सऊदी अरब पर जल्द होगा अमेरिकी हमला, क्या सऊदी अरब, ईरान से मदद मांग सकता है?

सऊदी अरब पर जल्द होगा अमेरिकी हमला, क्या सऊदी अरब, ईरान से मदद मांग सकता है?

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सऊदी नरेश के खिलाफ ट्रम्प केअपमानजनक बयान पर प्रसिद्ध पत्रकार अब्दुलबारी अतवान का आंख खोलने वाला लेख पढ़ें…

सौ बुराइयां सही मगर एक अच्छाई तो है ट्रम्प में, वह कभी कोई राज़ छुपाते नहीं… खास कर अगर यह राज़ उनके सऊदी अरब और अरब घटकों के बारे में हो। वह अपने इन निकट घटकों का मज़ाक़ उड़ाने और उन पर आरोप लगाने में तनिक संकोच नहीं करते और इन अरब नेताओं का जम कर मज़ाक़ उड़ाते हैं जिसकी मिसाल दुनिया के किसी भी देश के राष्ट्रध्यक्ष के बारे में नज़र नहीं आती।

वर्जीनिया राज्य में अपने समर्थकों के मध्य भाषण के दौरान ट्रम्प ने सारी रेड लाइनें पार कर दीं। उन्होंने कहा कि ” मैं सऊदी अरब से प्रेम करता हूं , आज ही सुबह मैंने किंग सलमान से टेलीफोन पर बात की है, और उनसे कहा है कि आप के पास खरबों डालर हैं, लेकिन ईश्वर की जाने सैनिक हमले के समय आप के देश का क्या हाल होगा… मैंने उनसे कहा कि राजा साहेब! शायद आप अपना विमान भी न बचा पाएं … लेकिन हमारे साथ आप सुरक्षित हैं, मगर हमें उसके बदले में वह नहीं मिलता जो हमारा हक़ है।”

‎ट्रम्प सऊदी अरब को दुधारू गाय कह चुके हैं।
हक़ीक़त यह है कि अगर सच में ट्रम्प को सऊदी अरब से प्रेम है तो फिर वह इतने घृणित रूप में क्यों सऊदी अरब के साथ व्यवहार कर रहे हैं? क्यों इस तरह से आलोचनीय रूप में सऊदी अरब के रहस्यों से पर्दा उठा रहे हैं, क्यों इस तरह से सऊदी अरब का मज़ाक उड़ाते और उसे धमकी देते हैं? अगर वह सऊदी अरब से नफरत करते तो क्या करते? हमें यक़ीन है कि ट्रम्प सऊदी अरब से प्रेम नहीं करते , उनसे सऊदी अरब की दौलत सहन नहीं हो रही है, उन्हें लगता है कि सऊदी अरब का यह अधिकार नहीं है , यह अरबों और मुसलमानों से उनकी नस्ली घृणा का परिणाम है।

इस पूरी घटना में ट्रम्प की ओर से घृणित रूप से ब्लैकमेलिंग की ही बात नहीं है बल्कि वह बात भी महत्वपूर्ण है जिसे ट्रम्प कई बार दोहरा चुके हैं, यानि यह कि सऊदी अरब पर हमला होगा और केवल अमरीका की सऊदी अरब को बचा सकता है।

हमें यह नहीं मालूम हो सका है कि वह हमला जिसकी राष्ट्रपति ट्रम्प बात कर रहे हैं, कौन करेगा? ट्रम्प के अंदाज़ से तो यह लग रहा है कि जैसा सऊदी अरब पर हमला निश्चित ही नहीं बल्कि निकट भी है, तो क्या राष्ट्रपति ट्रम्प ईरान की ओर संकेत करना चाह रहे हैं? और अगर ईरान हमला करेगा तो वह हमला, सैन्य कार्यवाही का आरंभ होगा या फिर तेहरान में सत्ता बदलने के प्रयास के तहत अगले महीने से लगाए जाने वाले कड़े प्रतिबंधों के बाद अमरीका व इस्राईल के अतिक्रमण की जवाबी कार्यवाही होगा?

