और_इस_तरह_#ख़िलाफ़त_उस्मानियाँ_खत्म_हुई,…तो…पढ़िए #इस्लामी शान की दास्ताँ

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 #इस्लामी शान की दास्ताँ

फ्रांस में एक स्टेज शो के दौरान नबी का मज़ाक उड़ाया, इसकी खबर तुर्की पहुंची तो…पढ़िए इस्लामी शान की दास्ताँ

खिलाफत उस्मानिया के 34वें खलीफा अब्दुल हमीद सानी थे। उन्होंने 31 अगस्त 1876 से 27 अप्रैल 1909 तक खिलाफत उस्मानिया की बागडोर संभाली। 21 सितंबर 1842 को तुर्की के शहर इस्तांबुल में पैदा हुए। आपने 75 वर्ष की उम्र में 10 फरवरी 1918 को वफात पाई। आप एक आला तालीम याफ्ता पाए के शायर भी थे। उस्मानी खलीफा अब्दुल हमीद सानी का नाम तारीख ए इस्लाम में निहायत ही सुनहरे हरूफ़ में लिखा है। खलीफा अब्दुल हमीद सानी खिलाफत उस्मानिया के उन खलीफाओं में शुमार किए जाते हैं जो आलम है इस्लाम में अपने किरदार और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मोहब्बत की वजह से अपना अलग मुकाम रखते हैं। आप वसी रक़्बे पर फैली हुई सल्तनत उस्मानिया के हुक्मरान रहे। खिलाफत उस्मानिया की सरहदें यूरोप से मिलती थी। और सियासी कशमकश और जंगी महाज़ों का भी सिलसिला जारी रहा।

खलीफा अब्दुल हमीद सानी एक दिन अपने वजीरों और हुकूमत के ओहदेदारों के दरमियान में मौजूद थे। कि अचानक एक हुकूमती ओहदे दार ने आपको आकर एक ऐसी खबर सुनाई कि आपका रंग गुस्से से सुख हो गया। और निहायत जलाल में आकर खड़े हो गए। हुकूमती ओहदे दार के हाथों में फ्रांस का अखबार मौजूद था। जिसमें एक खबर छपी थी कि फ्रांस के एक थिएटर में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी का ड्रामा पेश किया जाएगा। और इस सिलसिले में अखबारों में खबरें छपवाई गई थी। अखबार के टुकड़े को लेकर खलीफा अब्दुल हमीद सानी को बताया गया कि यह शख्स ने एक ड्रामा लिखा है।
जिसे थिएटर में पेश किया जाएगा उस ड्रामे में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का किरदार भी है। और वह किरदार थिएटर में एक आदमी अदा करेगा।

The Tomb of Sultan Abdulhamid II located at Divanyolu Caddesi in Istanbul. Sultan Abdülhamid II was the 34th sultan of the Ottoman Empire and reigned between 1876 and 1909 

खलीफा ने हुकूमती ओहदेदार से फ्रांस के अखबार का पेज लेकर ऊंची आवाज में पढ़ना शुरु कर दिया। निहायत जलाल और गुस्से की हालत में सुल्तान का जिस्म कांप रहा था। जबकि आपका चेहरा लाल हो चुका था। आप वहां मौजूद हुकूमत के ओहदेदारों को मुखातिब करके अखबार में इश्तिहार से मुताल्लिक बता रहे थे कि फ्रांस के इस अखबार में इश्तिहार छपा है कि एक शख्स ने एक ड्रामा लिखा है उसमें हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का किरदार भी बनाया है यह ड्रामा आज रात पेरिस के थिएटर में चलेगा। उस ड्रामे में हमारे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखियां है वह फख्र ए कौनैन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखियां करेंगे।
अगर वह मेरे बारे में बकवास करते तो मुझे कोई गम नहीं होता। लेकिन अगर वह मेरे दीन और मेरे रसूल की शान में गुस्ताखी करें तो मैं जीते जी मर जाऊं। मैं तलवार उठा लूंगा। यहां तक कि अपनी जान उन पर फ़िदा कर दूंगा। चाहे मेरी गर्दन कट जाए या मेरे जिस्म के टुकड़े टुकड़े हो जाएं। ताकि कल बरोज कयामत रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने शर्मिंदगी ना हो। मैं उन्हें बर्बाद कर दूंगा। यह बर्बाद हो जाएंगे राख हो जाएंगे। यह आग और तबाही हर जलील इंसान दुश्मन के लिए निशाने इबरत होगी। हम जंग करेंगे। उनकी तरह बेगैरत नहीं हो सकते। और यह भी मुमकिन नहीं कि हम अपने दिफ़ा से पीछे हट जाएं।

