#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 37

#इस्लाम और मानवाधिकार : पार्ट 37

Posted by

सुरक्षा इंसान की एक मौलिक आवश्यकता है और उसकी पूर्ति सरकारों की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है और यह बहुत ही स्पष्ट बात है।

कोई भी विचारधारा या कानूनी व्यवस्था यह नहीं कह सकती कि सुरक्षा के संबंध में उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है क्योंकि सुरक्षा न केवल मानवीय समाज की एक आधारभूत आवश्यकता है बल्कि वह स्वयं सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास का महत्वपूर्ण कारण है। सुरक्षा व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और न्यायिक आदि समस्त क्षेत्रों में व्यक्ति और समाज की महत्वपूर्ण ज़रूरत है जिसे उत्पन्न और विस्तृत करने के लिए समाज के लोगों और सरकारों को समस्त संभावनाओं व क्षमताओं का प्रयोग करना चाहिये।

इस्लाम की दृष्टि में सरकार गठन का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य समाज में सुरक्षा स्थापित करना है। शासकों की ज़िम्मेदारी है कि वे हर उस अतिक्रमण का मुकाबला करें जो समाज की सुरक्षा खत्म होने का कारण बनता हो। हज़रत अली अलैहिस्सलाम शांति व सुरक्षा उत्पन्न किये जाने को बहुत ज़रूरी समझते हैं और उनका मानना है कि इसके लिए सरकार का अस्तित्व ज़रुरी है चाहे वह अत्याचारी ही क्यों न हो।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” निःसंदेह लोगों को शासक की आवश्यकता है चाहे वे अच्छे हों या बुरे ताकि मोमिन सरकार की छत्रछाया में अपने कार्यों को अंजाम दें और काफिर भी उससे लाभान्वित हों, लोग सरकार के अधीन रहें और शासक के माध्यम से राजधन को एकत्रित किया जाता है और उसकी सहायता से दुश्मनों से मुकाबला किया जा सकता है, रास्ते सुरक्षित हो जाते हैं और शक्ति शाली लोगों से कमज़ोरों के अधिकार लिये जाते हैं। भले लोग आराम में और बुरे लोगों से सुरक्षा में होते हैं।“

सुरक्षा यानी लोग आश्वस्त हों और जो लोग समाज में रहते हैं उन्हें अपनी जान, प्रतिष्ठा और भौतिक व आध्यात्मिक अधिकारों को लेकर चिंता न हो। इसके लिए दो चीज़ें ज़रूरी हैं। पहला यह कि लोग इस बात से संतुष्ट हों कि उनके माल को ज़ब्त नहीं किया जायेगा, उन्हें जेल में नहीं डाला जायेगा और इसी प्रकार वे इस बात से संतुष्ट हों कि वे सरकार के दूसरे ग़ैर कानूनी दंडों से सुरक्षित रहेंगे और दूसरे वे इस बात से संतुष्ट हों कि समाज में जो चीज़ प्रचलित है यानी समाज में उनका जो अधिकार है उसका समाज का हर व्यक्ति ध्यान रखेगा। इस प्रकार सुरक्षा के संबंध में कुछ ज़िम्मेदारी लोगों की और कुछ ज़िम्मेदारी सरकारों की बनती है। इसका अर्थ यह है कि लोगों को चाहिये कि वे एक दूसरे के भौतिक और आध्यात्मिक अधिकारों का सम्मान करें। सरकार की भी ज़िम्मेदारी है। सबसे पहले वह कानून बनाकर और न्यायिक विभागों की स्थापना करके लोगों के लिए सुरक्षा उत्पन्न करे ताकि लोग निश्चिंत होकर जीवन करें और दूसरे वह स्वयं भी इन कानूनों का पालन करते हुए लोगों के अधिकारों और आज़ादी का सम्मान करे और मनमाने ढंग से उनकी अवहेलना न करे। सुरक्षा का यह अर्थ इंसान के जीवन का मौलिक अधिकार है और इस अर्थ को दुनिया के हर कोने में देखा व समझा जा सकता है। जैसाकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र, यूरोपीय मानवाधिकार कंवेन्शन और दूसरे अंतरराष्ट्रीय समझौतों व घोषणापत्रों में सुरक्षा के इसी अर्थ पर बल दिया गया और उसकी पुष्टि की गयी है।

