देशभक्त बादशाहों के वंशज मुसीबत में : ग़द्दारों के हुकूमत में

देशभक्त बादशाहों के वंशज मुसीबत में : ग़द्दारों के हुकूमत में

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वाया – Arham Zuberi
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देशभक्त बादशाहों के वंशज :
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यह आज का भारत है, गद्दारों का भारत, यहाँ गद्दारी का इतिहास लिए लोग “वंदेमातरम” और “भारत माता की जय” बोलकर देशभक्त हो जाते हैं और दूसरों को देशभक्ति का प्रमाणपत्र बाँटते हैं, जिसे चाहें पाकिस्तान भेजने का फरमान सुना देते हैं क्युँकि यह आज का भारत है गद्दारों का भारत।

आज के ही भारत में अग्रेजों के सामने नतमस्तक हो गये राजा रजवाड़ों के परिवार आज भी राजा बना हुआ है और कोई आज भी दशहरे में 6 क्विंटल के सोने के बने हाथी के हौदे में बैठकर अपने राज्य में दशहरे का जुलूस निकलता है तो कोई अपने महल को 5 स्टार होटल बनाकर मोटी कमाई कर रहा है तो कोई आज भी पूरे खानदान समेत सत्ता की मलाई चाट रहा है।

आज इस गद्दारों वाले भारत में ऐसे ही गद्दारों और अंग्रेजों के सामने नतमस्तक हो गये लोगों के महलों को लोग टिकट खरीद कर देखने जाते हैं और देश के लिए मर मिटे बादशाहों की औलादें उस टिकट के मूल्य ₹100-50 की भी मोहताज हैं।

आपको आज ऐसी ही कुछ देशभक्त बादशाहों की औलादों से मिलवाते हैं जिनके दादा परदादा मुगल बादशाहों ने अँग्रेजों से हाथ ना मिला कर गलती की और उस गलती की सजा आज उनकी औलादें भुगत रहीं हैं।

पहली कड़ी में हैं
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सुल्ताना बेगम नवाब (अंतिम वारिस बहादुर शाह जफ़र ) :-

मुगल सल्‍तनत के आखिरी वारिस और पूरे भारत के राजा रजवाड़ों और बादशाहों द्वारा अपना शहंशाह मान लिए गये बहादुर शाह जफर को जब अँग्रेजों के खिलाफ 1857 के गदर में पराजय दिखी तो वह अपनी पत्नी ज़ीनत महल के साथ हुमायूं के मकबरे में शरण ली।

लेकिन मेजर हडस ने उन्हें और उनकी पत्नी ज़ीनत महल उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया , बाद में उनके सभी बेटे पकड़े गये और कत्ल कर दिए गये जिनका सर बहादुरशाह ज़फर के सामने खाने की थाली में परोसा गया। तब ज़फर ने कहा

“हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं”

फिर बहादुर शाह ज़फर को उनकी पत्नी ज़ीनत महल को कैद में ही रंगून(वर्मा) भेज दिया गया, यहीं बहादुरशाह ज़फर और उनकी पत्नी ज़ीनत महल की नज़बंदी के दौरान एक औलाद प्राप्त हुई मिर्ज़ा”बेदार बख्त”।

1862 में बहादुर शाह ज़फर और 1877 में उनकी बेग़म ज़ीनत महल की रंगून में ही मृत्यु के बाद मिर्ज़ा बेदार बख्त के “नाना प्यारे मिर्जा” उनको लेकर रंगून से हिन्दुस्तान आ गए और उनकी परवरिश छुपते-छुपाते हुई।

8 साल के बाद उनके नाना प्यारे मिर्ज़ा का भी इंतेकाल हो गया। 1947 के बाद जब देश आजाद हुआ तो बेदार बख्त सामने आए और तब तक उनकी शादी नादिर जहां बेगम से हो चुकी थी। मुगलिया सल्तनत का वारिस होने के नाते उन्हें सरकार की ओर से सन् 1960 से उनको 250 रुपये प्रतिमाह पेंशन दी जाने लगी।

यह बेदार बख्त ही सुल्ताना बेगम के ससुर थे जिनके पति थे मिर्ज़ा बख्त और उनकी भी मृत्यु 1980 में हो गयी थी।

बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर में एक दो कमरे की झोपड़ी भी है जिसमें देश के लिए अपनी औलादों का कटा सर देखने वाले और कैद में ही मर जाने वाले बहादुरशाह ज़फर के पौत्र वधु और उनकी औलादें आज अपना जीवन जीने के लिए चाय पकौड़े बेच रही हैं।

मौजूदा समय में बहादुरशाह ज़फर के पौत्र की पत्‍नी सुल्‍ताना बेगम कोलकता के दो कमरों के छोटे से घर में जिंदगी गुजार रही हैं। और सरकार बहादुरशाह ज़फर और उनकी औलादों की शहादत के एवज़ में इनको ₹200/= प्रतिदिन या करीब ₹6000 मासिक देती है।

इससे उनके परिवार का खर्च पूरा नही हो पाता तो यह परिवार का खर्च चलाने के लिए वह चाय की दुकान चलाती हैं, पकौड़े तलती हैं और महिलाओं के कपड़े बेचती हैं।

कोलकाता स्थित एक झुग्गी-झोपड़ी में गरीबी की जिंदगी जी रहीं हिंदुस्तान के आखिरी मुगल बादशाह ”बहादुर शाह जफर” की पौत्र वधू सुल्ताना बेगम किसी तरह बहादुर शाह जफर की मिट्टी को रंगून से भारत लाना चाहती हैं और बहादुर शाह ज़फर की आखिरी ख्वाहिश पूरी करना चाहती हैं पर सरकारों को बहादुर शाह की इस आखिरी ख्वाहिश से कोई मतलब नहीं कि

कितना है बदनसीब ‘ज़फर’ दफ्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥

इन दोगली सरकारों का बहादुर शाह ज़फर के प्रति यह दोगलापन ही है कि अंग्रेजों के दलालों की तस्वीर संसद में लगाई जा रही है , उनके नाम से स्टेशन और स्टेडियम का नाम रखा जा रहा है और एक देशभक्त “बहादुर शाह ज़फर” की दिल्ली के महरौली स्थित “ज़फर महल” में खाली कब्र शहंशाह की मिट्टी का इंतजार कर रही है।

शहंशाही गैरत देखिए कि इसके बावजूद सुल्ताना बेगम का कहना है कि इसके लिए वह किसी नेता के पास हाथ फैलाने नहीं जाएंगी। भारत सरकार को खुद चाहिए कि शहंशाह की मिट्टी को देश लेकर आए।

शहंशाह बहादुर शाह ज़फर के खून का असर देखिए कि सुल्ताना बेगम के पति के इंतकाल के बाद वर्ष 1981 में पेरिस का एक परिवार उन्हें अपने वतन ले जाने के लिए आया था, लेकिन उन्होंने वतन से मुहब्बत की वजह से उस बुरे वक्त में भी हिंदुस्तान को ही चुना।

इसके पहले उनको पाकिस्तान से भी बुलाया आया, लेकिन उन्होंने उसे भी ठुकरा दिया जबकि तब उनके पति स्वर्गीय प्रिंस मिर्जा मोहम्मद मिर्जा बख्त बहादुर को वर्ष 1980 तक महज 400 रुपये पेंशन मिलती थी।

सोचिए कि कितने बेगैरत हैं हम और हमारी सरकारें ?

इसीलिए कहता हूँ कि मुगलों ने गलती की, उनको भी योगी और मोदी बन जाना था, उनको भी वाडियार, सिंधिया, राजा जयसिंह और उम्मेद सिंह बन जाना था, सावरकर और अटल बिहारी बाजपेयी बन जाना था।

बेवकूफ कहीं के , देशभक्ती की कीमत यहाँ है ही कितनी ?

₹200/= प्रति दिन , दिहाड़ी मज़दूरी से भी कम।

• क्रमशः

■ ज़ाहिद भाई की वाल से

 

Disclaimer : लेखक के निजी विचार हैं, लेखक के विचारों से तीसरी जंग का सहमत होना आवश्यक नहीं है, लेख से तीसरी जंग का कोई सरोकार नहीं है|