हम उनसे जंग करेंगे। खलीफा निहायत जलाल में बाआवाज बुलंद गुस्ताख ए रसूल के खिलाफ जंग का ऐलान कर रहे थे। इसी बीच में सुल्तान ने फ्रांसीसी सफीर को तलब करने के अहकामात जारी कर दिए। कुछ ही देर में खलीफा दरबार में रिवायती लिबास फाखराना जो शायद फ्रांसीसी सफीर पर हैबत डालने के लिए जेबतन किया था। निहायत जलाल और बेचैनी की हालत में बजाए बैठने के उसके सामने खड़े थे। और फ्रांसीसी सफ़ीर उनके सामने हाजिर था।

सुल्तान की हालत से उसे अंदाजा हो रहा था कि उसे बिलावजह तलब नहीं किया गया है। उसके माथे पर पसीना आ चुका था। जबकि जिस्म पर कपकपी तारी थी। और टांगे सुल्तान के खौफ से कांप रही थी। सुल्तान ने फ्रांसीसी सफ़ीर को मुखातिब किया। सफ़ीर साहब हम मुसलमान हैं, अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बहुत ज्यादा मोहब्बत करते हैं। इसी वजह से उनसे मोहब्बत करने वाले पर अपनी जान को कुर्बान करते हैं। और मुझे भी कोई तरद्दुद नहीं कि मैं भी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर जान कुर्बान करता हूं।

Map of Ottoman Empire in 1914

हमने सुना है कि आपने एक थिएटर ड्रामा बनाया है। जो नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तौहीन पर मुसतमिल है। यह कहकर खलीफा ने फ्रांसीसी सफ़ीर की तरफ कदम बढ़ाया बढ़ाना शुरू किया। खलीफा कहते जा रहे थे मैं बादशाह हूं मलकान का, इराक का ,शाम का, लेबनान का, हज्जाज का, काफकाज़ का, एजेंसी का और दारुलहुकूमत का मैं खलीफतुल इस्लाम अब्दुल हमीद खान हूं।

यहां तक कि खलीफा फ्रांसीसी सफ़ीर के करीब पहुंच गए। और फासला निहायत कम हो गया। फ्रांसीसी सफीर के जिस्म पर लरजा तारी था। वह खलीफा के जलाल के सामने बहुत मुश्किल से खड़ा था। खलीफा ने फ्रांसीसी सफ़ीर की आंखों में आंखें डालकर निहायत शफाकाना लहजे में उससे कहा कि अगर तुमने इस ड्रामे को ना रोका तो मैं तुम्हारी दुनिया तबाह कर दूंगा। यह कहकर खलीफा अब्दुल हमीद सानी ने ड्रामे के इश्तिहार वाला अखबार फ्रांसीसी सफीर को दिया। और निहायत तेजी से दरबार से निकल गए।

फ्रांसीसी सफीर ने उस अखबार को उठाया, फौरी तौर पर डगमगाता हुआ दरबार से खलीफा के जाने के बाद दीवारों और फर्नीचर का सहारा लेते हुए बाहर निकला। और सीधा सफारतखाने पहुंचा और एक निहायत तेज़रफ्तार पैगाम अपनी हुकूमत को भेज दिया। कहा अगर यूरोप को अपनी आंखों से जलता हुआ नहीं देखना चाहते और फ्रांस की फसीलो पर इस्लामी परचम नहीं देखना चाहते, तो फौरी तौर पर गुस्ताखाना ड्रामे को रोक दो।

उस्मानी लश्कर हुक्म के इंतेजार में खड़े हैं उनके जहाज बंदरगाह पर हुक्म के इंतजार में हैं। और पैदल फौज और तोपखाने छावनियों से निकल चुका है। खलीफा अब्दुल हमीद सानी फ्रांसीसी सफ़ीर को दरबार में तलब करने और जंग का ऐलान करने के बाद चुप नहीं रहे। उन्होंने फौरी तौर पर अपने मुशीर खास को अपने दफ्तर में तलब कर लिया। और उसे फौरी तौर पर पूरी खिलाफत में एक सर्कूलर जारी करने का हुक्म दिया। यह सर्कुलर खलीफा ने खुद अपनी ज़बानी लिखवाया जो कुछ ऐसा था। फ्रांसीसियों की इस्लाम के खिलाफ कार्रवाइयां हद से आगे बढ़ चुकी है। हम फिर भी पास अदब रखे हुए हैं। लेकिन अब हमारे सब्र का पैमाना लबरेज़ हो चुका है। अब हम खिलाफत का परचम बुलंद करने जा रहे हैं। और फ्रांसीसीयों से एक फैसला कुंन जंग करने जा रहे हैं।

