#कम्यूनिस्ट_इन्क़िलाब : The Communist Manifesto

#कम्यूनिस्ट_इन्क़िलाब : The Communist Manifesto

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Sikander Kaymkhani
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यूरोप में सरमायादाराना (पूँजीवादी) इन्क़िलाब (क्रांति) के बाद दुनिया एक नए दौर में दाख़िल हो गई थी। मग़रिब (पश्‍चिम) में सरमायादार (पूँजीवादी), अवाम (जनता) के नुमाइंदों की सूरत में मस्नदे इक्तिदार पर बैठ गए थे। सरमायादारना निज़ाम (पूँजीवादी व्‍यवस्‍था) ने यूरोप को जो दिया सौ दिया, मगर उस निज़ाम (व्‍यवस्‍था) का भयानक चेहरा जल्‍द ही अपने मस्नूई ख़ुशनुमा मासिक के नीचे से निकल आया। उस वक़्त यूरोप के पड़ोस में मौजूद रूसी रियासत पर Czars की हुकूमत थी। यूरोप की तरह रूस भी एक ऐसे दौर से गुज़र रहा था जहां अवाम (जनता) का मआशी इस्तिहसाल (आर्थिक शोषण) हो रहा था। सियासी सूरते हाल ग़ैर-यक़ीनी और इंतिशार की तस्वीर बनी हुई थी। सनअत व तिजारत ज़वालपज़ीर थी, ज़रई सनअतें सत्तरवीं सदी के मॉडल पर चल रही थीं, सनअत और बंकारी में चालीस फ़ीसद से ज़्यादा हिस्सा बैरूनी सरमायादारों का था। लोगों के लिए ज़िंदा रहना एक कश्मकश थी। कमाई कम और अख़राजात ज़्यादा, बैरूनी क़र्ज़ा जात बढ़ रहे थे। ग़रज़ीका मुल्‍क दीवालीया होने को था। इस सूरते हाल में लोग सियासी निज़ाम (राजनीतिक व्‍यवस्‍था) और हुकूमत से उकताए हुए थे और एक तब्‍दीली के इंतिज़ार में थे।

