युद्ध के दुष्परिणाम और बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव!!जंग कराने वाले नहीं बताते!!

युद्ध के दुष्परिणाम और बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव!!जंग कराने वाले नहीं बताते!!

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परवेज़ ख़ान
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कश्मीर में सेना के कैंप पर हमले के तुरंत बाद मीडिया में ऐसी खबरें, बहस आना शुरू हो गयीं थीं कि भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध का एलान कर देना चाहिए, न्यूज़ चैनल के स्टूडियो में बैठ कर युद्ध शुरू भी किया जा सकता है और जीता भी जा सकता है पर युद्ध से होने वाली हानि का अंदाज़ा ऐसे नहीं लगाया जा सकता|

युद्ध कभी भी किसी भी समस्या का हल नहीं है, जो देश युद्ध लड़ रहे हैं वह इस की भारी कीमत चुका रहे हैं, विस्तारवादी मानसिकता वाले कुछ बड़े देश मध्य एशिया में शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अपने लाभ के लिए लड़ रहे हैं, अमेरिका और रूस दोनों महाशक्ति अरब के देशों में युद्ध लड़ रहे हैं, यह युद्ध इन दोनों देशों की नूराकुश्ती समान है, दोनों महाशक्तियों को अरब का मैदान मिला हुआ है, यहाँ ये देश अपने लाभ की जंग लड़ रहे हैं, अपने बनाये हथियारों का परिक्षण, प्रदर्शन इसमें हो जाता है, शक्ति का प्रदर्शन कर दुनियां के अन्य देशों को अपने हथियारों का ग्राहक बनाते हैं

हम जो कुछ देखते हैं उस के आलावा भी देखने के लिए बहुत कुछ होता है, जो दिखाई नहीं देता है और जिसे दिखने नहीं दिया जाता है, भारत पाकिस्तान के बीच शुरू से झगड़ा बना रहा है, बटवारे के दो महीने बाद ही पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्ज़ा जमा लिया था, भारत ने बांग्लादेश को आज़ाद करवाया, दोनों देशों के बीच दुश्मनी की ‘खाई’ को बढ़ने नहीं देना चाहिए, युद्ध हल नहीं समस्या को बढ़ाने वाले होते हैं|

युद्ध के बहुत से खतरनाक व भयावह परिणाम होते हैं उसका एक महत्वपूर्ण दुष्परिणाम आम नागरिकों विशेषकर बच्चों और महिलाओं पर पड़ता है।

इस समय इस स्थिति को इराक, सीरिया और यमन में देखा जा सकता है और इन युद्धों में सबसे अधिक महिलाएं और बच्चे प्रभावित हुए हैं और उनको सबसे अधिक नुकसान पहुंच रहा है। अरब देशों में जो युद्ध जारी हैं विभिन्न रूपों में उनके प्रभाव बच्चों पर पड़े हैं। उदाहरण स्वरूप यूनिसेफ ने मार्च 2016 में घोषणा की है कि युद्ध से विभिन्न रूपों में सीरिया के 84 लाख बच्चे प्रभावित हुए हैं। युद्ध के कारण लगभग 70 लाख सीरियाई बच्चे निर्धनता में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यूनिसेफ ने सितंबर 2015 में घोषणा की थी कि युद्ध के कारण इराक में भी 82 लाख लोग प्रभावित हुए हैं जिनमें 37 लाख बच्चे थे।

अरब देशों विशेषकर सीरिया में युद्ध के कारण जो परिणाम सामने आये हैं उन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है एक आभास किया जाने वाले और दूसरे आभास न किये जाने वाले प्रभाव।

एक युद्ध में असैनिकों को सैनिकों से अलग करना कठिन कार्य है। इसी कारण युद्ध का एक परिणाम बच्चों की हत्या और उनका घायल होना है और यह वह परिणाम है जिसका आभास किया जा सकता है।

ऑक्सफोर्ड जांच दल ने वर्ष 2013 के अंतिम दिनों में एक रिपोर्ट प्रकाशित करके घोषणा की थी कि सीरिया संकट के परिणाम में 11 हज़ार बच्चे मारे गये हैं जिनमें 70 प्रतिशत बच्चों की हत्या विस्फोटक हथियारों से हुई जबकि 389 बच्चे फायरिंग में मारे गये और 764 बच्चे मार दिये गये। सात साल से कम आयु के 100 से अधिक बच्चे दी जाने वाली यातना से मर गये।

