बनाया।
त्रिलोचन पाल बस एक नाममात्र का ही शासक था।
1036 ई. में राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया।
अन्ततः प्रतिहारों के सामंत गुजरात के चालुक्य ‘जेजाकभुक्ति’ के चंदेल, ग्वालियर के ‘कच्छपघात’, मध्य भारत के कलचुरी, मालवा के परमार, दक्षिण राजस्थान के गुहिल, शाकंभरी के चौहान आदि क्षेत्रीय स्तर पर स्वतन्त्र हो गये।
गुर्जर प्रतिहारों ने विदेशियों के आक्रमण के समय भारत के द्वारपाल की भूमिका निभाई।
प्रतिहार शासकों के पास भारत में सर्वोत्तम अश्वरोही सैनिक थे। उस समय मध्य एशिया और अरब से घोड़ों का आयात व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।
गुर्जर प्रतिहार के अधीन ब्राह्मण धर्म का अत्यधिक विकास हुआ। वैष्णव सम्प्रदाय सबसे अधिक प्रचलित था।
बौद्ध धर्म अपने अवनति पर था। जैन धर्म मुख्यतः राजपूताना एवं पश्चिमी भारत तक ही सीमित था। इस बात में सोमेश्वर ने चण्डकौशिक की रचना की।
यशपाल इस वंश का अंतिम शासक था। 1036 राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया।

भोज द्वितीय
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भोज द्वितीय, भोज प्रथम का पौत्र था। उसने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य पर सिर्फ़ दो-तीन वर्ष (908-10 ई.) की अल्प अवधि तक ही राज्य किया।

देवपाल (प्रतिहार वंश)
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देवपाल, कन्नौज के प्रतिहार वंश का एक राजा, जिसने 940 से 955 ई. तक शासन किया।
उसके शासनकाल में प्रतिहारों की शक्ति क्षीण होने लगी थी।
चन्देल वंश के राजा यशोवर्मा ने उसे पराजित किया था।
यशोवर्मा ने देवपाल को विष्णु की एक बहुमूल्य मूर्ति समर्पित करने के लिए बाध्य किया।
इस मूर्ति को फिर खजुराहो के मन्दिर में प्रतिष्ठित किया गया था।

महिपाल

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महिपाल (910-940 ई.) महेन्द्र पाल के बाद गुर्जर प्रतिहार वंश का शासक था। महिपाल के शासन काल में लगभग 915-918 ई में राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण कर नगर को उजाड़ दिया।

सम्भवतः उसके शासन काल के दौरान (915-916 ई.) में ही बग़दाद निवासी ‘अलमसूदी’ गुजरात आया था।
अलमसूदी ने गुर्जर प्रतिहारों को ‘अलगुर्जर’ एवं राजा को ‘बौरा’ कहा था।
पुनः लगभग 963 ई. में कृष्ण तृतीय ने गुर्जर प्रतिहार वंश के अधिकार से मध्य भारत के क्षेत्र को छीन लिया, इससे कन्नौज का केन्द्रीय शक्ति के रूप में ह्मस हो गया।
राज्यपाल के समय तक गुर्जर प्रतिहारों की शक्ति कन्नौज के आस-पास तक सिमट कर रह गयी।
1018 ई. में जब महमूद गज़नवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया, तो महिपाल कन्नौज छोड़कर भाग खड़ा हुआ।
इसके बाद उसने गंगा पार कर ‘बारी’ में अपनी राजधानी बनाई।
उसके इस कायरपन से दुःखी होकर चन्देल शासक गंडदेव ने उसकी हत्या कर दी तथा ‘त्रिलोचन पाल’ को राजा बनाया।
त्रिलोचन पाल बस एक नाममात्र का ही शासक था।
1036 ई. में राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया।
अन्ततः प्रतिहारों के सामंत गुजरात के चालुक्य ‘जेजाकभुक्ति’ के चंदेल, ग्वालियर के ‘कच्छपघात’, मध्य भारत के कलचुरी, मालवा के परमार, दक्षिण राजस्थान के गुहिल, शाकंभरी के चौहान आदि क्षेत्रीय स्तर पर स्वतन्त्र हो गये।
गुर्जर प्रतिहारों ने विदेशियों के आक्रमण के समय भारत के द्वारपाल की भूमिका निभाई।
प्रतिहार शासकों के पास भारत में सर्वोत्तम अश्वरोही सैनिक थे। उस समय मध्य एशिया और अरब से घोड़ों का आयात व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।
गुर्जर प्रतिहार के अधीन ब्राह्मण धर्म का अत्यधिक विकास हुआ। वैष्णव सम्प्रदाय सबसे अधिक प्रचलित था।
बौद्ध धर्म अपने अवनति पर था। जैन धर्म मुख्यतः राजपूताना एवं पश्चिमी भारत तक ही सीमित था। इस बात में सोमेश्वर ने चण्डकौशिक की रचना की।
यशपाल इस वंश का अंतिम शासक था। 1036 राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया।