#अनसुनी_अनकही_रानी_लक्ष्मीबाई : झांसी के राजा ब्रिटिश सरकार के विश्वसनीय थे

#अनसुनी_अनकही_रानी_लक्ष्मीबाई : झांसी के राजा ब्रिटिश सरकार के विश्वसनीय थे

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– अजेष्ठ त्रिपाठी
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खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी.

सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी इन पंक्तियों के साथ ही हमारे लिए लक्ष्मीबाई नेवलकर (झांसी की रानी का पूरा नाम) की कहानी खत्म हो जाती हैं. लेकिन कुछ अनकही कुछ अनसुनी रानी अभी भी बाकी है —–

#मशहूर_ऑस्ट्रेलियन_वकील_लैंग_जॉन जो झाँसी रियासत की कर्ता-धर्ता और महाराज गंगाधर राव की विधवा रानी लक्ष्मीबाई के विशेष आग्रह पर आगरा से झांसी पहुंचे थे. उस जमाने में लैंग को हिंदुस्तान में कंपनी शासन की तानाशाही के खिलाफ मुखर पैरवी करने के लिए जाना जाता था. रानी चाहती थीं कि वे लंदन की अदालत में डॉक्टराइन ऑफ लैप्स (गोद निषेध कानून) के विरोध में झांसी का पक्ष रखें. इस नीति के तहत दत्तक पुत्रों को रियासतों का वारिस मानने से इनकार कर दिया गया था.

यही वह दौर भी था जब ब्रिटिश सरकार ने रियासतों और राजे-रजवाड़ों द्वारा संतान गोद लेने की प्रथा को लेकर बेहद सख्त रुख अपना लिया था. इसे ध्यान में रखते हुए गोद लेने की पूरी रस्म झांसी में तैनात ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक एजेंट मेज़र एलिस की मौजूदगी में अदा की गयी. एलिस के जरिए महाराज ने रस्म से जुड़े सारे दस्तावेज और अपनी वसीयत तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी तक भिजवाए. इस वसीयत के मुताबिक वयस्क होने के बाद दत्तक पुत्र दामोदर राव झांसी का अगला महाराज होना था और तब तक लक्ष्मीबाई को उनकी और रियासत की सरपरस्त रहना था.

#मेजर_एलिस ने ये कागजात अपने वरिष्ठ अधिकारी जॉन मैलकॉम को सौंप दिए. हालांकि मैलकॉम लक्ष्मीबाई को राजनैतिक तौर पर इस पद पर नहीं देखना चाहता था, लेकिन फिर भी वह महाराज की वसीयत के समर्थन में था. लेकिन लॉर्ड डलहौजी की मंशा कुछ और थी. उसने वसीयत को मानने से इनकार कर दिया और नए कैप्टन अलैक्जेंडर स्कीन को झांसी की जिम्मेदारी सौंप दी।

#लैंग_जॉन ने रानी लक्ष्मीबाई के साथ अपनी पूरी मुलाकात का जिक्र अपनी किताब वांडरिंग्स इन इंडिया एंड अदर स्केचेज ऑफ लाइफ इन हिंदुस्तान में किया है. इसमें उन्होंने लिखा है, ‘झांसी के राजा ब्रिटिश सरकार के विश्वसनीय थे. कंपनी ने महाराज के भाई को ब्रिटिश फौज में अफसर बनाते हुए एक प्रशस्ति पत्र सौंपा. जिसमें उन्हें महाराज संबोधित किया गया. साथ ही उनसे वायदा किया गया कि ब्रिटिश हुकूमत इस उपाधि और इसके साथ जुड़ी स्वतंत्रता को राजा और उनके उत्तराधिकारियों के लिए सुनिश्चित करती है…’

लैंग आगे लिखते हैं, ‘कमरे के एक तरफ पर्दा लगा हुआ था और लोग उसके पीछे खड़े होकर बातें कर रहे थे…तभी पीछे से रानी की आवाज आयी. पर्दे के पास आकर वे मुझे अपनी परेशानियों के बारे में बताने लगीं. तभी अचानक से नन्हे दामोदर ने वो पर्दा खींच दिया और मैं रानी की एक झलक देख पाया. वह एक मध्यम कदकाठी की औरत थीं. युवावस्था में रानी बेहद खूबसूरत रही होगीं क्योंकि उनके चेहरे में अब भी काफी आकर्षण था. रानी की भाव-भंगिमाएं विद्वता भरी थीं और उनके नैननक्श काफी सुंदर थे. वे न तो बहुत गोरी थीं और न ही बहुत सांवली. उन्होंने सफेद कपड़े पहने हुए थे और सिवाय कानों की स्वर्ण बालियों के उनके तन पर कोई आभूषण नहीं था.’