इंसान के जीवन के दो पहलु हैं एक भौतिक और दूसरा आध्यात्मिक। इंसान के भौतिक जीवन का संबंध उसके शरीर के अंगों से है जबकि आध्यात्मिक जीवन का संबंध इंसान की सोच- विचार से है और व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर इसका दाएरा बहुत विस्तृत है। इस प्रकार से कि जीवन का यही पहलु उसे जानवरों से भिन्न बनाता है। इंसान का व्यक्तित्व वास्तव में उसके आध्यात्मिक जीवन में ही प्रतिबिंबित होता है और आध्यात्मिक जीवन ही इंसान के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है और इंसान की जो प्रतिष्ठा, भरोसा और छवि है उसका स्रोत आध्यात्मिक जीवन है यानी लोगों का आध्यात्मिक जीवन सामाजिक जीवन में प्रतिबिंबित होता है।

स्वस्थ सामाजिक संबंध में सिद्धांतिक रूप से लोगों का मान-सम्मान और प्रतिष्ठा सुरक्षित होती है और इस संबंध में कोई चिंता नहीं होती है। चिंता उस समय आरंभ होती है जब समाज में कुछ नकारात्मक मूल्य बढ़ने लगते हैं और उसके परिणाम में लोगों की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचता है। लोगों की प्रतिष्ठा की सुरक्षा के लिए समाज के वैचारिक नेताओं की बड़ी ज़िम्मेदारी है। जैसाकि सरकार की भी ज़िम्मेदारी है कि कानून बनाकर और न्यायिक तंत्रों का गठन करके वह समाज में लोगों की प्रतिष्ठा की रक्षा करे। यहां हम कुछ उन चीज़ों का उल्लेख कर रहे हैं जिनसे समाज और समाज के लोगों की प्रतिष्ठा ख़तरे में पड़ जाती है।

गाली-गलौज एक एसी चीज़ बुरी चीज़ है जो हमेशा समाज में रही है और उसका एक कारण समाज में दूसरों को अपमानित करके अपनी प्रतिष्ठा को ऊंचा करना होता है और अपने प्रतिस्पर्धी या सामने वाले पक्ष को नीचा दिखाकर पद व स्थान प्राप्त करना होता है। इस्लाम में गाली- गलौज से मना किया गया है यहां तक कि पवित्र कुरआन में अनेकेश्वरवादियों को भी बुरा- भला कहने से भी मना किया गया है क्योंकि अगर एसा किया गया तो वे अज्ञानता के कारण ईश्वर को बुरा भला कहेंगे।

गाली- गलौज समाज में न केवल अच्छी बात नहीं है बल्कि समाचार पत्रों के माध्यम से जो लोग एक दूसरे को गाली देते और बुरा भला कहते हैं यह कार्य एक तुच्छ संस्कृति का सूचक है और इस कार्य का इस्लामी संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है और इसे दोष समझा जाता है।

दूसरों को अपमानित करना भी एक एसी चीज़ है जिससे लोगों की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचता है। इस्लाम के अनुसार इस कार्य का अर्थ नैतिक मूल्यों की अनदेखी और उनकी उपेक्षा है। जैसाकि इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” जो कोई मेरे किसी दोस्त का अपमान करे मानो वह मेरे साथ युद्ध के लिए तैयार हो गया है।“

इस्लाम में दूसरों को अपमानित करने से मना किया गया है। अच्छी प्रसिद्धि समाज में आध्यात्मिक पूंजी होती है और उसकी वजह से लोग प्रतिष्ठित ढंग से जीवन गुज़ार सकते हैं। खेद के साथ कहना पड़ता है कि अस्वस्थ सामाजिक संबंध में जो लोग नैतिक दृष्टि से कमज़ोर होते हैं वे दूसरों पर आरोप लगाकर, दूसरों के रहस्यों का पर्दाफाश कर लोगों की इज़्ज़त से खिलवाड़ करते हैं। नैतिक दृष्टि से यह निंदनीय कार्य है।

आरोप का अर्थ किसी पर उस बुरे कार्य को अंजाम देने का आरोप लगाना जिसे उसने अंजाम ही नहीं दिया है। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से रवायत है जिसमें आप फरमाते हैं” जैसे ही मोमिन अपने भाई पर आरोप लगाता है ईमान उसके दिल से एसे निकल जाता है जैसे पानी में नमक घुल जाता है।“

