सौभाग्य है कि मोदी, नेहरू नहीं हैं

सौभाग्य है कि मोदी, नेहरू नहीं हैं

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बहुत से संपादीय लेखकों ने कभी कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को संसद के भीतर और बाहर ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान देने के कारण आलोचना का निशाना बनाया। यह आलोचना आम तौर पर उनके स्टाइल पर होती है बयानों की विषयवस्तु के बारे में नहीं।

जब नरेन्द्र मोदी अपने वर्तमान स्वरूप में ही लोकप्रिय हैं तो उन्हें ख़ुद को बदलने की क्या ज़रूरत है?

नरेन्द्र मोदी हिंदुत्ववादी भीड़ और गौरक्षकों के मामले में आंख बंद कर लेते हैं इस पर उनके विरोधियों को शिकायत है लेकिन लोगों ने उन्हें चुना ही इसलिए बल्कि इससे भी बुरे कामों के लिए है।

मोदी अपने विरोधियों की इच्छा के अनुसार अपने विचारों और आस्थाओं को क्यों बदलें? यह ज़रा अपेक्षा से परे बात है कि भारत को बहुसंख्यकवादी देश बनाने का सपना लंबे समय से देखने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने के बाद धर्म निरपेक्ष लोगों के अनुसार काम करेगा।

अगर नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि भारतीय मुसलमान तो मियां मुशर्रफ़ की औलाद हैं तो बहुत से लोग उनकी इस बात से असहमत हो सकते हैं लेकिन जिन लोगों ने उन्हें चुना है उन्हें इसकी चिंता नहीं या फिर शायद वह ख़ुद भी इसी प्रकार के विचार रखते हैं।

हम उनके बारे में वह बनने की क्यूं तमन्ना करें जो वह नहीं है और शायद जो उन्हें कभी होना भी नहीं चाहिए? आप सोचिए यदि श्रीमान मोदी इतिहास पर अच्छी अच्छी किताबें लिखने लगें या संसद में अथवा अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलनों में शानदार अंग्रेज़ी या हिंदी उर्दू के मिश्रण वाली कानों को बहुत भली लगने वाली भाषा में भाषण देने लगें! हमें ख़ुद को बहुत भाग्यशाली समझना चाहिए कि मोदी, नेहरू नहीं हैं।

या यह सोचिए कि नेहरू अपनी डिस्कवरी आफ़ इंडिया में यह लिख दें कि भारत में प्रतिरोपण सर्जरी वेदकाल से शुरू हो गई थी या फिर आयोध्या में मंदिर के लिए कैंपेन करने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाए ख़ुद यह कैंपने चलाने लगें, या उनके दिल में भारत के मुसलमानों के प्रति नफ़रत भर जाए और उन्हें वह पाकिस्तानी एजेंट कहने लगें तो कैसा लगेगा। तो क्या यह सौभाग्य की बात नहीं है कि मोदी, नेहरू नहीं हैं।

इस भूमिका के बाद मैं यह कहना चाहता कि भारतवासियों यह समझना होगा कि उनके भीतर के जटिल सामाजिक तथ्य यह है कि वह दुखद तथ्यों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं उन पर टिप्पणी नहीं करना चाहते।

जो कुछ हम कर सकते हैं और हमें करना चाहिए वह यह है कि हम लोगों के विचारों और बर्ताव से यह समझें कि उन्होंने क्यूं नेहरू को नकार कर मोदी को स्वीकार कर लिया है।

वह लोग कौन थे जिन्होंने गुजरात में रेप और हत्या की घटनाएं अंजाम दीं? किसकी ग़लती का नतीजा है कि आम लोगों ने दक्षिणपंथी तत्वों को देश की बागडोर सौंप दी। यह एक जटिल सवाल है जिसका उत्तर देने के लिए कोई भी तैयार नहीं है।

भारत के वरिष्ठ राजनैतिक टीकाकार जावेद नक़वी के लेख के कुछ अंश