हाँ मैं सलमान नदवी हूँ…!

हाँ मैं सलमान नदवी हूँ…!

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नाज़िश हुमा क़ासमी वाया Abdurrahman SiddiQui
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हां मैं सलमान नदवी हूं, जी हाँ मैं मुफ़स्सिर ए क़ुरान; मुहद्दिस ए दौरां और मुजतहिद ए वक़्त हूँ; मेरी पैदाइश आज़ादी के सात साल बाद 1954 में लखनऊ के सादात घराने में हुई, मेरा पुश्तैनी गांव मुज़फ्फरनगर का मंसूरपुर है, मैं मौलाना अली मियाँ नदवी के बड़े भाई अब्दुल अली कक नवासा हूँ, मैंने 1976 में नदवा से सनद ए फ़राग़त हासिल की, फिर उसके बाद जामिया इमाम मुहम्मद बिन सऊद अल इस्लामिया से एम ए किया, उसके बाद दर्स व तदरीस से जुड़ा, फ़िलहाल नदवतुल उलमा का उस्ताज़ हूँ, ख़िताबत के ज़रिए मैंने आलमी शोहरत पायी, जो मुझे सच लगा डंके की चोट पर बोला उसकी वजह से गालियां भी खायीं, ताने भी दिए गए, लोगों ने लानत मलामत भी की; लेकिन मैं बिना परवाह किए बोलता रहा, कहता रहा, लेकिन ख़ामोशी इख़्तियार नहीं की, बातिल से कभी समझौता नहीं किया। मेरे तर्ज़ ख़िताबत लोगों में काफ़ी मक़बूल है, लोग मेरे तर्ज़ की नक़ल करना फ़ख्र समझते हैं, मैंने सऊदी हुक्मरां के ख़िलाफ़ भी लब कुशाई की जुर्रत व हिम्मत की, जिसे एक बड़े तबके से सराहा, मैंने सीरिया में खाना जंगी के ख़िलाफ़ भी बोला, मैंने इस्राइल की मज़म्मत (निन्दा) भी की, मैंने ग़िज़ा से हमदर्दी का एलान भी किया, मैंने मस्जिद ए अक़सा की बाज़याबी के लिए कांफ्रेंसें भी कीं, लेकिन इन सबके बावजूद जब मैं अपने इज्तिहाद से मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का मेम्बर रहते हुए हनफ़ी रहते हुए फ़िक़्ह हम्बली के हवाले से बात की तो लोग मुझ पर चढ़ दौड़े, क्या फ़िक़्ह हम्बली ग़लत है? क्या फ़िक़्ह हम्बली पर अमल करते हुए बाबरी मस्जिद बिरादरान ए वतन को नहीं दी जा सकती? दी जा सकती है…. यह मेरा इज्तिहाद है… और हाँ मैं मुज्तहिद ए दौरां हूँ…..!

लोगों को यक़ीन नहीं हो रहा है कि मैं ऐसा बयान दागूंगा और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ख़िलाफ़ जाऊँगा, अब जबकि मैंने महाज़ खोल दिया है तो लोगों को भी अपनी आँखें खोल लेनी चाहिए और मेरा साथ दे कर हिन्दुस्तान को ख़ून ख़राबा से रोकना चाहिए….क्या मुसलमान तालीफ़ ए क़ल्ब के लिए बाबरी मस्जिद नहीं छोड़ सकते….? क्या बाबरी मस्जिद वहीं बनाना ज़रूरी है ? मैं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ख़िलाफ़ हूँ, उन्हें तालीफ़ ए क़ल्ब नहीं मालूम….. वो मस्जिद से दस्तबरदार नहीं होना चाहते, वो कह रहे हैं एक बार जहां मस्जिद बन जाती है वो आसमान से ज़मीन तक क़यामत तक मस्जिद ही रहती है; लेकिन नहीं मेरा नज़रिया यह है कि तालीफ़ ए क़ल्ब के लिए हिन्दुस्तान को खाना जंगी से बचाने के लिए हदीस के मुक़ाबले में डबल श्री की बात मान ली जाए और मुसलमान मस्जिद से दस्तबरदार हो जाएं, मुझे याद है जब 2002 में बिहार के एक मशहूर इलाके में गया तो एक ख़ुसूसी नशिस्त में मैंने ख़िताब किया था, जिसमे बिरादरान ए वतन भी शरीक (सम्मिलित) थे, मैंने कहा था कि तुम ख़ुदा को नहीं मानते, तुम काफ़िर हो, तुम हज़ारों ख़ुदाओं की पूजा करते हो, तुम मुशरिक हो, मुझे उस वक़्त तालीफ़ ए क़ल्ब का पता नहीं था, मैंने काफ़िर को काफ़िर कहा क्या यह ग़लत है ? मैंने मुशरिक को मुशरिक कहा क्या यह ग़लत है ? अरे मैं तो मुसलमानों को भी क़ाफ़िर कह सकता हूँ अगर वो इस्लाम पर अमल नहीं करते तो यक़ीनन काफ़िर हैं….!
हाँ मैं वही सलमान नदवी हूँ जिसने मुंबई के एक गरीब रिहाइश वाले इलाके में मौजूद मदरसे को सुवर के बाड़े से ताबीर किया था, यक़ीनन वो सुवर का बाड़ा ही है…. क्या इस तरह गन्दगी के ढेर पर मदरसे बनाए जाते हैं…? क्या वहां वहां हदीस की तालीम दी जा सकती है….? क्या यह सरकारी इन्तिज़ामिया का क़ुसूर नहीं कि उसने वहाँ “जबल उल कनासा” क्यों क़ायम किया ? उसकी ग़लती नहीं कि वो पूरे मुम्बई का कचरा वहां क्यों डम्प करती है….. ग़लती उन सुवर के बाड़ों में रहने वालों की है….. वो क्यों वहाँ रहते हैं और रहते भी हैं तो क्यों उन्होंने ने सुवर के बाड़े में मदरसा खोल कर मुझ जैसे “नफ़ीस व पाकबाज़” शख़्स को बुला कर इल्म की, आलिम की, मुहद्दिस की, मुफ़क़्क़ीर की, ख़तीब की, दानिश्वर की और एक मुज्तहिद ए वक़्त की तौहीन की…. ख़ुदा उनसे बदला लेगा….!

