संघी मीडिया की आँखों का तारा, सलमान नदवी कौन हैं?

संघी मीडिया की आँखों का तारा, सलमान नदवी कौन हैं?

Posted by

Azhar Shameem
=============
ये सलमान नदवी कौन हैं, जिनकी आजकल बड़ी चर्चा है। ये वही मौलाना हैं , जिन्होंने I.S.I.S के बगदादी को इराक के मोसुल फतह करने और खुद को खलीफा घोषित करने पर मुबारकबादी का खत लिखा था। और जब हंगामा हुआ तो अपने बयान से पलट गए और स्पष्टीकरण जारी किया।
आजकल श्री, श्री रविशंकर के साथ मिल कर संघ के राम मंदिर निर्माण प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। और संघी मीडिया की आँखों का तारा बने हुए हैं।
आज़ादी के 70 साल बाद भी जब बाबरी मस्जिद का मसला हल नहीं हुआ और एक पच्छ लगातार अपनी मनमानी दिखा रहा है , धमकियां दे रहा है कि 3 नहीं अब 30 हज़ार नहीं बचेगी एक मज़ार और राम लला हम आएंगे , मंदिर वही बनाएंगे। और जिन भगवावादी दंगायीययों की वजह से हज़ारो मुसलमान शहीद हो गए। उन्होंने देश के कानून को जुते की नोक पर रखा, सर्वोच्च न्यायायलय में हलफनामा दिए जाने के बावजूद धोखा दिया और भगवा आतंक का प्रदर्शन करते हुए 400 साल पुरानी जर्जर ईमारत को ध्वस्त कर दिया और आज भी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं , ऐसे में उनसे क्या समझौता करना ?
और अब जब 14 मार्च से सर्वोच्च न्यायालय बाबरी मस्जिद मसले पर सुनवाई करने वाला है और सभी मुस्लिम संस्थाओं ने ये कह दिया है कि वो अदालत के फैसले का सम्मान करेंगी तो मौलाना को इसमें बीच में कूदने की क्या ज़रूरत पड़ गयी ? वो कौन सी डील हुई है या कौन सा दबाव है जिसके चलते मौलाना मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पुराने मेंबर होने के बावजूद अपनी अलग दलील देने लगे और मालिकी फ़िक़ह की बात करने लगे। क्या ये मालिकी फ़िक़ह को मानने वालों का मसला है। भारत में मालिकी या शाफ़ई मसलक के मुसलमानो की फ़िक़ह पर अमल हो रहा है ? कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि मौलाना संघ के आलाकार बन गए हैं और संघी एजेंडे पर काम कर रहे हैं। आखिर इन संघियों को भी इतनी चिंता कयौ हो रही है , जब इन्हें विश्वास है कि फैसला उनके पच्छ में आयेगा और उनका दावा मज़बूत है तो उन्हें भी सब्र करना चाहिए। और अदालत के फैसले का सम्मान करना चाहिए। असल मुद्दा ये है कि देश की सर्वोच्च अदालत और खुद केंद्र सरकार की साख दांव पर लगी हुई है और दुनिया भर की नज़रें इस फैसले पर लगी हुई हैं, वे ज़रूर जानना चाहेंगी की जबरन धोखे से बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में मूरत रखने वाले और फिर आंदोलन चला कर मस्जिद को ध्वस्त करने वालों को क्या सज़ा दी गयी और मसजिद पच्छ वालों के साथ क्या इंसाफ हुआ।