मस्जिद और इबादत part 13_इस्लाम में मस्जिद की अहमियत!

मस्जिद और इबादत part 13_इस्लाम में मस्जिद की अहमियत!

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जुमे की नमाज़ दूसरी नमाज़ों की तरह शुक्रवार के दिन जामा मस्जिद में आयोजित होती है। इस नमाज़ में दो भाषण दो रकअत नमाज़ के बदले में दिए जाते हैं। इस तरह ज़ोहर की चार रकअत के बजाए दो भाषण होते और 2 रकअत नमाज़ पढ़ी जाती है। इसी तरह जिन चीज़ों से नमाज़ पढ़ते वक़्त मना किया गया है उन्हीं चीज़ों से दोनों भाषणों में भी मना किया गया है। नमाज़ियों पर अनिवार्य है कि वे इमाम के भाषण को ध्यान से सुनें। आपस में बात न करें। नमाज़ के भाषण में इमाम लोगों को ईश्वर से डरने की सिफ़ारिश करता है। समाज के एक एक व्यक्ति को एक दूसरे के हालात से अवगत कराता है और उनकी क्षमता को इस्लामी समाज की मुश्किलों को हल करने के लिए संगठित करता है।

इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी अपनी किताब तहरीरुल वसीला में जुमे की नमाज़ के बारे में लिखते हैं, “जुमे के इमाम को चाहिए कि वह अपने भाषण में मुसलमानों के लोक परलोक से जुड़े मामलों, अच्छी और बुरी घटनाओं, मुस्लिम समाज के उचित व अनुचित हालात और उन विषयों पर चर्चा करे जो राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से मुसलमानों की स्वाधीनता में प्रभावी हैं। मुसलमानों को उन बातों की ओर से सावधान करे जिनकी उन्हें लोक-परलोक में ज़रूरत है।”

इमाम रज़ा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के हवाले से एक कथन में फ़रमाते हैं, “जुमे के दिन इसलिए भाषण रखा गया है क्योंकि इस दिन लोग हाज़िर होते हैं। इस भाषण में लोगों को ईश्वर की आज्ञा के पालन के लिए प्रेरित किया जाए, पाप के अंजाम से डराया जाए, जो चीज़ें लोगों के लोक परलोक के लिए ज़रूरी है, उनसे उन्हें अवगत कराया जाए। उन्हें दुनिया की उन घटनाओं से सूचित कराया जाए जिसमें उनके फ़ायदे व नुक़सान निहित हैं।”

जुमे की नमाज़ ग़ैर अनिवार्य उपासनाओं में है। यह नमाज़ लोगों के मन को पाप की गंदगी से साफ़ करती है। पैग़म्बरे इस्लाम जुमे की नमाज़ की अहमियत के बारे में फ़रमाते हैं, “जान लोग कि ईश्वर ने जुमे की नमाज़ को अनिवार्य रखा है। जो भी मेरे जीवन में या मेरी मौत के बाद इसे छोड़ दे तो ईश्वर उसे परेशान व व्याकुल रखेगा और उसके किसी काम में बर्कत नहीं रहेगी। जान लो कि ऐसे व्यक्ति की नमाज़ क़ुबूल नहीं। ऐसे व्यक्ति की ओर से निकाली गयी ज़कात क़ुबूल नहीं। उसका हज, रोज़ा और कोई भलाई स्वीकार्य नहीं होगी जब तक कि वह प्रायश्चित न करे।”

जुमे की नमाज़ सामूहिक उपासना है। यह नमाज़ अकेले नहीं पढ़ी जाती। इसलिए जुमे की नमाज़ को साप्ताहिक सामाजिक व राजनैतिक सभा कह सकते हैं। इस भव्य सभा में जुमे के इमाम का कर्तव्य है कि वह इस्लामी जगत के हालात से लोगों को सूचित करे। यही वजह है कि जुमे का इमाम ऐसा व्यक्ति हो जो मुसलमानों के हालात से अवगत हो, वीर हो, सच बात कहने में निडर हो और इस्लामी समाज के लिए फ़ायदेंमद चीज़ों के बारे में जानता हो। इसके साथ ही उसके व्यक्तित्व में न्याय करने और ईश्वर से डरने की विशेषता स्पष्ट हो। जुमे के इमाम को चाहिए कि वह सबसे पाक लेबास पहने, ख़ुशबू लगाए और सम्मान के साथ रास्ता चले। जब वह मिंबर पर बैठे तो अज़ान के ख़त्म होने का इंतेज़ार करे, अज़ान ख़त्म होने के बाद भाषण देना शुरु करे। रवायत के अनुसार, जुमे के इमाम को चाहिए कि वह पहले ईश्वर की प्रशंसा करे, उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम पर दुरुद भेजे, लोगों को ईश्वर से डरने की अनुशंसा करे और पवित्र क़ुरआन का एक छोटा सा सूरा पढ़े। दूसरे भाषण में पैग़म्बरे इस्लाम पर दुरुद भेजने के बाद, मुसलमानों के लिए दुआ करे, मोमिन बंदों के लिए ईश्वर से पापों की क्षमा के लिए दुआ करे। जुमे के इमाम को चाहिए कि वह मुसलमानों के लोक परलोक से संबंधित मामलों पर चर्चा करे। जो कुछ इस्लामी देशों के भीतर और बाहर हो रहा है उस पर भी चर्चा करे। धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, और आर्थिक मामलों को प्राथमिकता दे और इस ओर से लोगों को जागरुक बनाए।

