असामान्य मनःस्थितियों को दूर भगाता है राग बागेश्री

असामान्य मनःस्थितियों को दूर भगाता है राग बागेश्री

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(मन्ना डे)

मानव का शरीर प्रकृति की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होते हैं। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ताविकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन कर रहे हैं। श्रृंखला के छठे अंक में आज हम राग बागेश्री के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको ग्वालियर परम्परा की सुविख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वर में राग बागेश्री में निबद्ध एक तराना सुनवाएँगे। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार 1962 में प्रदर्शित फिल्म “प्राइवेट सेक्रेटरी” से इसी राग में पिरोया एक गीत मन्ना डे के स्वर में प्रस्तुत करेंगे।

राग बागेश्री के आरोह के स्वर हैं; सा, ग॒, म, ध, नि॒ सां और अवरोह के स्वर सां, सा, नि॒, ध, म, प, ध, म, ग॒, रे, सा। अभावग्रस्त एवं चिन्ताग्रस्त व्यक्ति की भयानक कष्ट की स्थिति जब सीमा पार कर जाती है तो व्यक्ति हताशा, विषाद और चिन्ताविकृति जैसी असामान्य मानसिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। बीमारी, गरीबी, सामाजिक उपेक्षा एवं संवेदनहीनता ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न करने में सहायक होती हैं। परित्यक्ता या विधवा नारी, उसका विखरा और उजड़ा हुआ जीवन, अनाथ बालक-बालिका की हताशा, विषम सामाजिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न आक्रोश, चिड़चिड़ापन, असामान्य मनःस्थितियाँ आदि के हालात में राग बागेश्री के स्वरों तथा वादी स्वर मध्यम का स्वरात्मक गम्भीर प्रभाव पीड़ित व्यक्ति मर्मस्थल में चोट करते हैं। इन स्वरों के प्रभाव से व्यक्ति को मानसिक शान्ति प्राप्त हो सकती है। राग बागेश्री में श्रेष्ठ कलासाधकों द्वारा प्रस्तुत गायन, सितार, सरोद, इसराज, सारंगी, मयूरवीणा, सुरबहार, विचित्रवीणा वादन की नादात्मक प्रभाव शान्ति और सुखद निद्रा का लाभ प्रदान कर सकते है।

अब हम आपको राग बागेश्री में निबद्ध एक तराना सुनवाते हैं, इसे प्रस्तुत कर रहीं हैं, ग्वालियर परम्परा में देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। मालिनी जी के स्वर में राग बागेश्री में निबद्ध तराना अब आप सुनिए।

विदुषी मालिनी राजुरकर )
राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त है। इस राग को काफी थाट से सम्बद्ध माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ प्रयोक्ता आरोह में पंचम स्वर वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्धति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन आदर्श माना जाता है। इस राग में श्रृंगारपूर्ण रचनाएँ खूब फबतीं हैं।

पाँचवें से आठवें दशक तक हिन्दी और गुजराती फिल्मों के संगीत से जुड़े डी. दिलीप का वास्तविक नाम दिलीप ढोलकिया है। जूनागढ़, गुजरात में 15 अक्तूबर, 1921 में जन्में दिलीप ढोलकिया ने बचपन में ही बाँसुरी और पखावज वादन की शिक्षा प्राप्त की थी। उनके दादा जी पण्डित मणिशंकर ढोलकिया अपने समय के विख्यात कीर्तनकार थे। वे सात वर्ष की आयु से ही जूनागढ़ के स्वामीनारायण मन्दिर में अपने दादा जी के साथ कीर्तन मण्डली में गायन और तबला, पखावज वादन करने लगे थे। दिलीप ढोलकिया के पिता भोगीलाल ढोलकिया कुशल बाँसुरी वादक थे। समृद्ध सांगीतिक परिवेश पाले-बढ़े बालक दिलीप ने बाद में संगीतज्ञ पण्डित पाण्डुरंग अम्बेडकर से विधिवत संगीत सीखा, जो स्वयं विख्यात संगीतज्ञ उस्ताद अमान अली खाँ के शिष्य थे। संगीत से लगाव के कारण उन्होने 1944 में मुम्बई (तब बम्बई) का रुख किया। आरम्भ में दिलीप ढोलकिया ने रेडियो और एच.एम.वी. के लिए गीत गाये। 1944 की फिल्म ‘किस्मतवाला’ में शान्तिकुमार देसाई और रतन लाल के संगीत निर्देशन में और 1946 की फिल्म ‘लाज’ में रामचन्द्र पाल के संगीत निर्देशन में गीत गाये। बाद में संगीतकार चित्रगुप्त के सहायक हो गए और उनके संगीत निर्देशन में बनी फिल्म ‘भक्त पुण्डलीक’ में भी गीत गाये। 1951 में प्रदर्शित गुजराती फिल्म ‘दिवाद्दाण्डी’ में पहली बार पार्श्वगायन किया। 1951 से 1960 के दौरान उनकी पहचान सहायक संगीतकार के रूप में बनी। स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का पहला अवसर उन्हें 1956 में बनी फिल्म ‘बगदाद की रातें’ में मिला। परन्तु इस फिल्म का प्रदर्शन इसके निर्माण के छः वर्ष बाद हुआ। फिल्म में कर्णप्रिय संगीत के बावजूद दिलीप ढोलकिया को तत्काल कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। इस बीच 1960 में तेलुगू फिल्मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता एन.टी. रामाराव अभिनीत फिल्म ‘भक्ति महिमा’ में स्वतंत्र रूप से संगीत निर्देशन का अवसर मिला। उन्होने इस फिल्म में 16 मोहक गीतों की संगीत रचना की थी। 1961 में फिल्म ‘सौगन्ध’ और ‘तीन उस्ताद’ के स्वरबद्ध गीत दिलीप ढोलकिया की प्रतिभा को रेखांकित करने में सफल रहे। 1962 में उनके संगीत से सजी सर्वाधिक उल्लेखनीय फिल्म ‘प्राइवेट सेक्रेटरी’ का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म के गीत अपनी मधुरता और रागों के आधार के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हुए। अशोक कुमार और जयश्री गडकर अभिनीत इस फिल्म के गीतों को मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। आज हमारी चर्चा में इसी फिल्म का एक गीत- ‘जा रे बेईमान तुझे जान लिया…’ है, जिसे दिलीप ढोलकिया ने राग बागेश्री के स्वरों में पिरोया था। प्रेम धवन के गीत को मन्ना डे ने एकताल और दादरा ताल में अपने पूरे कौशल के साथ गाया है। लीजिए, उनके मधुर स्वर में सुनिए, राग बागेश्री पर आधारित यह गीत और मुझे इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।