इससे पहले के हम कमीयूनिस्‍ट इन्क़िलाब (क्रांति) की तारीख़ (इतिहास) और वाक़ेआत की तरफ़ बढ़ें, हमें इन अफ़्क़ार (विचारों) की तरफ़ भी देखना होगा जो कमीयूनिस्‍ट इन्क़िलाब (क्रांति) की बुनियाद बने। कमीयूनिस्‍ट इन्क़िलाब (क्रांति) का फ़िक्री (वैचारिक) बानी कार्ल माक्स (1818CE-1883CE) को कहा जाता है। कार्ल माक्स के अफ़्क़ार (विचारों) को एक फ़िक़रे में समाने के लिए उसकी किताब The Communist Manifesto के पहले बाब की पहली सतर काफ़ी है जो 1848 ई. में शाय हुई। इसने कहा The history of all hiterto existing society is the history of class struggles. यानी कि आज तक तमाम समाजों की तारीख़ तबक़ाती (वर्गी) जद्दोजहद की तारीख़ (इतिहास) है। उसने कहा कि मुआशरे (समाज) की तबक़ाती तक़सीम (वर्गीकरण) बाअज़ इंसानों की बनाई हुई मस्नूई तक़सीम (बटंवारा) है जिसका मक़सद इंसान के हाथों इंसान के इस्तिहसाल (शोषण) के सिवा कुछ नहीं। इसीलिए उसने ज़ाती मिल्कियत को ख़त्म करके रियासती मिल्कियत का तसव्वुर पेश किया। अपनी किताब “Das Capital” यानी सरमाया (पूँजीवादी) में उसने ये कहा कि इंसानी तारीख़ (इतिहास) तमाम की तमाम ज़राए (कृषि) पैदावार के गिर्द घूमती है। तारीख़ (इतिहास) में जितनी तब्‍दीलीयां वाक़ेअ (घटित) हुई हैं ख़ाह वो जंगों की सूरत में हो, नक़्ले मकानी, नए मुमालिक (देशों) का वजूद या इन्क़िलाबात की शक्ल में, बाअज़ नसलों की अफ़्ज़ाइश हो या बाद का इस्तिहसाल (शोषण), ये सबज़राइअ पैदावार की नौईयत और उनकी मिल्कियत की तब्‍दीलीयों की वजह से रौनुमा हुई हैं इसलिए ज़राए (कृषि) पैदावार पर चंद मख़सूस (खास) लोगों का क़ब्‍ज़ा जिन्हें इसने Bourgeois कहा, ही मुआशरे की बुरी हालत और बुराईयों मसलन ग़ुर्बत (गरीबी), भूक, क़हत (अकाल), झूठ, फ़रेब और मुनाफ़क़तों का ज़िम्मेदार है। इसी बिना पर ज़राए (कृषि) पैदावार पर एक खास तबक़ा (वर्ग) का क़ब्‍ज़ा नहीं होना चाहिए बल्कि दौलत की तक़सीमे मेहनत के मुसावी (बराबर) होनी चाहिए जिसकी अमली सूरत ज़राए पैदावार पर रियासती कंट्रोल है। कम्यूनिज्‍़म की फ़िक्री (वैचारिक) बुनियाद को समझने के लिए चाल्‍स डार्विन का नज़रीया-ए-इर्तिक़ा (Evolution Theory) को समझना इंतिहाई ज़रूरी है। ये डार्विन का नज़रीया-ए-इर्तिक़ा ही था जिसके तसव्वुरात ने कार्ल माक्स और सैगमंड फ्राइड जैसे मुफ़क्किरीन को अपने नज़रियात के दिफ़ा (रक्षा) में मदद दी। इस नज़रिया (दृष्टिकोण) ने ख़ुदा के वजूद पर एतराज़ उठाया और माद्दे के इर्तिक़ा के अमल में एक मावरा-ए-अक्‍़ल हस्ती (अक्‍़ल से परे एक ज़ात) की ज़रूरत को ख़त्म कर दिया और इस तरह से ईसाईयत जो फ़िक्री (वैचारिक) तौर पर दीवालीया मज़हब है, वो इन हमलों का कोई असरदार जवाब ना दे सका। इससे ईसाईयत के अक़ाइद (आस्‍था) पर एक कड़ी और बराहे रस्त ज़रब लगी। जहां एक तरफ़ साईंस और मईशत (अर्थव्‍यवस्‍था) में डार्विन और मार्क्‍स ईसाईयत के अक़ाइद (आस्‍थाओं) की धज्जियां उड़ा रहे थे, रही सही कसर एक माहिरे नफ़सीयत सैगमंड फ्राइड ने पूरी कर दी जिसने तमाम ज़हनी मराइज़ (रोग) जैसे मायूसी, दिवानगी, हिस्टेरिया, वहम, एहसास कमतरी व बरतरी की बुनियादी वजह ज़हनी दबाव (Repression) को क़रार दिया और इस दबाव की वजह वो क़दग़न बताई जो मुआशरे (समाज) और मज़हब (धर्म) ने इंसान की जिन्सी ख्‍वाहिश पर लगाई है। इस दबाव (Repression) को ख़त्म करने का तरीक़ा यही है कि इंसान को जिन्सी तसकीन हासिल करने के लिए मुकम्मल आज़ादी दी जाये और मज़हब व मुआशरे की खड़ी की गई दीवारों को ख़त्म कर दिया जाये। इन अफ़्क़ार (विचारों) को समझने से मालूम होता है कि अगरचे सरमायादाराना इन्क़िलाब (पूँजीवादी क्रांति) ने भी मज़हब (धर्म) को गिरजाघर तक सीमित करने की बात की थी मगर मज़हब (धर्म) की बुनियादों पर इतना शदीद हमला पहले कभी नहीं हुआ था। रूस में आने वाला ये इन्क़िलाब (क्रांति) उन्ही अफ़्क़ार व नज़रियात (विचार व दृष्टिकोण) की बुनियाद पर आया था। इसीलिए हम देख सकते हैं कि इस इन्क़िलाब के बाद ये मज़हब ही था जो हर ज़ुल्‍म और जबर का निशाना बना, ख़ाह वो ईसाईयत हो, इस्लाम हो या कोई और।

बीसवीं सदी की इब्तिदा (शुरूआत) में कम्यूनिज्‍़म के नज़रिए (दृष्टिकोण) की मक़बूलियत ने दिन ब दिन इज़ाफ़ा (बढो़तरी) हो रहा था। रूस की Russion Social Democratic Labour Party कम्‍यूनिस्‍ट इन्क़िलाब (क्रांति) के लिए जद्दोजहद कर रही थी। इस जमाअत में आम तौर पर दो तसव्वुरात के हामिल लोग मौजूद थे। एक वो जिन्हें एतिदाल पसंद (नर्मीपंसद) कहा जा सकता है जिनकी क़ियादत (नेतृत्‍वता) जूलियस मारटोव कर रहा था और जो Czars की हुकूमत को ही एक रिपब्लिक में बदल देना चाहते थे और एक Hard liner तबक़ा (वर्ग) जिनकी क़ियादत (नेतृत्‍वता) विलादमीर लेनिन कर रहा था जिनको आम ज़बान में इन्क़िलाबी (क्रांति) कहा जा है। 1903 ई. में होने वाले एक अहम पार्टी वोट जिसमें पार्टी की रुकनीयत सिर्फ़ सरगर्म कम्‍यूनिस्‍ट वर्करों को दिए जाने पर वोटिंग हुई, के बाद ये नाम Manshevik यानी अक़ल्लीयत और Bolshevik यानी अक्सरीयत में बदल जाये। अक्सरीयत लेने वाला ग्रुप लेनिन का था जिनके नज़दीक पार्टी की रुकनीयत सिर्फ़ सरगर्म कम्‍यूनिस्‍ट वर्करों का हक़ थी और ये Bolsheviks ही थे जिन्होंने 1917 ई. में हुकूमत का तख़्ता उलट कर इन्क़िलाब (क्रांति) बरपा किया जिसको तारीख़ Bolshevik इन्क़िलाब (क्रांति) के नाम से याद करती है।