‘शजरा’ मदीना के बाहर स्थित मस्जिदों में से एक है। यह मस्जिद मीक़ात की वजह से बहुत अहमियत रखती है। मीक़ात उस स्थान को कहते हैं जहां हाजी हज के लिए विशेष प्रकार का एहराम नामक वस्त्र धारण करते हैं चाहे वे निवासी हों या मुसाफ़िर। ‘शजरा’ मस्जिद ऐसी जगह स्थित है जहां पैग़म्बरे इस्लाम ने पवित्र नगर मक्का जाते वक़्त समरा नामक पेड़ के नीचे नमाज़ पढ़ी थी इसी वजह से इसे ‘शजरा’ कहते हैं। वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम ने 3 बार इस स्थान पर हज के लिए एहराम नामक विशेष वस्त्र धारण किया था। एक बार छठी हिजरी क़मरी में कि जिसके नतीजे में हुदैबिया नामक शांति संधि हुयी थी। दूसरी बार आठवीं हिजरी क़मरी में मक्का पर विजय हासिल करते समय और आख़री बार अपने जीवन के अंतिम हज के समय दसवीं हिजरी क़मरी में उन्होंने इस मस्जिद में एहराम बांधा था। इसी वजह से यह मस्जिद मुसलमानों और पैग़म्बरे इस्लाम के श्रद्धालुओं के लिए बहुत अहमियत रखती है।

‘शजरा’ मस्जिद का एक नाम एहराम, ज़ुल हुलैफ़ा और अबयार अली भी है। इस मस्जिद को इसलिए अबयार अली कहते हें क्योंकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने खजूर के पेड़ों की सिंचाई के लिए इस क्षेत्र में बहुत से कुएं खोदे थे। अरबी में अबयार बेअर का बहुवचन है जिसका अर्थ है बहुत से कुएं। ईरान के मशहूर इतिहासकार फ़ीरोज़ाबादी इस मस्जिद की अहमियत के बारे में लिखते हैं, “यह मस्जिद अबयार अली के अलावा किसी और नाम से मशहूर नहीं है।” ‘शजरा’ मस्जिद आठवीं हिजरी क़मरी में गिर गयी थी लेकिन इसके बावजूद लोग इसमें नमाज़ पढ़ते थे।

यह मस्जिद जब पहली बार बनी थी तो उसमें एक हाल और प्रांगण था लेकिन आठवीं और नवीं हिजरी क़मरी में इसके चारों ओर सिर्फ़ दीवारें बची थीं। 1058 हिजरी क़मरी में एक भारतीय मुसलमान ने उस्मानी शासन काल में इस मस्जिद की मरम्मत करायी और इसमें एक मीनार बनवाया था।

फ़हद के शासन काल में ‘शजरा’ की मस्जिद की आख़री बार मरम्मत हुयी। उस दौरान इस मस्जिद का क्षेत्रफल बढ़ाया और इसमें पार्किंग की भी सुविधा मुहैया की गयी। इस समय इस मस्जिद का क्षेत्रफल 90 हज़ार वर्गमीटर है। ख़ुद मस्जिद का क्षेत्रफल लगभग 26 हज़ार वर्गमीटर है और इसमें एक साथ 5000 लोग नमाज़ पढ़ सकते हैं। ‘शजरा’ मस्जिद भी सऊदी शासन काल के दौरान मरम्मत होने वाली दूसरी मस्जिदों की तरह सादा नहीं रह गयी बल्कि यह मदीना में मरम्मत हुयी दूसरी मस्जिदों में वास्तुकला का बहुत ही सुंदर नमूना पेश करती है।

‘शजरा’ नामक एक और मस्जिद है जो पवित्र नगर मक्का में स्थित है। यह मक्का की सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक है।

तीसरी हिजरी क़मरी के इतिहासकार मोहम्मद बिन इस्हाक़ फ़ाकेही लिखते हैं, “वे मस्जिदें जिनमें नमाज़ पढ़ने का बहुत पुन्य है और उनमें पैग़म्बरे इस्लाम की निशानियां मौजूद हैं, उनमें ‘शजरा’ नामक मस्जिद भी है। यह मस्जिद मक्का नगर के ऊपरी छोर पर एक पहाड़ के किनारे मस्जिदुल जिन्न नामक मस्जिद के सामने स्थित है। वहां एक पेड़ था जिसे पैग़म्बरे इस्लाम ने बुलाया था तो वह अपनी जगह से उखड़ कर पैग़म्बरे इस्लाम के पास चला आया था। वह पैग़म्बरे इस्लाम के इस चमत्कार के बारे में लिखते हैं कि एक रवायत में है कि रुकाना बिन अब्द यज़ीद बिन हाशिम नामक व्यक्ति को पैग़म्बर ने इस्लाम क़ुबूल करने का निमंत्रण दिया तो उन्होंने कहा कि उस वक़्त तक ईमान न लाएंगे जब तक यह पेड़ आपके कहने से आपके पास न आ जाए। पैग़म्बरे इस्लाम ने उस पेड़ की ओर मुंह करके कहा, ईश्वर के आदेश से मेरे पास आ जा और वह पेड़ पैग़म्बरे इस्लाम के पास पहुंच गया।”

‘शजरा’ मस्जिद की मौजूदा स्थिति के बारे में ज़ुहैर कतबी लिखते हैं कि यह मस्जिद जिन नामक मस्जिद के पड़ोस में स्थित है। इस समय इस मस्जिद को जन्दवारी मस्जिद कहते हैं। इस मस्जिद का नाम इब्राहीम जन्दवारी के नाम पर पड़ गया है।