अमरीकी बल्कि पश्चिम के नेता, युद्ध के बारे में इतना खुल कर बात नहीं करते सिवाए यह कि उसकी तैयारी पूरी हो चुकी हो, बल्कि दिन तारीख भी निर्धारित हो चुका है क्योंकि वह लोग अरबों की तरह युद्ध और नीति का फैसला, प्रतिक्रिया के रूप में नहीं करते बल्कि वह सब कुछ योजना के तहत करते हैं जैसा कि इराक़ पर हमले का फैसला, युद्ध के आरंभ के पांच साल पहले ही किया जा चुका था, लीबिया में नेटो द्वारा सत्ता परिवर्तन की योजना आठ साल पहले बनायी जा चुकी थी और सीरिया में हालात खराब करने और युद्ध में ढकेलने की योजना संकट आरंभ के कम से कम तीन साल पहले तैयार हो चुकी थी।

ईरान से डरा डरा कर ट्रम्प अरबों को खूब लूटते हैं।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने मई 2016 में सऊदी अरब की यात्रा के दौरान 500 अरब डालर की ” वसूली ” की थी लेकिन लगता है कि उन्हें इस से कई गुना अधिक की उम्मीद थी इसी लिए उन्होंने यह कहा है कि सऊदी अरब के खरबों डालर हैं। वह पहले भी अपने भाषणों में कहते रहे हैं कि अमरीका को सऊदी अरब और अन्य तेल से समृद्ध अरब देशों को, अमरीका का ” हिस्सा” देना चाहिए क्योंकि अगर अमरीका की मदद न होती तो वह एक हफ्ते भी सत्ता में न रह पाते और उन्हें साइकिल पर इधर उधर जाना होता।

हमें यह नहीं लगता कि अमरीकी राष्ट्रपति की ओर से सऊदी अरब या इन अरब देशों के अपमान का क्रम इसी सीमा पर भी रुकेगा बल्कि हमें तो आशंका है कि इसमें अपमान की मात्रा बढ़ती जाएगी क्योंकि उन्हें रोकने और जवाब देने वाला तो कोई है नहीं! उनके साथ जैसे को तैसा वाला रवैया अपनाया जाना चाहिए। चीन और युरोप ने उन्हें वैसा ही जवाब दिया, युरोप ईरानी तेल की अदायगी के लिए नया रास्ता खोज रहा है , पाकिस्तान ने भी उन्हें ठोस जवाब दिया हालांकि इसकी वजह उसे अरबों डालर का नुक़सान उठाना पड़ा।

अब्दुलबारी अतवान अरब जगत में पत्रकारिता में एक बड़ा नाम हैं।

हमें अच्छी तरह से मालूम है कि सऊदी अरब चीन नहीं है, न ही उसके पास युरोपीय संघ जैसी शक्ति है लेकिन अमरीका की ओर से अपमान और ब्लैकमेलिंग का यह क्रम बढ़ता ही जाएगा इस लिए उसे रोकना ज़रूरी है।

अगर यह अपमान और ब्लैकमेलिंग, ईरान की वजह से है तो फिर सऊदी अरब को ईरान और उसके मोर्चे से बात चीत का रास्ता खोजना चाहिए जैसा कि ट्रम्प ने उत्तरी कोरिया के साथ किया है और अतीत में ओबामा सरकार ने ईरान के साथ।

क्या सऊदी अरब के पास कोई प्लान बी है? क्या वह ट्रम्प पर अंकुश लगाएगा ? जैसा कि तुर्की ने किया ? उम्मीद तो यही है, ओमान , सऊदी अरब की इच्छा पर इस प्रकार की गुप्त वार्ता के लिए मध्यस्थ के रूप में बहुत अच्छा रोल अदा कर सकता है।

( साभार, रायुल यौम, लंदन)