यह हुक्म है खलीफतूल अर्द जलालतूल मलिक अब्दुल हमीद खान का, अब हम उनसे उनकी जबान में बात करेंगे। मुशीर खुसूसी खलीफा अब्दुल हमीद के लहजे में तलवार की काट साफ महसूस कर रहा था। उसकी रीड की हड्डी में एक सनसनी की लहर दौड़ गई। खलीफा अब्दुल हमीद की फ्रांसीसी सफीर की दरबार में तलबी और जंग हुक्मनामा के साथ फौजों को तैयार रहने के अहकाम ने ही इस्लाम दुश्मनों पर खौफ तारी कर दिया। पूरी दुनिया मुंतज़िर थी कि अब क्या होगा? यूरोप कांप उठा फ्रांस ने घुटने टेक दिए।

खलीफा अपने खास कमरे में मौजूद थे। जहां वह हुकूमत के कामकाज से मुतल्लिक और फैसले लिया करते थे। अचानक एक हुकूमत का ओहदेदार हंसता हुआ कमरे में बगैर इजाजत ही दाखिल हुआ। और बोला जनाब एक खुशखबरी है। खलीफा वह क्या है ? हुजूर फ्रांसीसियों ने उस ड्रामे को ही नहीं रोका बल्कि उस थेयटर को हमेशा के लिए बंद कर दिया है। जिसने नबी ए करीम सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम की शान में गुस्ताखी का इरादा किया था।

Upgrading the Army

खलीफा अब्दुल हमीद हुकूमत के ओहदेदार की बात करने के दौरान ही नमनाक हो चुके थे। आप की जबान से फर्त जज्बात से सिर्फ अलहमदुलिल्ला ही निकल सका।

हुकूमती ओहदेदार ने खलीफा को बताया कि पूरे आलम ए इस्लाम से उनके लिए शुक्रिया के पैगाम आ रहे हैं।

इंग्लिशतान लीवर पोल के एक इस्लामी तंजीम ने उस ड्रामे के रोके जाने की खबर दी है। गैर मुस्लिम भी सड़कों पर निकल आए कि हम मुसलमानों के रसूल की गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं कर सकते। वह आपके लिए सेहत व आफ़ियत की दुआएं कर रहे हैं। मिस्र व अल ज्ज़ायरा में लोग खुशी के मारे सड़कों पर निकल आए हैं। मेरे सरदार अल्लाह आप से राजी हो। यह कहकर हुकूमती ओहदेदार खामोश हुआ। और मोअद्दब हो गया।

खलीफा अब्दुल हमीद की गर्दन अल्लाह की बारगाह में सजदा ब सजूद हो चुकी थी। आंखों से आंसू जारी। कुछ देर बाद सुल्तान ने हिम्मत इकठ्ठा की और गर्दन उठाई और उस हुकूमती ओहदेदार से मुखातिब हुए। ऐ! पाशा मुझे इज्जत सिर्फ इसलिए मिली है कि मैं उसी दीन का अदना सा खादिम हूं मुझे किसी बड़े लक़ब की जरूरत नहीं। यह कहकर सुल्तान ने हाथ पीछे को बांध लिए और महल के दौरे पर निकल खड़े हुए।

वह वक्त था जब खिलाफत उस्मानिया की हैबत और जलालत से यूरोप और कुफ्फार के मरकज हिल जाया करते थे।

#WeLoveMuhammad ﷺ

Naeem Akhtar

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This mosque is located at Istanbul. The name is #Süleymaniye. He was a king of the Ottoman Empire in 15th century. it is very awesome and beautiful mosque.

