#याजूज़_माजूज़ जिन्हें हज़रत ज़ुलकरनैन ने दीवार के पीछे कैद कर दिया है!

#याजूज़_माजूज़ जिन्हें हज़रत ज़ुलकरनैन ने दीवार के पीछे कैद कर दिया है!

Posted by

Sikander Kaymkhani
===============
क्या आप “याजूज माजूज” के बारे में कुछ मजेदार जानना चाहते हैं जिनका जिक्र कुरान में भी आया है, जिन्हें हज़रत ज़ुलकरनैन ने एक दीवार के पीछे कैद कर दिया है, लेकिन वे निकलेंगे कैसे और कब? जानिए उनके बारे में कुछ दिलचस्प और मजेदार। याजूज और माजूज हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के तीसरे बेटे याफत वंश से हैं। ये इंसानी नस्ल के दो बड़े वहसी कबीले गुज़र चुके हैं, जो अपने आसपास रहने वालों पर बहुत ज़ुल्म करते थे। और इंसानी बस्तियां तक तबाह कर देते थे।कुरान की आयतें, तौरेत के मुताबिक और ऐतिहासिक सबूतों से पता चलता है कि यह लोग पूर्वोत्तर एशिया में ज़िन्दगी गुज़ारा करते थे। और अपने ज़ालिमाना हमलों के वजह से एशिया के दक्षिण और पश्चिमी इलाकों में परेशानी पैदा करते थे

कुछ इतिहासकारों ने उनके रिहायशी इ लाके क्मास्को और तूबल के आसपास बतलाया है, और कुछ का मानना है कि याजूज और माजूज शहर तिब्बत और चीन से बहर्मनजमद उत्तरी तक और पश्चिम में तुर्किस्तान तक फैले हुए थे। हज़रत ज़ुलकरनैन के दौर में याजूज और माजूजू के हमले बवाल ए जान बन गए थे, उन्हें रोकने के लिए ज़ुलकरनैन ने पहाड़ों के बीच ऊँची और मजबूत सद्द (दीवार) तामीर करवाई, ज़ुलकरनैन और सद्द ज़ुलकरनैन का ज़िक्र कुरान के सूरे कहफ़ में मौजूद है। ऐतिहासिक रूप से वह कौन शख्स है, इतिहास के मशहूर शख्सियतों में ये किस पर मन्बक होती है, इस बारे में इतिहास कारों के बीच मत भेद है। इतिहास की किताबों के मुताले के बाद लोगों ने ज़ुलकरनैन के बारे कई कयास लगाए हैं। कई जानकार अलेक्जेंडर को ही ज़ुलकरनैन मानते हैं, लेकिन कुछ उसका इन्कार करके यह तर्क पेश करते हैं कि ज़ुलकरनैन दरअसल हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम का खिताब था। आधुनिक ज़माने के कुछ मुफ़स्सिर और जानकार ज़ुलकरनैन को ईरानी राजा साइरस (कोरश) का दूसरा नाम बताते हैं, और ये ज़्यादा तर माना जाता है, लेकिन बहरहाल अभी तक यकीन के साथ किसी को उसका मिसदा़क नहीं ठहराया जा सकता। ज़ुलकरनैन के बाबत कुरान ने वाज़ेह किया है कि वो ऐसा बादशाह था जिसे अल्लाह की तरफ़ से असबाब की फरवानी से बख्शा गया था। वो पूर्वी और पश्चिमी देशों को जीत पर जीत हासिल करता हुआ एक ऐसे पहाड़ी दर्रे पर पहुंचा जिसके दूसरी ओर याजूज और माजूज थे।

#कुरान_मे सूरे कहफ़ में बहवाला याजूज माजूज और ज़ुलकरनैन के हालात बयान करते हुए कहा गया है कि जब वे अपनी उत्तरी फतह के दौरान दीवारों (पहाड़ों) के बीच पहुंचा तो वहां उसे ऐसी क़ौम मिली जिसकी ज़बान गैर समझ थी लेकिन जब लोगों के ज़रिए से बातचीत हुई तो उन्होंने अर्ज़ किया कि याजूज माजूज इस ज़मीन पर फसाद फैलाते हैं तो हमारे और उनके बीच एक सद्द (दीवार) तामीर करवायें। इसलिए फिर ये मौजूद है कि कैसे ज़ुलकरनैन ने इस मुल्क को याजूज माजूज के फसाद से बचाने के लिए दीवार बनाई। और जो दीवार बनाई गई वो कोई मसाले या ईंटों की नहीं बल्कि लोहा पिघला हुआ तांबे से बनाई गई थी जिससे याजूज माजूज का फितना दब गया। जब यह दीवार तामीर हो गयी तो ज़ुलकरनैन ने अल्लाह का शुक्र अदा किया जिसने यह दीवार बनाने और लोगों को आए दिन परेशानियों से निजात दिलाने की तौफ़ीक़ दी। लेकिन साथ ही लोगों को यह भी बता दिया कि यह दीवार हालांकि बहुत मजबूत और ऊँची है मगर ये हमेशा के लिए नहीं जो कुछ भी बना है खत्म होने वाला है और जब मेरे रब का हुक्म करीब आएगा तो वह उसे खाक कर देगा और मेरे रब का वादा सच है। रही यह बात कि सद्द ज़ुलकरनैन कहां है? तो इसमें भी मतभेद हैं क्योंकि आज तक ऐसी पाँच दीवारों मालूम हो चुकी हैं जो कई राजाओं ने अलग अलग इलाकों मे अलग अलग वक्त मे दुश्मन मुलकों केे हमलों से बचाव के लिये बनवाई थीं।

