अगर किसी तरह का व्यवधान न हो तो सार्वजनिक स्थान पर नमाज़ जायज़ है

अगर किसी तरह का व्यवधान न हो तो सार्वजनिक स्थान पर नमाज़ जायज़ है

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Mohd Sharif

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अल्लाह सुबहाना व तआला पवित्र क़ुरआन की 51 वीं सूरह की 56 वीं आयत में फ़रमाता है, “मैंने जिन्न और इंसानों को इसके सिवा किसी काम के लिए पैदा नहीं किया कि वह मेरी इबादत करें।”
इबादत हुकुम मानने को कहते हैं जिसमें नमाज़ आदि दूसरी इबादतें भी शामिल होती हैं। नमाज़ के लिए ख़ास तौर से जो जगह मुक़र्रर की जाती है उसको मस्जिद कहते हैं और इस तरह पूरी दुनिया में मस्जिदें तामीर की गई हैं लेकिन इसके बावजूद भी जहां मस्जिद नहीं होती हैं वहां किसी ख़ाली जगह पर अक्सर लोग जुमे की नमाज़ पढ़ लेते हैं क्योंकि जुमे की नमाज़ बिना जमाअत के अदा नहीं हो सकती और उसका जो महत्त्व है उसको पवित्र क़ुरआन की 62 वीं सूरह की 9 वीं आयत में इस तरह फ़रमाया गया है, “ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, जब पुकारा जाए नमाज़ के लिए जुमे के दिन तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ दौड़ो और ख़रीद व फ़रोख़्त छोड़ दो, यह तुम्हारे लिए ज़्यादा बेहतर है अगर तुम जानो। फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए तो ज़मीन में फैल जाओ और अल्लाह का फ़ज़्ल तलाश करो।”
इस तरह जुमे की अज़ान होने पर सारे काम छोड़ कर मस्जिद में जाकर नमाज़ अदा करने और नमाज़ ख़त्म होने के बाद फिर रोज़ी तलाश करने अर्थात अपने काम धन्धे करने का नियम बना दिया गया है।
जहां मस्जिद नही हैं या इतनी दूर हैं जहां किसी कम्पनी में काम करने वाले कर्मचारियों को आने जाने में ज्यादा वक़्त लगता है तो कम्पनी के काम में हर्जा होने से बचने के लिए वह लोग वहीं आस पास किसी पार्क आदि ऐसे सार्वजनिक स्थल में जुमे की नमाज़ का अदा कर लेते हैं जहां किसी तरह का किसी को व्यवधान न होता हो। नोएडा में विभिन्न कम्पनियों के कर्मचारी इसी तरह इकट्ठे होकर पार्क में जुमे की नमाज़ अदा करते आ रहे थे कि 21 दिसम्बर के जुमे में प्रशासन द्वारा नमाज़ पढ़ने से रोक दिया गया जिससे सरकार की मुसलमानों के प्रति दुश्मनी साबित हो गई। यह घटना मौजूदा मुख्यमन्त्री की मानसिकता के अनुकूल है क्योंकि मुख्यमन्त्री बनने से पहले इस शख़्स ने बयान दिया था कि यदि हमको अनुमति मिली तो हम देश की मस्जिदों में गौरी और गणेश की मूर्तियां रखवा देंगे।
इस नाजायज़ कार्रवाई की मायावती और दूसरी पार्टियों के नेताओं ने ज़ोरदार शब्दों में निन्दा की और यहां तक कह कि जब दूसरे धर्म के आयोजन पार्कों में होते हैं तो नमाज़ पर ऐतराज़ इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है। मुस्लिम समाज की बात करें तो उसमें ऐसे लोग मौजूद हैं जो आलिम कहलाते हैं लेकिन इस्लाम के ख़िलाफ़ बयान देकर हमेशा मुस्लिम हितों को नुक़सान पहुंचाने के मौक़े की तलाश में रहते हैं। इसी तरह के मौलाना आलम रज़ा खां नूरी नाम के एक शख़्स जिसको अख़बार ने कानपुर का शहर क़ाज़ी लिखा है, ने नोएडा में नमाज़ से रोके जाने के सम्बन्ध में बयान दिया है कि जुमे की नमाज़ क़ायम करनी हो तो क़ाज़ी-ए-शरा, मुफ़्ती से इजाज़त लेनी चाहिए इसके समर्थन में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ऑफ़ इण्डिया के महासचिव किन्ही डॉ मुईन अहमद का कहना है कि यह सब मुसलमानों का शरीयत से बे ख़बर होने का नतीजा है।
इसके लिए यह देखना जरूरी है कि शरीयत क्या कहती है?
इसके मुतअल्लिक़ अल्लाह तआला पवित्र क़ुरआन की 72 वीं सूरह की 18 वीं आयत में इस तरह फ़रमाता है, अनुवाद, “और यह कि मस्जिदें अल्लाह के लिए हैं लिहाज़ा उनमें अल्लाह के साथ किसी और को न पुकारो।”
इस आयत के तअल्लुक़ से हज़रत हसन बसरी र अ फ़रमाते हैं कि ज़मीन पूरी की पूरी इबादतगाह है और इस आयत का मंशा यह है कि ख़ुदा की ज़मीन पर कहीं भी शिर्क न किया जाए। इसकी दलील में इस हदीस को बयान करना ही काफ़ी है जिसमें अल्लाह के रसूल स अ व फ़रमाते हैं कि, “मेरे लिए पूरी ज़मीन इबादत की जगह और तहारत हासिल करने के लिए बनाई गई है।”
इस हदीस की रोशनी में बात करें तो पूरी ज़मीन मस्जिद अर्थात नमाज़ पढ़ने की जगह है। चूंकि किसी की ज़मीन पर उसकी इजाज़त के बिना नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती इसलिए किसी की निजी सम्पत्ति में नमाज़ पढ़ने के लिए इजाज़त लेनी चाहिए लेकिन बाक़ी ज़मीन जो सरकारी कहलाती है वह यदि ख़ाली है और उसमें किसी को दिक़्क़त नहीं हो रही है तो किसी से भी इजाज़त की ज़रूरत नहीं है और न ही जुमा क़ायम करने के लिए किसी आलिम की इजाज़त की ज़रूरत है।