1905 ई. रूस में इन्क़िलाब (क्रांति) की पहली कोशिश का साल था जब एक पुरअमन रैली को Winter Palace (Czars की रिहायश गाह) की तरफ़ जाने से रोका गया और फायरिंग के नतीजे में सैंकड़ों लोग मारे गए। उस दिन को Bloddy Sunday यानी ख़ूनी इतवार के नाम से जाना जाता है। इसके नतीजे में उठने वाली तेहरीक (आंदोलन) को फ़ौज के कुछ हिस्सों और मज़दूरों की भरपूर हिमायत हासिल थी मगर लिबरल तबक़ा (वर्ग) के पीछे हट जाने से ये इन्क़िलाब (क्रांति) नाकाम हो गया और अप्रैल 1906 ई. तक 14000 Bolsheviks क़त्‍ल जबकि 75000 को जेल भेजा जा चुका था। ये इन्क़िलाब (क्रांति) नाकाम तो हो गया मगर इसने जहां एक तरफ़ Czars की हुकूमत के ऐवानों में खलबली मचा दी वहां दूसरे तरफ़ अवाम (जनता) के अंदर हुकूमत के ख़िलाफ़ नफ़रत और ग़ुस्से में मज़ीद इज़ाफ़ा (और ज्‍़यादा बढो़तरी) किया। यहां ये बात समझनी इंतिहाई अहम है कि मुआशरे (समाज) में रौनुमा होने वाला एक अहम वाक़िआ एक तेहरीक (आंदोलन) को जन्म दे सकता है ख़ाह वो लाल मस्जिद जैसा कोई वाक़िया हो या फिर वज़ीरस्तान का ऑप्रेशन। वो लोग जो मुआशरे (समाज) की सोच और जज़बात से आगाह हैं और सियासी (राजनीतिक) सूझबूझ के मालिक हैं वो ऐसे वाक़ेआत की वजह से बदलती हुई राय आम्मा (जनमत) को अपने हक़ में हमवार करना ख़ूब जानते हैं। यही एक सियासतदान (राजनीतिज्ञ) की सलाहियत का सबूत है। ऐसा ही कुछ रूस के अंदर हुआ।

पहली जंगें अज़ीम (विश्‍वयुद्ध) में रूस की हज़ीमत आमेज़ शिकस्त ने Czar की हुकूमत की रही सही साख्‍़त भी ख़त्म कर दी थी। मुआशरे (समाज) के हर तबक़े (वर्ग) के अंदर हुकूमत और निज़ाम (व्‍यवस्‍था) के ख़िलाफ़ जज़बात मौजूद थे। फरवरी 1917 ई. इन्क़िलाब रूस का महीना, जिसको इन्क़िलाबे फरवरी भी कहा जाता है जब 23 फरवरी इल्‍मी यौम ख़वातीन के मौक़ा पर St. Petersberg में टेक्सटाइल फ़ैक्ट्रीयों के मुलाज़िम जिनमें ज़्यादातर ख़वातीन थीं, अपनी अबतर मआशी (सामाजिक) सूरते हाल और रोटी के लिए हड़ताल कर दी। मुज़ाहिरीन (प्रदर्शनकारी) की तादाद बढ़ते बढ़ते 24 फरवरी तक दो लाख तक पहुंच गई और फ़ौज ने उनके ख़िलाफ़ हथियार उठाने से इनकार कर दिया यानी के Chain of Command तोड़ दी और इस तरह St. Petersberg में मर्कज़ी (केन्द्रिय) हुकूमत का अस्र व रसूख़ ख़त्म हो गया मगर हड़तालों का सिलसिला निहरिका और पूरे मुल्‍क में हड़तालें जारी रही हत्ता कि 10 अक्तूबर को Bolshevik Central Committee ने एक मुसल्लह बग़ावत का ऐलान कर दिया। 23 अक्तूबर को Bolshevik रहनुमा, जान एनोलट ने Tallinn, Estonia में जबकि 25 अक्तूबर को St. Petersberg में मुसल्लह बग़ावत हो गई। 25 और 26 अक्तूबर की दरमियानी रात को Winter Palace पर धावा बोल दिया गया और यूं कम्‍यूनिस्‍ट इन्क़िलाब 25 अक्तूबर 1917 ई. को बरपा हुआ। लीवन टरोटसकी इन्क़िलाब (क्रांति) के हवाले से कहता है, ”ये इन्क़िलाब किसने बरपा किया, जिन मुट्ठीभर Bolsheviks ने। यक़ीनन तब्‍दीली के लिए अफ़रादी क़ुव्वत इतनी अहम नहीं जितनी कि इस मख़सूस (खास) गिरोह की अपने अफ़्क़ार (विचारों) और नज़रियात से Committment और अपने मक़सद के हासिल करने के लिए तड़प है।” आज भी उम्मत का एक छोटा सा गिरोह इस तब्‍दीली को लाने के लिए काफ़ी है। ज़रूरत इस बात की है कि उम्मत के साथ तफ़ावुत और राब्‍ते के ज़रीये दरुस्त अफ़्क़ार (विचार) उम्मत तक पहुंचाए जाएं।

