#विवेक तिवारी_मीडिया का दवाब न पड़ता तो पुलिस हत्यारे ‘प्रशांत’ को बचा लेती, बेशर्म पुलिस प्रशासन ने तैय्यार कर ली थी स्क्रिप्ट!

#विवेक तिवारी_मीडिया का दवाब न पड़ता तो पुलिस हत्यारे ‘प्रशांत’ को बचा लेती, बेशर्म पुलिस प्रशासन ने तैय्यार कर ली थी स्क्रिप्ट!

Posted by

28 सितंबर की रात करीब 1.30 बजे यूपी पुलिस के सिपाही प्रशांत चौधरी ने एपल के एरिया सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी की गोली मारकर हत्या कर दी। सदमे से विवेक की पत्नी व मासूम बेटी समेत पूरा परिवार गम और गुस्से में डूबा था, लेकिन लखनऊ पुलिस अफसर इतने बेशर्म कि दोषी सिपाहियों पर कार्रवाई के बजाय बचाव की स्क्रिप्ट लिखते रहे।

विवेक तिवारी को मौत के घाट उतार उसके परिवार को उजाड़ने वाले प्रशांत को जानने वाले लोग पीके डॉन के नाम से जानते है। प्रशांत चौधरी खुद को सच्चा जाट बताता है और फेसबुक पर भी अपनी प्रोफाइल में पीके, द रॉयल जाट लिखता है। वह बुलंदशहर का रहने वाला है। वह 2015 में पुलिस में भर्ती हुआ था और इसने बुलंदशहर की ही रहने वाली राखी मलिक से शादी की थी। दोनों की तैनाती गोमतीनगर थाने में ही थी।

प्रशांत के बारे में पहले भी ऐसी खबर सामने आई थी कि वह और इसका साथी संदीप हर रात करीब 11 से 12 के बीच हाथ में टॉर्च लेकर निकलते थे और जो भी मिलता था उससे वसूली किया करते थे। अगर कोई लड़का-लड़की साथ जाते हुए मिल जाए तो उनको ये जरूर रोका करते थे। इसके बाद ये उन्हें धमकाते और वसूली करके के छोड़ दिया करते थे। उस रात भी ये दोनों वसूली के इरादे के साथ विवेक तिवारी और उसकी सहकर्मी को रोकने की कोशिश की थी।

गोमतीनगर के स्थानीय लोगों की माने तो प्रशांत न सिर्फ आम लोगों को परेशान किया करता था बल्कि शहीद पथ से गुरजने वाले ट्रकों को रोक कर उनसे भी वसूली किया करता था। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि वसूली का पैसा सिर्फ इसके या फिर साथी संदीप के बीच में ही नहीं बंटता होगा बल्कि इनके ऊपर बैठे अधिकारियों तक भी पहुंचता होगा।

प्रशांत की फेसबुक प्रोफाइल देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह खुद को फिल्म सिंघम का अजय देवगन समझने लगा था। न सिर्फ प्रशांत ने सिंघम की तरह की मूंछ बल्कि वर्दी भी अजय देवगन की तरह पहनता था। यहां तक की कई लोग उसे सिंघम भी बोलने लगे थे। हाई प्रोफाइल मामला होने की वजह से और मीडिया के दबाव की वजह से पुलिस ने प्रशांत को भले ही गिरफ्तार कर लिया। लेकिन पुलिस प्रशासन पर दवाब न पड़ता तो प्रशांत ने खुद पर गाड़ी चढ़ाने की एफआईआर दर्ज करवा ली होती और वो जेल में नहीं, बल्कि थाने में ड्यूटी कर रहा होता।

एपल के एरिया सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी के खून से सनी खाकी के दाग छिपाने को राजधानी पुलिस ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दीं। सदमे से विवेक की पत्नी व मासूम बेटी समेत पूरा परिवार गम और गुस्से में डूबा रहा, लेकिन अफसर इतने बेशर्म कि दोषी सिपाहियों पर कार्रवाई के बजाय बचाव की स्क्रिप्ट लिखते रहे। चरित्र हनन से लेकर आत्मरक्षा में गोली चलाने तक की कहानियां गढ़ डालीं। ये सब आला अफसरों की मौजूदगी में होता रहा। आखिरकार लोगों के आक्रोश के बाद सरकार सख्त हुई तो आला अफसरों को मजबूरी में सिपाहियों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी।


एपल के एरिया सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी के खून से सनी खाकी के दाग छिपाने को राजधानी पुलिस ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दीं। सदमे से विवेक की पत्नी व मासूम बेटी समेत पूरा परिवार गम और गुस्से में डूबा रहा, लेकिन अफसर इतने बेशर्म कि दोषी सिपाहियों पर कार्रवाई के बजाय बचाव की स्क्रिप्ट लिखते रहे। चरित्र हनन से लेकर आत्मरक्षा में गोली चलाने तक की कहानियां गढ़ डालीं। ये सब आला अफसरों की मौजूदगी में होता रहा। आखिरकार लोगों के आक्रोश के बाद सरकार सख्त हुई तो आला अफसरों को मजबूरी में सिपाहियों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी।