हां मैं अम्न का दाई हूँ, हाँ मैं अपने मुक़ाबले में सज्जाद नोमानी को फ़सादी मौलाना कहलवाया, यह सच है, वो फ़सादी हैं जब ही तो बोर्ड में फ़साद फैला रहे हैं, इत्तिहाद के ज़रिए फ़साद फैलाना कोई नोमानी साहब से सीखे….. वो बाबरी मस्जिद बिरादरान ए वतन को न दे कर फ़साद फैला रहे हैं, बल्कि मैं अगर अभी मुराक़बा करूँ और कुछ देर तक मुराक़बा लम्बा हो जाए तो मैं अपने तर्ज़ ए ख़िताबत के ज़रिए इस तरह कहूंगा कि अगर बोर्ड ने मेरी बात न मानी तो बोर्ड के अफ़राद काफ़िर हैं, अगर उन्होंने तालीफ़ ए क़ल्ब के लिए मस्जिद से दस्तबरदारी नहीं की तो मुशरिक हैं, अगर वो अपने राय पर अटल रहे तो फ़सादी हैं, ज़िनदीक़ हैं जिनसे ख़ुदा बदला लेगा।

हाँ मैं वही सलमान नदवी हूँ जिसने मस्जिद की शरई हैसियत हमेशा बाक़ी रहती वाले फ़तवे पर खुशी से दस्तख़त किया था; लेकिन अब मैं इमाम अहमद बिन हम्बल के मरजूह क़ौल को पेश करके मुसलमानों को बाबरी मस्जिद से दस्तबरदार होने का मशवरा देने पर मजबूर हूँ…. लोग मुझ से मुतालबा कर रहे हैं कि मैं अपने उस क़ौल से रुजू कर लूं, शायद उन बेवक़ूफों को मेरी तारीख़ मालूम नहीं….. मौलाना सलमान नदवी का दूसरा नाम ही ‘रुजू करने वाला मौलाना” मशहूर है, और यह भी पहले क़ौल से रुजू ही है…. मुझे रुजू करने में कोई दिक़्क़त नहीं है, ग़लती समझते ही रुजू दर रुजू करने की मेरी तबनाक तारीख़ रही है, मेरा क्या है ? मैं कल भी रुजू कर सकता हूँ और परसों भी…. इस शर्त पर कि ख़ुद मुझे ग़लती समझ आ जाए…. दूसरों की मैं बिल्कुल नहीं सुनता ….. मेरे हाल में दिए गए बयान पर एक्शन लेने के बजाए बोर्ड ने चार मेम्बर्स की कमेटी बनायी थी, उस कमेटी को मैं ज़हमत नहीं देना चाह रहा था इसलिये मैंने इण्डिया टीवी पर ख़ुद खुल्लम खुल्ला एलान कर दिया था कि अब बोर्ड के मोअक़्क़र और बुज़ुर्ग मेम्बर्स भी मेरे इस्तीफ़े को क़ुबूल कर लिया है और आज हैदराबाद इजलास में ज़फ़रयाब जीलानी ने बाक़ायदा एलान भी कर दिया है कि मैं अब बोर्ड का मेम्बर नहीं हूँ…!

…मन्कू○○○○○○○ल…