खुनी और बादी बवासीर के लिए घरेलु उपचार।

खुनी और बादी बवासीर के लिए घरेलु उपचार।

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🍶HAKIM SAIFULLA QASMI🍶:
बवासीर (Piles)

परिचय:-

बवासीर के रोग का इलाज करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि इसके होने का क्या कारण होता है? तथा इसके लक्षण क्या है?
वैसे प्राचीनकाल से ही देखा जाए तो सभ्यता के विकास के साथ-साथ बहुत सारे असाध्य रोग भी पैदा हुए हैं। इनमें से कुछ रोगों का इलाज तो आसान है लेकिन कुछ रोग ऐसे भी हैं जिनका इलाज बहुत मुश्किल से होता है। इन रोगों में से एक रोग बवासीर भी है। इस रोग को हेमोरहोयड्स भी कहते हैं। बवासीर को उर्दू में अर्श कहते हैं। यह रोग 2 प्रकार का होता है।

बवासीर 2 प्रकार की होती हैं। एक भीतरी बवासीर तथा दूसरी बाहरी बवासीर।

भीतरी बवासीर:-

भीतरी बवासीर हमेशा धमनियों और शिराओं के समूह को प्रभावित करती है। फैले हुए रक्त को ले जाने वाली नसें जमा होकर रक्त की मात्रा के आधार पर फैलती हैं तथा सिकुड़ती है। इन भीतरी मस्सों से पीड़ित रोगी वहां खुजली और गर्मी की शिकायत करते हैं। यह बवासीर रोगी को तब होती है जब वह मलत्याग करते समय अधिक जोर लगाता है। बच्चे को जन्म देते समय यदि स्त्री अधिक जोर लगाती है तब भी उसे यह बवासीर हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगी अधिकतर कब्ज से पीड़ित रहते हैं।

भीतरी बवासीर के लक्षण:-

इस बवासीर के कारण मलत्याग करते समय रोगी को बहुत तेज दर्द होता है।
इस बवासीर के कारण मस्सों से खून निकलने लगता है।
बाहरी बवासीर:-

बाहरी बवासीर मलद्वार के बाहरी किनारे पर होती है। इस बवासीर के अनेक आकार होते हैं तथा इस बवासीर के मस्से एक या कई सारे हो सकते हैं। इस बवासीर के मस्सों के गुच्छे भी हो सकते हैं।

बाहरी बवासीर के लक्षण:-

यह बवासीर तब होती है जब मलद्वार के पास की कोई नस फैल जाती है तथा फैलकर फट जाती है। फूली हुई नस के तंतु सूज जाते हैं। नस की कमजोर दीवारों से खून निकलकर जम जाता है तथा कठोर हो जाता है। रोगी को गुदा के पास दबाव और सूजन महसूस होती है

खुनी और बादी बवासीर के लिए घरेलु उपचार।

बवासीर मुख्यत दो प्रकार की होती हैं। खुनी बवासीर और बादी बवासीर। खुनी बवासीर में मस्से सुर्ख होते हैं, और उनसे खून गिरता हैं, जबकि बादी बवासीर में मस्सो में खाज, पीड़ा और सूजन बहुत होती हैं। अतिसार, संग्रहणी और बवासीर-ये तीनो एक दूसरे को पैदा करते हैं। जो लोग बवासीर से बहुत परेशान हैं, वो शौच करने के बाद मलद्वार में ऊँगली डाल कर सफाई करे तो कभी बवासीर नहीं होगी। ये थोड़ा अटपटा लगता हैं, मगर ऐसा करने से आप तारो ताज़ा महसूस करेंगे, और आपको बवासीर की शिकायत नहीं होगी। इसके बाद आप सरसों का तेल भी ऊँगली की सहायता से अंदर लगाये, इसको गणेश किर्या भी कहा जाता हैं।

बवासीर के रोगी को बादी और तले पदार्थ नहीं खाने चाहिए, जिनसे पेट में कब्ज हो। बवासीर के रोगी को चाहिए के वो कब्ज ना रहने दे। इसलिए वो रात को दूध में एक चम्मच गाय का घी या बादाम रोगन डाल कर पिए। और इसके साथ हर सुबह नित्य कर्म से निर्व्रत हो कर 15 मिनट कपाल भाति प्राणायाम ज़रूर करे। भोजन हल्का और सुपाच्य ले।

आइये जाने बवासीर को ख़त्म करने के आयुर्वेदिक सरल उपचार।
केला और कत्था पके केले को बीच में से चीरकर दो टुकड़े कर ले और उस पर कत्था पीसकर, थोड़ा थोड़ा बुरक ले। कत्था बाजार से पिसा पिसाया मिल जाता हैं। इस के बाद केले के उन टुकड़ो को खुली जगह पर आसमान के नीचे रख दे। सुबह होने पर खाली पेट उन टुकड़ो का सेवन करे। एक हफ्ते ये प्रयोग करे, कैसी भी बवासीर हो, नष्ट हो जाती हैं।