गम और आक्रोश में डूबी विवेक की पत्नी कल्पना का कहना है कि घटनास्थल पहुंचते ही वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कलानिधि नैथानी समेत सभी पुलिस अफसर लीपापोती में जुट गए। उन्होंने पति के हत्या के आरोपी सिपाहियों को बचाने की कोशिश शुरू कर दी। आधी रात को मौके पर कोई भी नहीं था, इसलिए पुलिस के पास झूठ को सच और सच को झूठ बनाने का पूरा वक्त था। खून से लथपथ विवेक को अस्पताल पहुंचाने के बाद अधिकारी घटनास्थल पहुंचे और पुलिसकर्मियों को हत्या के आरोप व महकमे को फजीहत से बचाने के दांव-पेंच आजमाने शुरू किए। सबसे पहले विवेक की हत्या को हादसे का रूप देने की कोशिश की गई, क्यों?

कल्पना ने बताया कि एसएसपी ने कहा था कि उनके पास परिवारीजनों से संपर्क करने के लिए कोई नंबर या जरिया नहीं था, इसलिए कार के नंबर के आधार पर जानकारी लेकर परिवार से संपर्क किया गया। कल्पना ने इस बात को सरासर झूठ है। विवेक का आईफोन उनकी कार में ही था। वह लगातार उन्हें कॉल कर रही थीं। पुलिस ने कॉल क्यों नहीं रिसीव किया। कार में मौजूद विवेक की पूर्व सहकर्मी भी पूरे परिवार को अच्छी तरह से जानती थी। पुलिस ने उससे मोबाइल नंबर लेकर भी परिवारीजनों से संपर्क करने की जरूरत नहीं समझी? साफ है कि पुलिस पूरा मामला रफा-दफा करने में जुटी थी। कल्पना का आरोप है कि दो घंटे तक पुलिस अधिकारी सिर्फ साजिश रचते रहे। पौने चार बजे के आसपास किसी ने कॉल रिसीव की और बताया कि विवेक का एक्सीडेंट हो गया है और वह लोहिया अस्पताल में हैं।

एफआईआर को लेकर भी पत्नी ने सवाल उठाए। पत्नी का कहना है कि दोपहर दो बजे तक परिवार के सदस्यों को यह पता ही नहीं था कि हत्या की एफआईआर भी दर्ज कराई जा चुकी है। पुलिस आखिर ये बात क्यों छिपाती रही। हमें पता चला है मनमाफिक तहरीर लिखवाई पुलिस ने। एफआईआर दर्ज के लिए तहरीर बोल-बोलकर लिखाई गई। इसमें विवेक को सीधे गोली मारने का जिक्र ही नहीं कराया। उन्होंने महिला सहकर्मी से लिखवाया कि वह विवेक तिवारी के साथ सीएमएस गोमतीनगर विस्तार के पास गाड़ी में बैठी थी, तभी सामने से दो पुलिसवाले आ गए। हमने उनसे बचकर निकलने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने हमे रोकने की कोशिश की। उसके बाद अचानक से मुझे ऐसा लगा कि गोली चली। हमने वहां से गाड़ी आगे बढ़ाई। आगे हमारी गाड़ी अंडरपास की दीवार से टकराई और विवेक के सिर से काफी खून बहने लगा। मैंने सबसे मदद लेने की कोशिश की। थोड़ी देर में पुलिस आई, जिसने हमें हॉस्पिटल पहुंचाया।

निढाल कल्पना ने मीडियाकर्मियों से हाथ जोड़कर कहा कि मेरे पति का कोई दोष नहीं था। पुलिस ने किसलिए उन्हें गोली मार दी। बगल में बैठी बेटी शिवी को देखकर वह फूट पड़ीं। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, अब इन बच्चों को कैसे पालूंगी। बर्बाद कर दिया सब कुछ। बच्चे लेकर कहां जाऊं मैं? मुझे इंसाफ दिलाइए… एक बेकुसूर आदमी मारा गया है। रात डेढ़ बजे उनको कॉल की तो बताया था आधे घंटे में घर आ रहा हूं। आधे घंटे बीते तो फिर से कॉल की। रोते हुए…किसी ने कॉल नहीं रिसीव हुई। कुछ-कुछ देर बाद फोन करती रही। ‘मुझे क्या पता था कि पति की पुलिसवालों ने गोली मारकर हत्या कर दी है।’ बस आंखों से आंसू…. पौने चार बजे लोहिया अस्पताल के किसी कर्मचारी ने कॉल रिसीव की। बताया गया हादसा हुआ है।