 

#और_इस_तरह_ख़िलाफ़त_उस्मानियाँ_खत्म_हुई

इस पसमंजर में मुसलमानों के लिए यह जानना दिलचस्पी से खाली नहीं होगा कि आखिर वह कौन सी आलमी और खास तौर पर सहूनी साजिशें थी जिस के नतीजे में आलमे इस्लाम को तुर्की में खिलाफत उस्मानिया से महरूम होना पड़ा हालात पर नजर डालें तो पता चलेगा कि आज से बहुत सालों पहले मगरीबी तक ताकतों ने 15 मई 1948 को फलस्तीनी अवाम के सीने में इस्राइल नाम का एक खंजर घोंपा था जिसकी कसक अभी तक महसूस की जा रही है उस से 1 दिन पहले इंग्लैंड ने उस इलाके से अपनी हुकूमत के खात्मे का ऐलान कर दिया था जिस पर उसने पहली आलमी जंग में तुर्की को शिकस्त देकर कब्जा कर लिया था जरूरी है कि उन हालातों पर नजर डाली जाए जिनके जरिया इसराइल के कयाम से 30 साल पहले खिलाफत उस्मानिया के खिलाफ साजिशों का जाल बनाया गया था
पहली आलमी जंग का सिलसिला 1914 में शुरू हुआ था जो 1918 में तुर्की और जर्मनी की शिकस्त पर खत्म हुआ उस जंग में एक तरफ ब्रतानियाँ और उसके इत्तेहादी थे तो दूसरी तरफ जर्मनी और तुर्की के आखिरी खलीफा सुल्तान अब्दुल हमीद की फौज खड़ी थी जंग के खात्मे के बाद तुर्की में इस्लाम पसंद ताकतों का ज़वाल होता गया और मुस्तफा कमाल पाशा की कयादत में दहरियों का असर व रसूख बढ़ता गया
उसका नतीजा खिलाफत उस्मानिया के खात्मे की शक्ल में निकला
नाकदीन की नजर में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रेहलत के बाद तारीख ए इस्लाम का बदतरीन और दर्दनाक वक्त शायद 1924 में खिलाफत उस्मानिया के ख़ात्मे की सूरत में पैदा हुआ क्योंकि तुर्की में खिलाफत जैसी भी थी उसके खात्मे के बाद मिल्लत इस्लामिया की रही सही ताकत को खत्म करके रख दिया।

यही वजह थी कि हिंदुस्तान के मुसलमान खिलाफत उस्मानिया के खात्मे पर तड़प उठे थे और मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली ने तहरीक खिलाफत शुरू की उसका असर कितना बड़ा अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब हिंदुस्तान के गली कूचों में यह शेर पढ़ा जाता था :-

बोली अम्मा मोहम्मद अली की
जान बेटा खिलाफत पर दे दो

कहा जाता है कि सुल्तान अब्दुल हमीद के दौरे हुकूमत में यहूदियों के एक ग्रुप ने खलीफा से मुलाकात की यह उन्नीसवीं सदी के आखिर की बात है उस जमाने में खिलाफत उस्मानिया बेहद कमजोर हो चुकी थी तुर्की की माली हालत बहुत खराब थी हुकूमत भी बहुत अधिक कर्ज में डूबी थी उस ग्रुप में खलीफा से कहा था कि अगर आप बैतूल मुक़द्दस और फ़लस्तीन हमें दे दें तो हम खिलाफत उस्मानिया का सारा कर्जा उतार देंगे और कई टन सोना भी देंगे इस गए गुजरे खलीफा अब्दुल हमीद की हिम्मत देखिए उस ने जवाब दिया जिसे तारीख कभी फरामोश नहीं कर सकती खलीफा ने अपने पांव की उंगली से जमीन की तरफ इशारा करते हुए कहा अगर अपनी सारी दौलत दे कर तुम लोग बैतूल मुकद्दस की जरा सी मिट्टी भी मांगोगे तो हम नहीं देंगे।

उस ग्रुप का लीडर एक तुर्की यहूदी क़रह सूह आफनदी था बस फिर क्या था खिलाफत उस्मानिया के खिलाफ साजिश का सिलसिला शुरू हो गया जिसके चंद सालों बाद जो आदमी मुस्तफ़ा कमाल पाशा की तरफ से ख़िलाफ़त उस्मानियाँ के खात्मे का परवाना लेकर ख़लीफ़ा अब्दुल हमीद के पास गया था वह कोई और नही बल्कि यही तुर्क यहूदी करह सूह आफ नदी ही था।

• Mameluke Empire: 1250-1517, 267.
• Ottoman Empire: 1320-1570, 250 years.
• Spain 1500-1750: 250 years.
• Romanov Russia: 1682-1916, 234 years.
• Britain: 1700-1950, 250 years.

