जब हज़रत लुक़मान ‘दिल और ज़बान’ भून कर ले गए…. क्योंकि,,,,

जब हज़रत लुक़मान ‘दिल और ज़बान’ भून कर ले गए…. क्योंकि,,,,

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हज़रत लुकमान नबी थे या नहीं इसके बारे इख्तिलाफ़ है। लेकिन कुरआन में उनका हल बयान हुआ है, इसलिए हम भी उनका ज़िक्र करते है। हज़रत लुकमान का रंग काला था, हब्श के रहने वाले थे, बकरियां चराते थे। ख़ुदा ने उनको इल्म और हिकमत अता की थी।
एक दिन वह आम लोगो के मज्मे में हिक्मत की बातें बयान कर रहे थे कि उनके एक साथी ने पूछा कि तुम तो हमारे साथ बकरियां चराते थे, यह हिक्मत कहां से सीखी और यह बुलंद मर्तबा कहां से हासिल हुआ।

आपने फ़रमाया, “सच बोलने, अमानत में खियानत न करने और बेफायदा बातें छोड़ देने से।” शुरू में हज़रत लुकमान एक शख्स के गुलाम थे, उसने तीस मिस्काल में उनको खरीदा था। उसने एक दिन हज़रत लुकमान से कहा, “एक बकरी जिव्ह करो और जो हिस्सा सबसे बेहतर हो उसे भूनकर लाओ।” हज़रत लुकमान दिल और ज़बान भून कर ले आए।

कुछ दिनों के बाद आका ने फिर हुक्म दिया कि एक बकरी जिव्ह करो और सबसे ख़राब हिस्सा भून कर लाओ। हज़रत लुकमान फिर दिल और ज़बान भून कर ले गए। आक़ा ने पूछा, “पहले तो तू दिल और ज़बान को बदन का अच्छा हिस्सा समझ कर लाया था, अब जो मैंने सबसे बुरे हिस्से को माँगा तो भी तू यही लाया।” हज़रत लुकमान ने फ़रमाया, “अक्लमंदों की निगाह में अगर जबान बुरी बातों से और दिल नाकारा बातों से पाक हो तो यह सबसे अच्छे है, नहीं तो इनसे बुरा कोई नहीं।”

आक़ा बहुत खुश हुआ और उसने हज़रत लुकमान को आज़ाद कर दिया, कुरआन में है कि लुकमान ने अपने बेटे को नसीहत करते हुए कहा था कि “ऐ बेटे, ख़ुदा का शरीक न ठहराना शिर्क बहुत बड़ा ज़ुल्म है। मेरे बेटे! नमाज़ की पाबंदी रख और लोगो को भलाई का हुक्म दे और बुराई से रोक और जो भी मुसीबत तुझ पर पड़े उस पर सब्र कर, बेशक यह बड़ी हिम्मत के काम है।

लोगो के सामने अपना मुंह टेढ़ा न कर और जमीन में अकड कर न चल। खुदा इतरानेवाले को और डींगे मरनेवाले को पसंद नहीं करता। सीधी-सीधी चाल चल और अपनी आवाज़ को नीची कर। सब आवाजो से बुरी आवाज़ गधों की होती है।