यूनिसेफ ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में सीरिया संकट में मरने वाले बच्चों की संख्या लगभग 12 हज़ार घोषणा की है। यूनिसेफ ने “बच्चों के लिए कोई स्थान नहीं” शीर्षक के अंतर्गत घोषणा की है कि वर्ष 2015 में खुल्लम­- खुल्ला 1500 सीरियाई बच्चों के अधिकारों का हनन हुआ जिनमें से 60 प्रतिशत से अधिक की हत्या की गयी और उनके शरीर के अंग कटे हुए थे। इनमें एक तिहाई से अधिक बच्चों की हत्या उस समय की गयी जब वे स्कूल थे, या स्कूल से लौट रहे थे या रास्ते में थे।

ग़ज़्ज़ा पट्टी पर वर्ष 2008 में जायोनी ने जो हमला किया था उसमें केवल 350 फिलिस्तीनी बच्चे मारे गये थे, ग़ज्ज़ा पट्टी में शैक्षिक संस्थाओं की युनियन ने घोषणा की है कि जायोनी शासन ने वर्ष 2014 में जो 50 दिवसीय ग़ज्ज़ा युद्ध आरंभ किया था उसमें 2200 लोग शहीद हुए थे जिसमें 50 प्रतिशत बच्चे और छात्र थे और उस युद्ध में 2385 फिलिस्तीनी बच्चे व छात्र घायल भी हुए थे

युद्ध का एक दुष्परिणाम बच्चों और महिलाओं का बेघर होना है जो युद्ध से पीड़ित देशों की मूल जनसंख्या होते हैं। वास्तव में लोगों के स्थानांतरण और उनके बेघर होने का एक मूल कारण युद्ध है। बेघर होना देश के भीतर और बाहर दोनों हो सकता है।

यूनिसेफ ने मार्च 2016 में घोषणा की थी कि इस समय सीरिया में बेघर होने वालों की संख्या वर्ष 2012 में बेघर होने वालों की अपेक्षा लगभग 10 बराबर है जिनमें आधे बच्चे हैं। सीरिया संकट में 76 लाख से अधिक बच्चे देश के भीतर बेघर हुए। सीरिया के बाहर जो 40 लाख लोग बेघर हुए उनमें लगभग आधे बच्चे हैं। 15 हज़ार से अधिक बच्चे सीरिया की सीमा से अकेले बाहर निकल गये।

इसी प्रकार यूनिसेफ ने वर्ष 2015 के जाड़े में घोषणा की थी कि 10 लाख से अधिक इराकी बच्चे इस देश में युद्ध व हिंसा के कारण बेघर हो गये।

बेघर होना स्वयं में एक बड़ी पीड़ा है और साथ ही वह अपने साथ बड़ी पीड़ा लाती है जैसे खाद्य पदार्थों की कमी, छुआछूत और गैर छुआछूत की बीमारियां, यौन शोषण और परिवारों से बिछड़ जाने आदि की ओर संकेत किया जा सकता है कि यह सबकी सब सीरिया, इराक, यमन और फिलिस्तीनी बच्चों की पीड़ाएं हैं।

बच्चों पर युद्ध का आभास किया जाने वाला एक दुष्परिणाम उनसे जबरदस्ती काम कराना या आमदनी के लक्ष्य से गुटों और हथियार बंद गुटों द्वारा उनसे काम लेना है। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद के हाइकमिश्नर ने अपनी एक रिपोर्ट में घोषणा की है कि दाइश ने इराक के मूसिल नगर में बच्चों के प्रशिक्षण के लिए कम से कम चार बड़े केन्द्र बनाये हैं और समूचे इराक से बच्चों का अपहरण करके इन केन्द्रों में उन्हें प्रशिक्षण देता है।

यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार सीरिया युद्ध के आरंभिक वर्षों में सशत्र गुटों ने जिन बच्चों से काम करवाया उनमें से अधिकांश की उम्र 15 साल से कम थी जबकि इन गुटों ने वर्ष 2014 में 15 साल से कम उम्र के बच्चों यहां तक कि सात साल तक के बच्चों से काम लिया। वर्ष 2015 में सशस्त्र गुटों ने जिन बच्चों से काम लिया उनमें आधे से अधिक की उम्र 15 वर्ष से कम थी जबकि यह आंकड़ा वर्ष 2014 में 20 प्रतिशत से कम था।