ख़ुद मुस्तफ़ा कमाल पाशा भी यहूदी नस्ल ही था उसकी माँ यहूदी थी और बाप तुर्क कबाइली मुसलमान था, फिर सारी दुनिया ने देखा कि ख़िलाफ़त उस्मानियाँ के खात्मे के बाद तुर्की में नवजवान तुर्कों का गलबा शुरू हो गया, यहीं से Turks Youngs की एक तंजीम निकली जिन्होंने ने कमाल पाशा की कयादत में इस्लाम पसन्दों पर जुल्म ढाये उलेमा का क़त्ल ए आम किया नमाज़ की अदायगी और तमाम इस्लामी रसूमात पर पाबंदी लगा दी, अरबी ज़बान में खुतबा अज़ान नमाज़ बन्द करदी गयी मस्जिद के इमामों को पाबंद किया गया कि वह तुर्क ज़बान में अजान दें नमाज पढें और खुतबा दें, इस्लामी लिबास उतरवाकर अवाम को यूरोपीय कपड़े पहनने पर मजबूर किया गया, कमाल पाशा और उसके हवारियों ने तुर्की में इस्लाम को दबाने के जितनी गर्म जोशी का मुजाहिरा किया और मुसलमानों को जितना नुकसान पहुंचाया, उसकी मिसाल रूस और दीगर कम्युनिस्ट मुल्कों के अलावा शायद कहीं ना मिले
खिलाफत उस्मानिया के अंदरूनी मुल्क यहूदियों ने जो साजिशी जाल फैलाया था उसकी एक झलक दिखलाने के लिए खलीफा अब्दुल हमीद का 1 तारीख ही खत पेश किया जाता है जो उन्होंने अपने शेख अबुल शामात महमूद आफनदी को उस वक्त लिखा था जब उन्हें खिलाफत से माजूल करके जलावतन और कैद तन्हाई पर मजबूर कर दिया गया था
उस खत के मजमून से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उम्मते मुस्लिमां की निजाम खिलाफत की बीख कुनी के लिए सहूनी ताकतों ने कैसी-कैसी साजिशे की थी और उन साजिशों में कौन शरीक था।

Tomb of Osman Gazi. Founder of the Ottoman Empire in Bursa. What an experience visiting!

 

खलीफा अब्दुल हमीद के खत का उर्दू तर्जुमा पेश है :-

मैं इंतिहाई नियाज मंदी के साथ तरीका साजलियत के उस अजीम मरतबत शेख अबुल शामात आफनदी की खिदमत में बाद तकदीम एहतराम अर्ज गुजार हूं कि मुझे आपका 22 मई 1913 का लिखा हुआ खत्म मौसूल हुआ

जनाब वाला मैं यह बात साफ-साफ बताना चाहता हूं कि मैं उम्मत मुस्लिमां की खिलाफत की जिम्मेदारियों से खुद दस्तबरदार नहीं हुआ बल्कि मुझे ऐसा करने पर मजबूर किया गया। Union सेट पार्टी ने मेरे रास्ते में बेशुमार रुकावटें पैदा कर दी थी मुझ पर बहुत ज्यादा और हर तरह का दबाव डाला गया सिर्फ इतना ही नहीं मुझे धमकियां भी दी गई और साजिशों के जरिए मुझे खिलाफत छोड़ने पर मजबूर किया गया।

Union सेट पार्टी जो नौजवान तुर्क के नाम से भी मशहूर है ने पहले तो मुझ पर इस बात के लिए दबाव डाला कि मैं मुकद्दस सर जमीन फलस्तीन में यहूदियों की कौमी हुकूमत के कयाम से इत्तेफाक कर लूं मुझे इस पर मजबूर करने की कोशिश भी की गई लेकिन तमाम दबाव के बावजूद मैंने इस मुतालबा को मानने से साफ इंकार कर दिया मेरे इस इंकार के बाद उन लोगों ने मुझे 150 मिलियन स्टर्लिंग पाउंड सोना देने की पेशकश की मैंने उस पेश कश को भी यह कहकर रद्द कर दिया कि यह 150 मिलियन स्टर्लिंग पाउंड सोना तो एक तरफ अगर तुम यह करह ए अर्ज सोने से भर कर पेश करो तो मैं इस घिनौनी तजवीज को नहीं मान सकता।

