#ईश्वरीय वाणी पार्ट 41: सूरे अन्कबूत : : पवित्र क़ुरआन अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है!

#ईश्वरीय वाणी पार्ट 41: सूरे अन्कबूत : : पवित्र क़ुरआन अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है!

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सूरे अन्कबूत पवित्र क़ुरआन का 29वां सूरा है।

अन्कबूत सूरे में 69 आयतें हैं और यह सूरा पवित्र नगर मक्का में उतरा। इस सूरे की आयत नंबर 41 में अनेकेश्वरवाद के आधार को अन्कबूत के घर से उपमा दी गयी है जो बहुत कमज़ोर होता है। इसलिए इस सूरे को अन्कबूत कहा गया है। इस सूरे में ईश्वर पर आस्था, मनुष्य के लिए ईश्वर की ओर से तय किए गए कर्तव्य, ईश्वर की ओर से परीक्षा, कुछ ईश्वरीय दूतों के हालात तथ ईश्वर के इलावा दूसरों पर भरोसे के नुक़सान का उल्लेख किया गया है।

अलिफ़ लाम मीम! क्या लोग यह सोचते हैं कि सिर्फ़ यह कह देने से कि ईश्वर पर ईमान रखते हैं, छोड़ दिया जाएगा और उनका इम्तेहान नहीं लिया जाएगा।

अन्कबूत सूरे की शुरु की आयतें ईश्वर की ओर से इम्तेहान लिए जाने और उन लोगों की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए है जो ईश्वर पर सच्ची आस्था रखते हैं और जो सच्ची आस्था नहीं रखते। ये आयतें इंसान की ज़िन्दगी के सबसे अहम विषय ईश्वर की ओर से इम्तेहान का उल्लेख करते हुए कहती हैं, “क्या लोग यह ख़्याल करते है कि सिर्फ़ यह कह देने से कि ईश्वर पर और ईश्वरीय दूत पर आस्था रखते हैं, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा और उनका इम्तेहान नहीं लिया जाएगा।”

इम्तेहान एक अटल ईश्वरीय परंपरा है। पहले वाली जातियों के भी इम्तेहान लिए गए। अलबत्ता इस इम्तेहान का मक़सद यह नहीं है कि ईश्वर अपने बंदे की आस्था को परखने के लिए इम्तेहान लेता है। अन्कबूत सूरे की ग्यारहवीं आयत में साफ़ तौर पर यह कहा गया है कि ईश्वर उन लोगों को पहचानता है जो उस पर आस्था रखते हैं और उनकों भी पहचानता है जो उस पर आस्था नहीं रखते। इन इम्तेहानों का अस्ली लक्ष्य इंसान की सलाहियतों को उभारना है। इन इम्तेहानों के दौरान इंसान ख़ुद को बेहतर ढंग से पहचानता है और इस बात को परखता है कि वह ईश्वर पर आस्था के प्रति कितना पाबंद है। मुसीबत, तकलीफ़, अप्रिय हादसे, जंग, सूखा, महंगाई, बेलगाम हुकूमतें और इच्छाएं ये सबके सब इंसान के इम्तेमान के साधन हैं और इन कठिनाइयों में लोगों की आस्था स्पष्ट होती है। दूसरे शब्दों में ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव में इन्सान की मुख्य सलाहियत उभर कर सामने आती है। अलबत्ता कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिनमें ईश्वर पर आस्था सिर्फ़ ज़बानी होती है, उनके मन में ईश्वर पर सच्ची आस्था नहीं होती। मोमिन लोगों का व्यक्तित्व ठोस होता है जबकि मिथ्याचारी व पाखंडी लोगों का व्यक्तित्व अस्थिर होता है और वे अवसरवादी होते हैं। वे मोमिनों की सफलता के वक़्त ख़ुद को उसका सहभागी बताते हैं ताकि उनकी सफलताओं से लाभ उठाएं। पवित्र क़ुरआन ऐसे लोगों की विशेषता के बारे में कहता है, “लोगों में कुछ ऐसे हैं जो कहते हैं कि ईश्वर पर ईमान लाए हैं। तो जब ईश्वर के मार्ग में तकलीफ़ उठाते हैं तो उसे ईश्वर का प्रकोप समझते हैं। और जब आपके ईश्वर की ओर से मदद पहुंचती है और कामयाबी मिलती है तो कहते हैं कि हम भी आपके साथ थे। क्या जो कुछ लोगों के मन में है ईश्वर उसे बेहतर ढंग से नहीं जानता?”