आतंकवादी गुटों ने एसी स्थिति में बच्चों से जबरदस्ती काम कराया जब वर्ष 1989 में बच्चों के कन्वेन्शन के 38 वें अनुच्छेद में आया है कि सशस्त्र बलों में 15 साल से कम उम्र के बच्चों से काम लेना मना है। इस अनुच्छेद में आया है कि जो देश इस कन्वेन्शन को मानते हैं उन्हें चाहिये कि वे मानवता प्रेमी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार युद्ध के समय बच्चों से संबंधित नियमों का सम्मान करें। इसी प्रकार इस कन्वेन्शन के 38 वें अनुच्छेद में आया है कि जिन देशों ने इस कन्वेशन को स्वीकार किया है वे इस बात को सुनिश्चित बनायेंगे कि 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे प्रत्यक्ष रूप से युद्धों में भाग न लें। इसी प्रकार इस कन्वेन्शन में आया है कि इस कन्वेशन को स्वीकार करने वाले देश अपनी सशस्त्र सेनाओं में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम नहीं लेंगे। इसी प्रकार जब 15 वर्ष से ऊपर और 18 साल से कम उम्र के बच्चे हों तो इन देशों को चाहिये कि वे अधिक उम्र वालों से काम लेने को प्राथमिकता दें।

युद्ध का एक दुष्परिणाम खाद्य पदार्थों की कमी और बच्चों सहित बहुत से लोगों को कुपोषण का सामना करना पड़ता है। उदाहरण स्वरूप दो करोड़ 12 लाख यमनी लोगों को खाद्य पदार्थों की कमी का सामना है जबकि 3 लाख 20 हज़ार यमनी बच्चों को कुपोषण का सामना है। यही हालत इराक, सीरिया और फिलिस्तीनी बच्चों की भी है।

बच्चों को गिरफ्तार कर लेना भी युद्ध का आभास किया जाने वाला एक दुष्परिणाम है। यह चीज़ विशेषकर फिलिस्तीनी बच्चों में देखी जा सकती है। उदाहरण स्वरूप अक्सा इंतेफाज़ा आरंभ होने के समय से यानी 28 सितंबर वर्ष 2000 से मई 2016 तक 90 हज़ार से अधिक फिलिस्तीनियों की गिरफ्तारी दर्ज की गयी जिनमें 11 हज़ार की उम्र 18 साल से कम है।
वर्ष 2016 के आरंभिक 3 महीनों में जायोनी ने 18 वर्ष से कम उम्र के लगभग 1400 लोगों को गिरफ्तार किया ।

बच्चों पर जंग के सबसे बड़े कुप्रभाव में से एक कि जो महसूस नहीं होता, उनका शिक्षा से वंचित होना है।

बच्चों का बेघर होना, मदरसों स्कूल का ध्वस्त होना, शिक्षकों का बेघर होना और बच्चों के फ़ोर्स के रूप में जंग में इस्तेमाल के कारण वे शिक्षा के अधिकार से वंचित हो जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कोष यूनिसेफ़ ने सितंबर 2015 में एक रिपोर्ट में कहा है कि सीरिया, इराक़, लीबिया, यमन, फ़िलिस्तीनी और सूडान में जंग के नतीजे में 1 करोड़ 30 लाख से ज़्यादा बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। इन छह देशों में 8500 से ज़्यादा स्कूल हिंसा के कारण बंद पड़े हैं। सीरिया में हर चार में एक स्कूल जंग के शुरु होने के समय से बंद पड़ा है। सीरिया में 52 हज़ार से ज़्यादा शिक्षकों ने अपने पेशे को छोड़ दिया है। आतंकवादी, बच्चों, शिक्षकों और शिक्षा क्षेत्र के कर्मचारियों का अपहरण करके उन्हें यातना देते हैं।