30 साल से ज्यादा अरसा तक उम्मत मोहम्मदिया की खिदमत करता रहा हूं इस तमाम अरसे में मैंने कभी इस उम्मत की तारीख को दागदार नहीं किया मेरे आबा वजदाद और खिलाफत उस्मानिया के हुक्मरानों ने भी मिल्लत इस्लामिया की खिदमत की है लिहाजा में किसी भी हालत और किसी भी सूरत में इस तजवीज को नहीं मान सकता मेरे इस तरह से साफ इनकार करने के बाद मुझे खिलाफत से हटाने का फैसला किया गया उस फैसले से मुझे बाखबर कर दिया गया और बताया गया कि मुझे जलावतन किया जा रहा है मुझे इस फैसले को कबूल करना पड़ा क्योंकि मैं खिलाफत उस्मानिया और मिल्लत इस्लामिया के चेहरे को दागदार नहीं कर सकता था खिलाफत के दौर में फलस्तीन में यहूदियों की कौमी हुकूमत का कयाम मिल्लत इस्लामिया के लिए इंतिहाई शर्मनाक हरकत होती और दायमी रुसवाई का सबब बनती खिलाफत खत्म होने के बाद जो कुछ होना था हो गया मैं तो अल्लाह ताला की बारगाह में सरबा सजूद हूँ और हमेशा उसका शुक्र बजा लाता हूं कि उस रुसवाई का दाग मेरे हाथों नहीं लगा बस इसी अर्ज के साथ अपनी तहरीर खत्म करता हूं।

वस्सलाम 22 ऐलोल 1329 (उस्मानियाँ कैलेंडर के मुताबिक) सितम्बर 1913ई मिल्लत इस्लामिया का ख़ादिम अब्दुल हमीद बिन अब्दुल मजीद।

खलीफा अब्दुल हमीद के इस खत को गौर से पढ़ने के बाद बहुत से हकायक सामने आते हैं सबसे पहली बात तो यह कि उन्हें अल्लाह ताला की ज़ात पर बेहद यकीन था उन्होंने यहूदियों की इतनी बड़ी माली पेशकश को ठुकरा दिया मिल्लत इस्लामिया की तारीख को अपने अहद में दागदार होने से बचाए रखा अहलुल्लाह और अहले इल्म से उन्हें गहरा दिली ताल्लुक था तो तज़किया कल्ब और रूह के लिए बाकायदा सिलसिला शाजलिया से वाबस्ता थे।

यहूद और मगरिब की साम्राजी ताकतों के सामने अजम और इसतकामत के साथ डटे रहें अपने दौरे खिलाफत में यहूदियों को सर जमीन फलस्तीन में कता जमीन किसी भी कीमत पर खरीदने की इजाजत नहीं दी एक तारीखी हकीकत यह है कि जब तक तुर्की में खिलाफत उस्मानिया कायम रही उस वक्त तक इस्तेमारी ताकतों का फलस्तीन में यहूदी ममलिकत के कयाम का ख्वाब शर्मिंदा ताबीर ना हो सका।

 

At one time the Ottoman Empire was run by the Harem of the Emperor. In that period the women corporatised the Harem, organised it as bureaucracy, and took all crucial decisions & made official appointments. Would you dismiss this or celebrate it?