कुछ लोग मक्का में ईश्वर पर आस्था लाकर मुसलमान हो गए। जब इन लोगों की माओं को पता चला तो उन्होंने खाना-पानी छोड़ने का फ़ैसला किया ताकि अपने इस क़दम से बच्चों को इस्लाम से दूर कर दें। अलबत्ता इनमें से कोई एक भी मां अपने फ़ैसले पर क़ायम नहीं रह सकी। इस संबंध में अन्कबूत सूरे की आठवीं आयत उतरी और इसमें अनेकेश्वरवादी मां बाप सहित ईश्वर पर आस्था रखने वाले मां बाप के साथ व्यवहार के बारे में बताया गया। यह आयत मूल सिद्धांत के रूप में कहती है, “हमने इंसान से अनुशंसा की है कि अपने मां बाप के साथ भलाई करे।” इन्सान को हर हालत में मां-बाप के अधिकार को समझना चाहिए और पूरी उम्र उनका सम्मान करना चाहिए। इस्लाम में मां बाप का सबसे ज़्यादा सम्मान करने पर बल दिया गया है। मां बाप का सम्मान ईश्वर की ओर से बहुत बड़ा इम्तेहान है। क्योंकि जब वे बूढ़े हो जाते हैं तो उनकी देख भाल थोड़ा मुश्किल काम लगता है। ऐसी हालत में बच्चों को मां बाप का सम्मान करने पर आधारित ईश्वर के हुक्म पर अमल करना चाहिए और पूरी विनम्रता के साथ मां बाप का सम्मान और उनकी देख भाल करनी चाहिए।

इसके साथ इस बात को भी स्पष्ट किया गया है कि किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि मां-बाप के साथ भावनात्मक संबंध ईश्वर और बन्दे के बीच संबंध पर भारी है। अन्कबूत सूरे की आठवीं आयत के एक हिस्से में ईश्वर इस बात को साफ़ शब्दों में स्पष्ट कर रहा है, “अगर वे दोनों किसी ऐसी चीज़ को मेरा शरीक बनाने पर बल दें कि जिसके बारे में तुम्हें ज्ञान नहीं है तो उनकी इस बात का आज्ञापालन मत करना।” इस आयत के अनुसार, अगर मां बाप अनेकेश्वरवादी हों और अपने बच्चों को अनेकेश्वरवाद के पालन के लिए कहें तो उनकी यह बात नहीं माननी चाहिए। लेकिन इसके बावजूद मां बाप के साथ हमेशा भलाई करनी चाहिए और उनके साथ विनम्र व्यवहार करना चाहिए।

अन्कबूत सूरे की कुछ आयतों में ईश्वरीय दूतों और पहले वाली जातियों के लिए गए कठिन इम्तेहान का उल्लेख किया गया है। इन आयतों में ईश्वरीय दूत हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के लिए गए इम्तेहान का पहले उल्लेख किया गया है। इन आयतों का अर्थ यह है, “हमने नूह को उनकी जाति की ओर भेजा। वह दिन रात एकेश्वरवाद की ओर बुलाते रहे। 950 साल तक लोगों को ईश्वर की ओर बुलाया और इस काम से वह नहीं उकताए। इसके बावजूद बहुत थोड़े से लोग ईश्वर पर ईमान लाए।” उसके बाद एक अन्य बड़े ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम की कहानी यूं बयान करती है, “उस वक़्त को याद करो जब इब्राहीम ने अपनी जाति से कहा कि एक ईश्वर की पूजा करो और अनेकेश्वारवाद से दूर रहे कि इसमें तुम्हारे लिए भलाई है अगर तुम समझ सको।” हज़रत इब्राहीम ने अपनी जाति को याद दिलाया कि जिन मूर्तियों को तुम पूजते हो उनमें संकल्प लेने की सलालियत नहीं। वे बुद्धि नहीं रखतीं। वे तुम्हारी रोज़ी की मालिक नहीं हैं। सिर्फ़ अनन्य ईश्वर ने तुम्हें पैदा किया है। तो रोज़ी सिर्फ़ उसी से मांगो। किन्तु हज़रत इब्राहीम की जाति ने यह जवाब दिया कि उन्हें मार डालो या जला दो। लेकिन ईश्वर ने इब्राहीम को आग में जलने से बचा लिया।