2004 के आंकड़ों के अनुसार, सीरिया में पुरुषों और औरतों में शिक्षा दर क्रमशः 86 और 73.6 फ़ीसद थी। लेकिन मौजूदा आंकड़े दर्शाते हैं कि इस समय सीरिया में 43 लाख में लगभग 28 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं हालांकि वे प्राइमरी और माध्यमिक पाठयक्रम में दाख़िले के लिए ज़रूरी शर्त पर पूरे उतरते हैं।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने नवंबर 2015 में एक रिपोर्ट में कहा है कि तुर्की में 20 लाख से ज़्यादा सीरिया के शरणार्थी हैं। इनमें 7 लाख 8000 बच्चों की स्कूल जाने की उम्र है जबकि 4 लाख बच्चे तुर्की में स्कूल नहीं जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कोष यूनिसेफ़ ने 2015 में उल्लेख करते हुए कि इराक़ में लगभग 20 लाख बच्चे शिक्षा से वंचित रहे हैं, सचेत किया कि इस देश में हिंसा जारी रहने की स्थिति में जल्द ही 12 लाख और बच्चे शिक्षा से वंचित बच्चों की सूचि में शामिल हो जाएंगे। इराक़ के 10 लाख बेघर बच्चों में लगभग 70 फ़ीसद स्कूल जाने से वंचित रहे हैं और 5300 से ज़्यादा स्कूल व शैक्षिक प्रतिष्ठानों को नुक़सान पहुंचा है या ये प्रतिष्ठान शरणार्थियों को शरण देने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं।

जंग का एक और कुपरिणाम जो दिखाई नहीं देता, वह मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। मनोवैज्ञानिक प्रभाव और जंग के दूसरे प्रभाव के बीच अंतर यह है कि मनोवैज्ञानिक प्रभाव लंबे समय तक बाक़ी रहता है।

मिसाल के तौर पर ग़ज़्ज़ा पट्टी शैक्षिक संघ की 2016 की रिपोर्ट में आया है कि 2014 में 50 दिवसीय ग़ज़्ज़ा जंग के दो साल गुज़रने के बाद भी 5 लाख से ज़्यादा बच्चे और छात्र इस सैन्य अतिक्रमण से उत्पन्न मानसिक पीड़ा में ग्रस्त हैं।

अनाथ होना, यौन हिंसा और उसके कुप्रभाव, समाज से कट जाना, सांस्कृतिक टकराव, बीमारी, स्थानीय लोगों के भेदभावपूर्ण व्यवहार और जबरन शादी, बच्चों पर जंग के मानसिक व लंबे समय तक रहने वाले सबसे ख़तरनाक परिणाम हैं।

जंग से बच्चों के प्रभावित होने के बारे में जो बात अहम है वह यह कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन और दुनिया के देशों पर बच्चों के अधिकार की रक्षा की ज़िम्मेदारी है लेकिन वे बच्चों की रक्षा के संबंध में अपने मानवीय कर्तव्य को कम ही अंजाम देते हैं।

जंग के दूसरे बुरे परिणाम में बच्चों और महिलाओं पर बलात्कार के लिए हमला भी है कि जिसका सामाजिक स्तर पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। हालांकि इस सामाजिक समस्या की आंकड़े के आधार पर समीक्षा नहीं हो सकती लेकिन आबादी के बहुत बड़े भाग के बेघर होने के मद्देनज़र महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार की घटना से इंकार नहीं किया जा सकता।

आज जहाँ कहीं भी जंग हो रही है वहां के हालत बयान करने में भी तकलीफ होती है, मैंम्मार से लेकर फिलिस्तीन तक इंसानी लाशों के अम्बर लगे हैं, एक एक कब्र में दर्जनों लाशें, जंग की ज़रूरतें, जब इंसान जंगलों में रहता था तब थी, आज जंग की नहीं बल्कि अमन की ज़रूरत है, मुल्कों की पॉलिसी जनता की सहूलतों के लिए होना चाहिए न कि अपने राजनैतिक और निजी हितों की पूर्ति, भारत और पाकिस्तान कभी एक देश था, कोशिश क्यों नहीं कि जाती है, जब जर्मनी एक हो सकता है, नार्थ कोरिया और साउथ कोरिया आपस में बात करने को तैयार हो सकते हैं तो कोशिश करने में क्या बुराई है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान, भारत मिल कर एक ‘ग्रेट इंडिया’ बने,,,जनता इधर की हो या सरहद पार पाकिस्तान की,,,अहसास, ज़ाबन, रंग, क़द, आंखें, बाल, चेहरे एक जैसे हैं,,,हुकूमतें, सरहद खड़ी करती हैं, हुकूमतें करने वाले जनता से राजनीती करते हैं, न्यूज़ चैनल वाले जंग करते हैं,,,,मुझे तो मुहब्बत पसंद है……..

परवेज़ ख़ान

 

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