मुसलमानों और यहूदियों की कशमकश

मुसलमानों और यहूदियों की कशमकश तो यूं तो बहुत पुरानी है लेकिन नए अंदाज में इसकी शुरुआत 1897 में हुई जब यहूदी अकाबरीन ने खुफिया तौर पर जमा होकर यह तय किया कि खिलाफत उस्मानिया पर घात लगाई जाए क्योंकि उनके इरादे की तकमील में सबसे बड़ी रुकावट आलमे इस्लाम की मरकजी ताकत खिलाफत उस्मानिया ही थी इसलिए तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक खलीफा सुल्तान अब्दुल हमीद की खिदमत में एक ऐय्याराना दरख्वास्त पेश की गई कि हमें फलस्तीन में एक टुकड़ा जमीन दे दिया जाए हम उसकी बड़ी से बड़ी कीमत देने के लिए तैयार हैं सुल्तान ने यहूदियों के अजायम को भाप लिया उनकी दरख्वास्त रद्द कर दी बस फिर क्या था सुल्तान के खिलाफ मुल्क के अंदर और बाहर नफरत और प्रोपगंडा की मुहिम शुरू कर दी गई ईसाई हुकूमत पहले ही खिलाफत उस्मानिया से हार के बैठी थी उन की फौजी ताकत और यहूदियों की खुफिया साजिशों के जरिया मुसलमानों की मर्जी ताकत हमेशा के लिए खत्म कर दी गई और तुर्की के अंदर मुस्तफा कमाल पाशा की कयादत में एक तंजीम यूनियन सेट पार्टी की बुनियाद डाली गई इस पार्टी में ज्यादातर भोले-भाले तुर्क नौजवान शामिल थे इस अंजुमन के इजतेमात के लिए फ्रीमेसन लॉज थे फ्री मिशन तहरीक दरअसल यहूदियों के दिमाग की उपज है जिसमें खासतौर पर ऐसे लोगों को शामिल किया जाता है जिनका रिश्ता किसी न किसी मजहब से होना जरूरी है लेकिन हकीकत में वह मजहब से बेजार होते हैं इसलिए वह बड़े-बड़े लोग जिनके बारे में मोतैयन तौर पर मालूम हो कि वह फ्रीमेसन तहरीक के सरगम मेंबर थे उनमें मुस्तफा कमाल पाशा भी शामिल है।

इस तंजीम के हाथों खिलाफत उस्मानिया का शेराजा बिखेरा गया और इस्तेमाल किया गया मुस्तफा कमाल पाशा को फिर आलमे इस्लाम एक ऐसे इंतेशार का शिकार हो गया कि आज तक ब्लॉद इस्लामिया के इत्तेहाद की तमाम तहरीकें बेअसर साबित हुई बहरे हाल 1924ई में तुर्की से खिलाफत उस्मानिया का खात्मा हो गया Union सेट पार्टी सत्ता में आ गई आखरी खलीफा सुल्तान अब्दुल हमीद को सत्ता से बेदखल करके जला वतनी की जिंदगी गुजारने पर मजबूर कर दिया गया तुर्की में दहरियों का राज हो गया मजहब बेज़ार फौज का बोलबाला हो गया और ठीक 24 साल बाद यानी 15 मई 1948 को फलस्तीन में यहूदी ममलिकत इसराइल का कयाम अमल में आया हालात की सितम जारीफ़ी देखिए जिस खलीफा ने हर तरह की लालच और धमकियों के बावजूद यहूदियों को फलस्तीन की रत्ती भर जमीन देने से इनकार कर दिया था उसी फलस्तीन में इसराइल को तस्लीम करके उसके साथ सफारती ताल्लुकात कायम करने वाला पहला मुस्लिम मुल्क कोई और नहीं बल्कि अतातुर्क का तुर्की ही था।

नईम अख़तर

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बक़ौल इक़बाल..

अस़ा ना हो तो कलीमी है कार बे बुनियाद…

From the book “Osmanlı’dan Torunlarına Yol Rehberi”.

In the late 1800’s, it became known to Sultan Abdülhamid II that a comedy play about the life of the Prophet Muhammad (ﷺ) was being performed at a theater in Paris, France. As the Caliph of all Muslims, this was an intolerable affront to Islam that Sultan Abdülhamid II wanted to put an end to. He wrote an ultimatum letter to the French government informing them that he was intent on stopping the play. After deliberating the matter, not only did the French government put an end to the play, they also exiled many of the actors to the United Kingdom to appease the Sultan.

After some time, the Sultan learned that the same derogatory play was going to start being performed in London. Sultan Abdülhamid II reacted to this news and wrote a letter to the British government with a similar ultimatum, and informed them that the play had recently been prohibited in France. The British government responded to the Sultan’s letter by stating “This is not France. We have freedom in our borders.”

Upon receiving this letter, Sultan Abdülhamid II wrote a fairly aggressive response to the British and stated: “My ancestors gave their lives without hesitation for the sake and success of Islam. In this vein, I will decisively prepare an order to the entire worldwide Muslim nation (Ummah) and inform them of your continued haughty attitude and persistence in allowing this disrespectful play to continue. YOU MUST NOW CONSIDER WHAT WILL BE THE OUTCOME OF THIS ORDER!”

The British, having had extensive diplomatic ties with Sultan Abdülhamid II had an in-depth insight into his personality. They realized that his words were not an empty threat, and immediately put an end to the theatrical play.