अन्कबूत सूरे की बाद की आयतें हज़रत इब्राहीम के समकालीन ईश्वरीय दूत हज़रत लूत के हालात के एक भाग को बयान करती हैं। लूत की जाति वाले समलैंगिक तथा दूसरी नैतिक बुराइयों में डूबे हुए थे। ईश्वर ने हज़रत लूत को लोगों को बुराइयों से दूर रखने के लिए उनका सही मार्गदर्शन करने की ज़िम्मेदारी दी। इस संबंध में पवित्र क़ुरआन अन्कबूत सूरे की आयत नंबर 28 और 29 में कहता है, “ याद कीजिए जब लूत ने अपनी जाति से कहा, तुम ऐसा बुरा कर्म कर रहे हो जैसा तुमसे पहले किसी जाति के लोगों ने नहीं किया। तुम मर्दों के पीछे जाते हो और प्राकृतिक यौन संबंध नहीं अपनाते। अपनी सभाओं में बुरे कर्म करते हो। तो उनकी जाति का यह जवाब था, “अगर सच कहते हो तो ईश्वर का प्रकोप ले आओ।” जब हज़रत लूत की बात किसी ने न सुनी तो उन्होंने ईश्वर को दुख भरे मन से पुकार कर कहा, हे पालनहार! इन बुरे लोगों के मुक़ाबले में मेरी मदद कर। हज़रत लूत की जाति सार्वजनिक सभाओं में समलैंगिकता का प्रदर्शन करती थह और कोई चीज़ उन्हें इस बुराई से न रोक सकी। आख़िर में हज़रत लूत की दुआ को ईश्वर ने क़ुबूल किया। कुछ फ़रिश्तों को ईश्वर ने प्रकोप के लिए नियुक्त किया जो सुंदर जवानों की शक्ल में हज़रत लूत के पास पहुंचे। हज़रत लूत उन्हें न पहचान सके और उन्हें देख कर दुखी हुए क्योंकि उस बुरे माहौल में ऐसे मेहमान का आना ख़ुद उसके लिए ख़तरनाक था। जब मेहमान के रूप में मौजूद फ़रिश्ते हज़रत लूत के दुख को समझ गए तो उन्होंने अपना परिचय कराते हुए कहा, “उन्होंने कहा, घबराओ नहीं। हम तुम्हें और तुम्हारे परिवार के सदस्यों को मुक्ति दिलाएंगे सिवाए तुम्हारी बीवी के जो जाति के लोगों के बीच रह जाएगी। हम इस इलाक़े के लोगों पर उनके पापों के कारण आसमान से प्रकोप भेजेंगे।” (अन्कबूत सूरा आयत नंबर 33 और 34) बाद की आयत उस दुराचारी जाति के अंजाम का उल्लेख करती है, “हमने जिस इलाक़े पर प्रकोप भेजा उसे उन लोगों के लिए पाठ लेने की निशानी के तौर पर बाक़ी रखा जो लोग सोच विचार करते हैं।”

हज़रत लूत और उनकी जाति के हालात के बाद अन्कबूत सूरे की बाद की आयतों में ईश्वरीय दूत हज़रत शुऐब की जाति, आद, समूद और फ़िरऔन की जातियों का उल्लेख करती है कि उनमें से हर एक पर ईश्वर ने प्रकोप भेजा। इसका मुख्य कारण यूं बयान किया है, “शैतान ने उनके कर्म को उनके सामने अच्छा दर्शाया और उन्हें ईश्वर के मार्ग पर बढ़ने से रोक दिया। फ़िरऔन, क़ारून और हामान में से हर एक शैतानी ताक़तों के स्पष्ट नमूने थे किन्तु उनमें से कोई एक भी ईश्वर के प्रकोप को न रोक सका।”

अन्कबूत सूरे की 40वीं आयत इस बात पर बल देती है कि इन सब जातियों ने अपने बुरे कर्म का बदला भुगता। जैसा कि अन्कबूत सूरे की आयत नंबर चालीस में ईश्वर कह रहा है, “ईश्वर ने उन पर अत्याचार नहीं किया बल्कि वे ख़ुद पर अत्याचार करते थे।