इन दोनों इन्क़िलाबात (क्रांतियों) में एक मुश्तर्क (समान) पहलू ये है कि ये दोनों इन्क़िलाबात (क्रांतियॉं) ख़ूनी थे जिसकी बुनियादी वजह वो तरीका-ए-कार है जिस पर चलते हुए ये इन्क़िलाबात (क्रांतिया) बरपा किए गए। यानी एक तरफ़ अवामी सतह (आम) पर बग़ावत और इसके साथ अस्करी जद्दोजहद के ज़रीये मुआशरे (समाज) में बदअमनी और इंतिशार फैलाना। फ़्रांसीसी इन्क़िलाब (क्रांति) में तीस से चालीस हज़ार लोग इन फ़सादाद में हलाक हुए। इसी तरह से लाखों लोग रूसी इन्क़िलाब (क्रांति) में होने वाले फ़सादाद की भेंट चढ़ गए। इसी तरह जब ये इन्क़िलाबात दूसरे मुल्कों में बरामद किए गए तो वहां पर भी बहुत बड़े पैमाने पर ख़ून की नदियां बहीं। चीन का कम्‍यूनिस्‍ट इन्क़िलाब उसकी एक वाज़ेह (स्‍पष्‍ट) मिसाल है। यहीं से ये तसव्वुर आम हुआ कि इन्क़िलाबात ख़ूनी नौईयत के ही हो सकते हैं और इन्क़िलाब (क्रांति) लाने के लिए सड़कों पर ख़ून बहना एक लाज़िमी बात है। इसके बरअक्स दूसरी जानिब जब हम आक़ाए दो जहां मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) की सीरत को देखते हैं तो हमें एक पुरअमन सियासी (राजनीतिक) और फ़िक्री (वैचारिक) जद्दोजहद के नतीजे में एक सियासी (राजनीतिक) तब्‍दीली नज़र आती है, एक ऐसी तब्‍दीली जिसकी नज़ीर नहीं मिलती और ये तब्‍दीली इंतिहा ही Radical नौईयत की थी जिसने मदीने के पूरे मुआशरे को बिलख़सूस और पूरे जज़ीरानुमा अरब को बिलउमूम यकसर बदल के रख दिया। इस्लाम के लिए राय आम्मा को हमवार करने के साथ-साथ नबीए अकरम (صلى الله عليه وسلم) ने तलब-ए-नुसरा के ज़रीये इस रुकावट को ही रस्ते से हटा दिया जिस टकराव के नतीजे में यक़ीनन बहुत सा ख़ून बहता।।। मगर आपको जिस मिन्हज (तरीक़े) पर चलने के लिए रबे कायनात ने और दिली और अज़हान (दिमांगो) की जंग थी, और एक ख़ून का क़तरा बहाए बगै़र ये तब्‍दीली रौनुमा हो गई।

यक़ीनन इस्लामी रियासत के अज़सरे नौ अहया (पुर्नजागरण) के लिए काम करने वालों के लिए आप (صلى الله عليه وسلم) की सीरत से ही हिदायत लेनी है और किसी और इन्क़िलाब या इसके तरीका-ए-कार को अपनाना शरअन जायज़ नहीं और ना ही अमली तौर पर एक बेहतर रास्ता है। आज इक्कीसवीं सदी में ख़िलाफ़त अला मिन्हज नबुव्वत ही वापिस आएगी, यही आक़ाए दो जहां (صلى الله عليه وسلم) की बशारत है और यही रब्‍बे कायनात का वाअदा है।