TR: 1800’lerin sonlarında, Sultan II. Abdülhamid Paris’te Peygamber Efendimiz’in (ﷺ) hayatı ile ilgili bir aşağılayıcı bir piyes oynatılacağını ögrenmiştir. İslam’a aykırı olan bir hakaret olarak görülen bu piyes, bütün Müslümanların Halifesi olan Sultan II. Abdülhamid tarafından durdurulmak istenir. Fransız hükümetine, oyunu durdurmaya niyetli olduğunu bildiren bir mektup gönderdi. Konuyu tartıştıktan sonra, sadece Fransız hükümeti oyuna son vermedi, aynı zamanda birçok aktörü Padişahı yatıştırmak için İngiltere’ye sürdüler.

Bir süre sonra Sultan aynı oyununun Londra’da başlayacağını öğrenir. Sultan II. Abdülhamid bu habere tepki gösterdi ve aynı ültimatom ile İngiliz hükümetine bir mektup yazar ve oyunun kısa bir süre önce Fransa’da yasaklandığını belirtir. İngiliz hükümeti Sultan’ın mektubuna: “Burası Fransa değil, bizde özgürlük var.” diye yanıt verir.

Sultan II. Abdülhamid’in, İngilizlere cevabı sert olur: “Atalarım, uğruna canlarını tereddüt etmeden feda ettikleri Islamiyeti tezyif eden piyesi kaldırmadığınız sürece, İslam alemine beyanname göndererek, İngilizlerin Peygamberimizi tezyif; İslamiyet’i tahkir eden piyes oynattıklarını bütün Müslümanlara duyuracağım. NETICESINI SIZ DÜŞÜNÜN…!”

Sultan II. Abdülhamid ile kapsamlı diplomatik ilişkilere sahip olan İngilizler, Sultan’ın sözlerinin boş bir tehdit olmadığını fark ettiler ve derhal tiyatro oyununa son verirler

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#सलजूकी_____सल्तनत

11वीं सदी से 14 वीं सदी ईसवी के दरम्यान मशरीकि उस्ता वस्त एशिया में कायम एक मुस्लिम बादशाहत थी जो नस्ल से ओगोज़ तुर्क थे, मुस्लिम तवारीख में इसे बहुत अहमियत हासिल है, कियूं की यह दौलत अब्बासिया के ख़ात्मेन के बाद आलमें इस्लाम को एक मरकज पर जमा करने वाली आखरी सल्तनत थी,उसकी सरहदें एक तरफ चीन से लेकर बहरे मोतवसत और तरफ अदन से लेकर ख्वारजम व बुख़ारा तक फैली ही थी, उनका दौरे अहद इस्लाम का आखरी अहदे ज़री कहला सकता है, इसी लिए सलाज़का को मुस्लिम तारीख में खास दर्जा व मकाम हासिल है, सलजूकीयों के ज़वाल के साथ उम्मते मुस्लिमा में जिस सियासी इंतशार का आगाज़ हुआ उसका फायदा उठाते हुए अहले यूरोप नें मुसलमानों पर सलीबी जंगें थोप कर और आलमें इस्लाम के क़ल्ब में मुक़द्दस तरीन मकाम बैतुल मुक़द्दस पर कब्जा कर लिया..

 

Topkapı Palace is one of the oldest palaces in the world, It served as the administrative centre of the Ottoman Empire for some 400 years. Unlike European palaces, it comprises of numerous structures and various pavilions and apartments, giving it the appearance of a small city

 

9 Feb, 1640, #Murad IV, sultan of the #Ottoman Empire (1623-40), died in Baghdad.
His reign is most notable for the Ottoman–#Safavid War
(1623–39)

#Ibrahim (1640-1648) succeeded Murad IV in the Ottoman House of #Osman.

 

Sultan Ibrahim

 

 

Dolmabahçe Palace 🇹🇷
Served as the main administrative center of the Ottoman Empire from 1856 to 1887 & 1909 to 1922

 

 

last khalifa Abdul Hamid of Ottoman empire

 

 

1909 1327AH TURKEY Ottoman Empire Sultan Genuine Silver 20K Islamic Coin

 

In the period when the Ottoman Empire forbade Jewish immigration to Palestine, it did not prevent the Jews from coming to Jerusalem for religious purposes.

 

will re-establish the ottoman empire very quickly.