इनमें से सबसे मसहूर दीवार चीन की है जो लंबाई का अनुमान बारह सौ मील से लेकर पंद्रह सौ मील तक किया गया है और अभी तक मौजूद है। लेकिन गौरतलब है कि दीवार चीन की लोहा और तांबे से बनी हुई है, और न वह किसी छोटे पहाड़ी दर्रे में है, वह एक आम मसाले से बनी हुई दीवार है। कुछ का कहना है कि यह वही दीवार “मारब” है कि जो यमन में है, यह ठीक है कि दीवार मारब एक पहाड़ी दर्रे में बनाया गया है, लेकिन वह बाढ़ को रोकने के लिए और पानी रोकने के मकसद से बनाई गई है। वैसे भी वह लोहे और तांबे से बनी हुई है, जबकि विद्वानों और शोध कर्ताओं की गवाही के अनुसार भूमि “काकेशस” नदी खकृ और नदी काले के बीच पहाड़ों की एक श्रृंखला है कि जो एक दीवार की तरह उत्तर और दक्षिण को एक दूसरे से अलग करता है। इसमें एक दीवार की तरह पास भी मौजूद है जो मशहूर दर्रा “दारयाल” है। यहाँ अभी तक एक प्राचीन ऐतिहासिक लोहे की दीवार दिखती है, इसी वजह से कई लोगों का नजरिया है कि दीवार ज़ुलकरनैन यही है।

हालांकि सद्द ज़ुलकरनैन बड़ी मजबूत बनी है जिसके ऊपर चढ़कर या इसमें छेद करके याजूज माजूज का इधर आना मुमकिन नहीं लेकिन जब अल्लाह का वादा पूरा होगा तो वह उसे रेज़ा रेज़ा करके ज़मीन के बराबर कर देगा, ये वादा पूरा होगा कयामत के करीब याजूज माजूज है। बुखारी की एक हदीस में हुज़ूर नबी करीम ﷺ ने दीवार में थोड़े से छेद फ़ित्ने के करीब होने को कहा। एक और हदीस में आता है कि याजूज माजूज हर दिन इस दीवार को खोदते हैं। और फिर कल के लिए छोड़ देते हैं, लेकिन जब अल्लाह का हुक्म होगा तो वे कहेंगे कल इंशा अल्लाह उसे खोद देंगे और फिर दूसरे दिन वे इससे निकलने में कामयाब हो जाएंगे। और ज़मीन में फसाद होगा यानी इंसानों को भी खाने से परहेज नहीं करेंगे तो अल्लाह से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को हुक्म होगा कि वह मुसलमानों को तूर की तरफ़ कर ले क्योंकि याजूज माजूद का मुकाबला किसी के बस में नहीं होगा।

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और उनके साथी इस वक्त ऐसी जगह खड़े होंगे जहां खाने की सख्त कमी होगी तो लोगों की गुज़रिश पर ईसा अलैहिस्सलाम याजूज माजूज पर बद्दुआ फ़रमाएंगे। तो अल्लाह उनकी गर्दन और कानों में कीड़ा पैदा कर देंगे जो बाद में फोड़ा बन जाएगा जिसके फ़टने से इनकी मौत होना शुरू हो जाएंगे। सब के सब मर जाएंगे, उनकी लाशों से एक बालिश्त ज़मीन खाली न होगी और हर तरफ उनकी लाशों की वजह से बुरी बदबू फैल जाएगी, फिर ईसा इब्ने मरियम दुआ करेंगे तो अल्लाह कंधे से ऊंट के गर्दन के बराबर पक्षी भेजेंगे जो उनकी लाशों को उठाकर जाने कहां फेंक देंगे, तो एक बारिश होगी जिससे कुल ज़मीन साफ़ हो जाएगी और हर तरफ हरियाली होगी। सही मुस्लिम नवास बिन समआन रवायत में है कि याजूज माजूज का निकलना हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के नुज़ूल के बाद उनकी मौजूदगी में होगा, जो इन इतिहास कारों का इनकार हो जाता है, जो कहते हैं कि तातारियों के मुसलमानों पर हमला या मंगोलिया तर्क जिनमें से चंगेज़ भी था। या रूसी और चीनी राष्ट्र यही याजूज और माजूज हैं, जिनकी आना हो चुका या पश्चिमी राष्ट्र उनका मिसदाक़े हैं कि पूरी दुनिया में उनका प्रभुत्व और वर्चस्व है। यह सब बातें गलत हैं, क्यूँ कि याजूज माजूज के ग़लबे से सियासी ग़लबा मुराद नहीं हैै बल्कि कत्ल गारत गिरी और खराबी फ़साद का वो आर्ज़ी ग़लबा है, जिसका मुकाबला करने की ताकत मुसलमान नों मे नहीं होगी। फिर वबाई मर्ज़ से सब केे सब आंन वाहिद मे लुकमा ए अजल बन जाएंगे।