#लैंग_ने_आगे_लिखा_है, ‘मैंने रानी की तारीफ में कहा,
“if the Governor-General could only be as fortunate as I have been and for even so brief a while, I feel quite sure that he would at once give Jhansi back again to be ruled by its beautiful Queen.”।
यदि गर्वनर जनरल भी मेरी तरह इतने सौभाग्यशाली होते जो आपके दर्शन कर पाते, तो वे अवश्य ही झांसी को उसकी खूबसूरत रानी के हवाले कर देते.

इस तारीफ के बदले में रानी ने शिष्टता भरा जवाब दिया कि ऐसा कोई कोना नहीं जहां आपके द्वारा गरीबों की मदद करने के किस्सों का जिक्र न होता हो.’

लैंग के मुताबिक उन्होंने रानी को समझाने की कोशिश की कि गवर्नर जनरल के हाथ में अब इतनी ताकत नहीं है कि वह रियासत को लेकर निर्णय ले सके और यह तभी होगा जब इंग्लैंड से इसका इशारा होगा. उन्होंने सलाह दी कि समझदारी इसी में है कि तब तक रानी दत्तक पुत्र के साथ हो रहे इस अन्याय के खिलाफ याचिका दर्ज करें और अपनी पेंशन लेती रहें. लैंग लिखते हैं, ‘इस बात पर लक्ष्मीबाई ने तीव्र प्रतिक्रिया दी और कहा, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी. मैंने अत्यंत नम्रतापूर्ण ढंग से उन्हें समझाने की कोशिश की. कहा कि इस विद्रोह का कोई अर्थ नहीं निकलने वाला है. ब्रिटिश सेना ने लावलश्कर के साथ तीन तरफ से आपको घेर रखा है. बगावत करने से आपकी आख़िरी उम्मीद भी खत्म हो जाएगी…रात के दो बज चुके थे. वे तकरीबन मेरी सभी बातों को मान गयीं थीं. सिवाय अंग्रेज सरकार से अपनी पेंशन लेने के.’

22 अप्रेल 1854 को लैंग जॉन ने लंदन की अदालत में लक्ष्मीबाई का पक्ष रखा लेकिन असफल रहे.

#उसके_बाद —

23 मार्च 1858 को ब्रिटिश फौजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया. 30 मार्च को भारी बमबारी की मदद से अंग्रेज किले की दीवार में सेंध लगाने में सफल हो गये. लेकिन तभी तात्या टोपे 20000 बागियों की फौज लेकर वहां पहुंच गए. तीन अप्रैल तक बागियों ने ब्रिटिश सेना को उलझाए रखा. उसके बाद सेना आखिरकार झांसी में प्रवेश कर ही गयी.

खुद को कमजोर होता देख लक्ष्मीबाई, झांसी की आखिरी उम्मीद दामोदर राव को अपनी पीठ बांध छोटी सैन्य टुकड़ी के साथ झांसी से निकल आईं. भारतीय इतिहास की विशेषज्ञ और अमेरिकी लेखिका पामेला डी टॉलर अपने एक लेख ‘लक्ष्मीबाई : रानी ऑफ झांसी’ में लिखती हैं, ‘अगले 24 घंटे में तकरीबन 93 मील की दूरी तय करने के बाद रानी लक्ष्मी बाई काल्पी पहुंचीं जहां उनकी मुलाकात ब्रिटिश सरकार की आंखों की पहले से किरकिरी बने हुए नाना साहेब पेशवा, राव साहब और तात्या टोपे से हुई. 30 मई को ये सभी बागी ग्वालियर पहुंचे जहां का राजा जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों के समर्थन में था लेकिन उसकी फौज बागियों के साथ हो गई.’

जानकारी मिलते ही 16 जून की रोज़ अंग्रेज फौजें ग्वालियर भी पहुंच गईं. 17 जून की सुबह लक्ष्मीबाई अपनी अंतिम जंग के लिए तैयार हुईं. जन्म की ही तरह लक्ष्मीबाई की मृत्यु भी अलग-अलग मत हैं जिनमें लॉर्ड केनिंग की रिपोर्ट सर्वाधिक विश्वसनीय मानी जाती है. इसके मुताबिक रानी को एक सैनिक ने पीछे से गोली मारी थी. अपना घोड़ा मोड़ते हुए लक्ष्मीबाई ने भी उस सैनिक पर फायर किया लेकिन वह बच गया और उसने अपनी तलवार से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के सर पे वार कर दिया जिसके फलस्वरूप रानी वीरगति प्राप्त हुई .

#ये_कहानी_आप_सभी_ने_सुनी_होगी आज मैं आपको एक अनकही सुनाता हूँ जो अभी तक अनसुनी है —

झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है. रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ? वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुलाकर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी.

अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी. ज्यादातर हिंदुस्तानियों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली. 1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा. महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया. उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी बराबरी से थे.

#आइये_दामोदर_की_कहानी दामोदर की जुबानी सुनते है —

15 नवंबर 1849 को नेवलकर राजपरिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ. ज्योतिषी ने बताया कि मेरी कुंडली में राज योग है और मैं राजा बनूंगा. ये बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई. तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया. गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे.

मां साहेब (महारानी लक्ष्मीबाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहॉजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए. मगर ऐसा नहीं हुआ.
डलहॉजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा. मां साहेब को 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी. इसके साथ ही महाराज की सारी सम्पत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी. मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा. इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे. फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वो पैसा मुझे दे दिया जाएगा.

#मां_साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली. मेरे सेवकों (रामचंद्र राओ देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था. मुझे खुद ये ठीक से याद नहीं. इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे.

नन्हें खान रिसालेदार, गनपत राओ, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राओ देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई. 22 घोड़े और 60 ऊंटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े. हमारे पास खाने, पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था. किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली. मई-जून की गर्मी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे. शुक्र था कि जंगल के फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई.

#असल_दिक्कत_बारिश शुरू होने के साथ शुरू हुई. घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया. किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली. रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे. मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपए, 9 घोड़े और चार ऊंट तय की. हम जिस जगह पर रहे वो किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी.
देखते-देखते दो साल निकल गए. ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपए थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे. मेरी तबियत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा. मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें.

मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया. मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपए दिए और जानवर वापस मांगे. उसने हमें सिर्फ 3 घोड़े वापस दिए. वहां से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए. ग्वालियर के शिप्री में गांव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया. वहां तीन दिन उन्होंने हमें बंद रखा, फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया. मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया. वो एक-एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे.

#हमारे_ज्यादातर लोगों को पागलखाने में डाल दिया गया. मां साहेब के रिसालेदार नन्हें खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की. उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है. रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है. बच्चे से तो सरकार को कोई नुक्सान नहीं. इसे छोड़ दीजिए पूरा मुल्क आपको दुआएं देगा. फ्लिंक एक दयालु आदमी थे, उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की.

वहां से हम अपने विश्वस्तों के साथ इंदौर के कर्नल सर रिचर्ड शेक्सपियर से मिलने निकल गए. हमारे पास अब कोई पैसा बाकी नहीं था. सफर का खर्च और खाने के जुगाड़ के लिए मां साहेब के 32 तोले के दो तोड़े हमें देने पड़े. मां साहेब से जुड़ी वही एक आखिरी चीज हमारे पास थी.

इसके बाद 5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में 10,000 सालाना की पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी. उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली. ब्रिटिश सरकार ने सात लाख रुपए लौटाने से भी इंकार कर दिया. दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया. 1879 में उनके एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ. 1906 में 58 साल की उम्र में दामोदर राव की मौत हो गई. इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में ‘झांसीवाले’ सरनेम के साथ रहते हैं. रानी के एक सौतेला भाई चिंतामनराव तांबे भी था. तांबे परिवार इस समय पूना में रहता है.

#विशेष –
महारानी लक्ष्मीबाई के ऊपर अब फिल्म बन रही है. सतारा में पैदा होने वाली मनु की फिल्म का प्रमोशन कंगना रनौत ने बनारस के मणिकर्णिका से शुरू किया है. बनारस का अपना एक रस है, आज के भारत में मेवाड़, सिंधिया पटियाला और गायकवाड़ जैसे घरानों के किस्सों का एक रस है. जफर, मनु, टात्या टोपे और वाजिद अली शाह जैसों की कहानी का रस उनके गुजर जाने के साथ खत्म हो गया था तो उसमें किसी की कोई दिलचस्पी नहीं है. झांसी की रानी पर बन रही इस फिल्म में कितना सच कितना गल्प होगा पता नहीं पर दामोदर राव की ये कहानी निश्चित रूप से नहीं होगी, सनद रखिएगा.

#चित्र – पोट्रेट महारानी लक्ष्मीबाई ( सोर्स विकिपीडिया)

पोस्ट इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) और
लैंग जॉन की किताब वांडरिंग्स इन इंडिया एंड अदर स्केचेज ऑफ लाइफ इन हिंदुस्तान पर आधारित है और विकिपीडिया से कुछ अंश लिए गए है ।।

– अजेष्ठ त्रिपाठी

Disclaimer : लेखक के निजी ज्ञान पर आधारित लेख का तीसरी जंग से कोई सरोकार नहीं है, लेखक की निजी जानकारी पर आधारित है|