उस दुनिया तक हमारी पहुंच ही नहीं है…राफ़ेल चोर, 20 लाख की मशरूम की एक प्लेट कैसा होता है….

उस दुनिया तक हमारी पहुंच ही नहीं है…राफ़ेल चोर, 20 लाख की मशरूम की एक प्लेट कैसा होता है….

Posted by


Satyendra PS
=============
कुछ लोग कहते हैं कि भारत के जर्नलिस्ट्स क्यों नहीं #राफेलचोर की खबर ब्रेक कर पाते हैं? ब्रेक करना तो दूर, उसमें कुछ नया क्यों नहीं निकाल पाते हैं?

दरअसल भारत में कई दुनिया बसती है। इसी दुनिया में मेरे जैसे लोग भी हैं जिन्हें आज भी किसी फाइव स्टार होटल में घुसने में डर लगता है। किसी प्रोग्राम में गए तो लॉबी में बक्का टाइप मुंह उठाकर ताकते मुझसे 4 गुना ज्यादा वेतन पाने वाला कर्मचारी आकर पूछता है, “मे आई हेल्प यू सर?”

यह शब्द कान में पड़ते ही मैं पानी पानी हो जाता हूं। यही फीलिंग आती है कि आज फिर होटल कर्मियों ने पकड़ लिया कि एक उजबक, ऊदबिलाव, होटल में उस दुनिया तक हमारी पहुंच ही नहीं है मालिक। हम कैसे कल्पना कर सकते हैं कि राफेल चोर काजू की रोटी क्या होती है और 20 लाख रुपये की मशरूम की एक प्लेट सब्जी का स्वाद कैसा होता है?घुस गया है। अचकचाया सा कभी हिंदी में, कभी अंग्रेजी में उससे पूछता हूँ, “या, आई एम लुकिंग फ़ॉर दिस प्रोग्राम।”

कर्मचारी समझ जाता है कि ये बेचारा यहां फंस गया है। नार्थ के होटल में हैं तो बन्दा हिंदी में बता देता है कि इस लिफ्ट से 7वें फ्लोर पर जाएं, निकलने के बाद बाएं मुड़कर सीधे जाएं। वहीं हॉल में आपको जाना है। दक्षिण में वो अंग्रेजी में यही बात समझा देता है।

हमें तो सिर्फ फाइव स्टार होटल पता है। उसके बाद सेवन, नाइन स्टार होटल आ गए, मोटल नामकरण हो गया। हमें यह भी नही पता कि नाम बदला तो इसमें क्या क्या सुविधाएं बढ़ी हैं? कभी किसी मित्र के साथ नाइट पार्टी में चले गए तो ऐसी फीलिंग आती है कि स्वर्ग यही है और शास्त्रों में अप्सराएं, देवी देवता यहीं आने वाले लोगों को कहा गया है जो रमण कर रहे हैं। यहां के इंडोर तालाब में नंगे नहाते हैं!

उस दुनिया तक हमारी पहुंच ही नहीं है मालिक। हम कैसे कल्पना कर सकते हैं कि राफेल चोर काजू की रोटी क्या होती है और 20 लाख रुपये की मशरूम की एक प्लेट सब्जी का स्वाद कैसा होता है?

हम कैसे कल्पना कर सकते है कि सरकार का कथित सिविल सर्वेंट हमसे सीधे मुंह बात करेगा जो हमें धमका देता है, कि जाओ पहले पढ़ो लिखो, फिर आना। हम कैसे कल्पना कर सकते हैं कि जयंती नटराजन प्रेस कांफ्रेंस में हिंदी में सवाल पूछने वाले पत्रकार को उंगली चमकाते और व्यंग भरी मुस्कान छोड़ते खड़े होने का इशारा करते पूछती हैं,”फ्रॉम व्हिच न्यूजपेपर?”, वो खबर बताएंगी!

हम दलित पिछड़ों की अलग दुनिया है साहेब, जिसके पास सम्मान लेने जाने के लिए किराया नहीं होता और Yashwant Singh भाई जैसे लोग अगर सम्मान देना चाहते हैं तो आधे सम्मान प्राप्तकर्ता पहुंच पाने की हालत में नहीं होते। हमारे बॉस रह चुके लोग या तो जातिवादी दलाल रह चुके होते हैं जो सरकारी फ्लैटों में थोड़ा बहुत ऐशो आराम का जूठन पाकर खुश रहते हैं और नैतिक मूल्यों के क्षरण और अभी की गिरावट पर भाषण पेलते हैं या ईमानदार होने पर यूं ही गुमनामी में चले जाते हैं।

(यशवन्त भाई के दर्द और उनके प्रोग्राम के बाद की एक छोटी सी टिप्पणी)