तुरई
आधा किलो तुरई को बारीक काटकर २ लीटर पानी में उबाल लिया जाए और छान लिया जाए और प्राप्त पानी में1 बैंगन को पका लें। बैंगन पक जाने के बाद इसे घी में भूनकर गुड़ के साथ खाने से बवासीर में बने दर्द तथा पीड़ा युक्त मस्से झड़ जाते हैं। ये प्रयोग ३ से 5 दिन तक करे। और इस को करने से पहले और बाद में एक घंटे तक कुछ न खाए।

नारियल की जटा
नारियल की जटा लीजिए। उसे माचिस से जला दीजिए। जलकर भस्म बन जाएगी। इस भस्म को शीशी में भर कर ऱख लीजिए। कप डेढ़ कप छाछ या दही के साथ नारियल की जटा से बनी भस्म तीन ग्राम खाली पेट दिन में तीन बार सिर्फ एक ही दिन लेनी है। ध्यान रहे दही या छाछ ताजी हो खट्टी न हो। कैसी और कितनी ही पुरानी पाइल्स की बीमारी क्यों न हो, एक दिन में ही ठीक हो जाती है।

जीरा
जीरे को भूनकर उसमे ज़रूरत अनुसार मिश्री मिलाकर मुंह में डालकर चूसे और बिना भूने जीरे को पानी के साथ पीसकर बवासीर के मस्सो पर लेप करे। इन दोनों उपचारो से बवासीर की पीड़ा में निश्चित शांति मिलती हैं।

नीम्बू
खुनी बवासीर में नीम्बू को बीच में चीरकर उस पर चार ग्राम कत्था पीसकर बुरक दे और use raat में छत पर रख दे। सुबह इनको चूस लीजिये। ये प्रयोग पांच दिन करे। खुनी बवासीर के लिए ये उत्तम प्रयोग हैं।

रीठा और सफ़ेद मूसली
पचास ग्राम रीठे तवे पर रख कर कटोरी से ढक दीजिये और तवे के नीचे आग जल दे। एक घंटे में रीठे जल जाएंगे। ठंडा होने पर रीठो को खरल कर ले या सिल पर बारीक पीस ले। इसके बाद सफ़ेद कत्थे का चूर्ण बीस ग्राम और कुश्ता फौलाद तीन ग्राम ले कर उसमे रीठे का बीस ग्राम भस्म मिला दे। उसे सुबह शाम एक एक ग्राम मक्खन के साथ खाए। ऊपर से गर्म दूध पी ले। दोनों ही प्रकार की बवासीर में दस पंद्रह दिनों में आराम आ जाएगा। गुड, गोश्त, शराब, आम और अंगूर का परहेज करे।

प्याज
प्याज के छोटे छोटे टुकड़े कर के धुप में सुखा ले। सूखे टुकड़ो में से एक तोला प्याज ले कर गाय के घी में तले। बाद में एक माशा तिल और दो तोले मिश्री उसमे मिला कर रोज़ सुबह खाए। ये भी बवासीर का शर्तिया इलाज हैं।

मूली
मूली का नियमित सेवन दोनों बवासीर को ठीक कर देता हैं।

मट्ठा
बवासीर में मट्ठा अमृत सामान हैं। लेकिन बिना सेंधा नमक मिलाये इसको नहीं पीना चाहिए। यदि बवासीर के रोगी को अपच हो तो उसको मट्ठा नियमित नियमपूर्वक पीना चाहिए।

गुड हरड़
गुड के साथ हरड़ खाने से बवासीर का तत्काल नाश होता हैं।

बकरी का दूध।
सुबह सवेरे रोज़ बकरी का दूध पीने से बवासीर का नाश होता हैं।

बवासीर के मस्सो पर लेप।
बवासीर के मस्सो पर लेप करने के लिए निम्नलिखित उपचार अपनाने चाहिए, ताकि शीघ्र ही इस कष्ट से मुक्ति मिले।
हल्दी और कड़वी तोरई का लेप सभी प्रकार के मस्सो के लिए लाभदायक है। ये मस्सो को नष्ट करता हैं।
आक और सहजन के पत्तो का लेप भी मस्सो को नष्ट करता हैं।
नीम और कनेर के पत्तो का लेप मस्सो को खत्म करता हैं।
कड़वा घीया और गुड को कांजी में पीसकर लेप करे। इस से मस्से नष्ट होते हैं।
तम्बाकू के पत्ते महीन पीसकर मस्सो पर लगाने से ये शीघ्र ही नष्ट होते हैं।
नीम और पीपल के पत्तो का लेप करने से मस्से नष्ट होते हैं।
बड़ (बरगद) के पीले पत्ते जलाकर उनकी ६ मासे राख सरसों के तेल में मिलकर लेप करने से बवासीर के मस्से नष्ट होते हैं।
गाय के घी में कुचला घिसकर लेप करने से, बवासीर के घाव ठीक हो जाते हैं।

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مولانا حکیم سیف اللہ طالب قاسمی میرٹھی
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