दूसरों के कमज़ोर बिन्दुओं का रहस्योदघाटन उन चीजों में से है जिसका प्रयोग दूसरों की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने के लिए किया जाता है। इस्लाम इस प्रकार की आदत को बिल्कुल पसंद नहीं करता है। पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” जो कोई बुरे कार्य का पर्दाफाश करे वह एसा ही है जैसे उसने स्वयं इस कार्य को अंजाम दिया है।“

जान की सुरक्षा भी एक सुरक्षा है। इंसान का सबसे प्राथमिक अधिकार ज़िन्दा रहने का अधिकार है। जीने का अधिकार महान ईश्वर की ओर से प्रदान किया गया एक प्राकृतिक अधिकार है और उसकी अनदेखी व उपेक्षा अप्रिय कार्य है। पवित्र कुरआन लोगों की जानों को बहुत महत्व देता है और एक इंसान की हत्या को समस्त इंसानों की हत्या और एक इंसान की जान बचाने को समस्त इंसानों की जान बचाना कहता है। पवित्र कुरआन के अनुसार किसी इंसान की हत्या ईश्वरीय क्रोध और नरक का कारण है हां केवल उन स्थानों पर इंसान की हत्या को वैध माना गया है जहां समाज की सुरक्षा का मामला हो और उसने किसी व्यक्ति की हत्या की हो।

जानी सुरक्षा के अलावा भौतिक सुरक्षा भी इंसान का अधिकार है और उस पर इस्लाम ने बल दिया है। माल, आवास और कार्य आदि इंसान के जीवन की अपरिहार्य आवश्यकता है। इन अधिकारों का सम्मान समाज की ज़िम्मेदारी है जबकि उन्हें निश्चित बनाना सरकार का दायित्व है।

स्वामित्व के अधिकार पर पवित्र कुरआन में बल दिया गया है और लोग व्यापार आदि के माध्यम से उसका लेन- देन कर सकते हैं। मानवाधिकार के अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र के 17 वें अनुच्छेद के अनुसार भी हर व्यक्ति को किसी चीज़ का मालिक बनने का अधिकार है और किसी को मनमाने ढंग से इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार इस्लामी मानवाधिकार घोषणापत्र के 15वें अनुच्छेद के अनुसार हर इंसान धार्मिक दृष्टि से मालिक होने का अधिकार रखता है और वह इस प्रकार से मालिक होने के अधिकार से लाभ उठा सकता है जिससे न स्वयं को और न समाज और न दूसरों को नुकसान पहुंचे और किसी से मालिक होने के अधिकार को छीना नहीं जा सकता किन्तु जहां सार्वजनिक हित खतरे में पड़ जायें या तुरंतु हर्जाना देना पड़े और सामने वाला पक्ष तुरंत हर्जाना न दे तो उसके स्वामित्व को छीना जा सकता है यानी कानून के बिना किसी के माल को ज़ब्त कर लेना सही नहीं है।

रोज़गार की सुरक्षा भी एक सुरक्षा है। ज़िन्दगी की ज़रुरतों को पूरा करने के लिए संतोषजनक रोज़गार होना चाहिये और यह इंसान की ज़िन्दगी के लिए ज़रुरी है। अच्छे व उचित रोजगार का होना और उसके बाक़ी रहने को रोज़गार की सुरक्षा का नाम दिया जा सकता है। असंतुलित आर्थिक संबंध और काम करने वालों को नुकसान पहुंचने की स्थिति में एसा कार्य किया जाना चाहिये जिससे उनके काम को कोई क्षति न पहुंचे।

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अच्छी व न्यायपूर्ण परिस्थिति में काम करने का अधिकार और बेरोज़गारी के मुकाबले में काम करने वालों के समर्थन पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणापत्र और आर्थिक,सामाजिक और सांस्कृतिक अंतरराष्ट्रीय समझौतों व घोषणापत्रों में इस बात पर ध्यान दिया गया है। इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से रोज़गार की सुरक्षा के लिए एसे बहुत से कानून बनाये गये हैं जिनसे काफी सीमा तक रोज़गारों को सुरक्षा प्रदान किया गया है। जैसे किसी तार्किक कारण के बिना किसी को उसके रोज़गार से निकालना मना है, काम से निकाल देने से जो नुकसान पहुंचा है उसे अदा करने की ज़रुरत, बेकारी भत्ता और शिकायत करने का अधिकार। जो देश राष्ट्रसंघ के सदस्य हैं उनका आह्वान इन चीज़ों पर अमल करने के लिए किया गया है।