70 वर्षों में कुछ नहीं हुआ, वो कहते हैं जिन्होंने अशांति, दंगे, नरशंहार किये, देश की सम्पतियों को दोनों हाथों से लुटा

70 वर्षों में कुछ नहीं हुआ, वो कहते हैं जिन्होंने अशांति, दंगे, नरशंहार किये, देश की सम्पतियों को दोनों हाथों से लुटा

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राजनीती में कब क्या होगा कोई नहीं जानता, 70 साल की बात होती है, कुछ लोग कहते हैं कि 70 वर्षों में कुछ नहीं हुआ और कांग्रेस ने लूटा है, 70 वर्षों में काम तो हुआ है, बटवारे से पहले यहाँ अंग्रेजी राज था, जाने से पहले वो देश को खोखला/कंगाल कर छोड़कर गए थे, लोगों को उस समय लुटापिटा देश मिला था, ऊपर आसमान था और नीचे ज़मीन और थी ख़ुशी कि ‘हम’ आज़ाद हो गए, आज़ादी के बाद जो भी सरकारें बनी उन्होंने देश को संभाला, काम शुरू हुए और तरक्की के रास्ते खोले गए, हाँ लूटमार सरकारी पैसे की ज़रूर हुई और लूट करने वाले भी वही लोग थे जो ‘ईसा’ से कहते थे, पहले मुर्दे को ज़िंदा करके दिखाओ फिर मानलेँगे तुम सच्चे हो, जो कहते थे ‘चाँद’ के टुकड़े करके दिखाओ तो मानलेँगे ‘नबी’ हो, जो रात के अँधेरे में ‘अली’ के घर पहुँच कर कहते हैं 1400 तलवारें हमारे पास हैं और ‘तुम’ अपनी खिलाफत का एलान कर दो,,,देश के बटवारे से पहले जो अंग्रेज़ों के वफादार/मुखबिर थे, आज़ादी मिलने पर ‘भीड़’ के साथ सरकारी तंत्र में ‘शामिल’ हो गए,,,,

एक वक़्त था जब भारत ग़रीब देश था, बहुत ज़यादा ग़रीब था, कोई कोई ही ऐसा होता था जो खाता पीता होता था, 80 के दशक तक अगर किसी की शादी में घडी/साइकिल/रेडियो में से कुछ भी मिल जाता था तो वो बड़ी शादी मानी जाती थी, लोग उसकी चर्चा करते थे, गेहूं की रोटियां सिर्फ मेहमान के आने पर बनती थीं, एक बार जो कपडे किसी मौके/त्यौहार पर बन गए वो कई साल चलते थे, बाप का पजामा, बड़ा बेटा पहनता था, बड़े भाई की कमीज़ छोटी होने पर छोटा भाई पहना करता था, पूरी सर्दियाँ आलू की भरी हुई बाजरे की रोटियां, आलू का भरता, आलू के वर्क के साथ गुज़रता था, जर्सी/स्वटर/जैकेट/कोट फिल्मों में देख सकते थे,,,मोटर साइकिल/बाईक भूल चूक से किसी किसी के पास होती थी, तब जावा/यज़दी/राजदूत/बुलट हुआ करती थीं,

तरक्की की रफ़्तार एक साथ 1990 के बाद शुरू हुई, लिब्ब्रालाज़ेशन/ग्लोबलाज़ेशन/इंटरनेट/मोबाइल ने दुनियां को छोटा कर दिया, अब क्रांति का समय था, मगर वो जिस लेवल की होना चाहिए थी नहीं हुई, दंगों, झगड़ों, साम्प्रदायिकता ने रूकावट का काम किया, साम्प्रदायिकता वो लोग/संगठन फैला रहे थे जो ‘भीड़’ के साथ सरकारी तंत्र में बैठे लूटमार कर राजनैतिक/सामाजिक रूप से तरक्की कर चुके थे, उनकी नज़र सब कुछ खुद ‘हड़प’ कर जाने पर लगी थी,,,

भारत बाहर से आने वाले लोगों/समूहों/नस्लों के लोगों का देश है, जिस तरह अंग्रेजी साशन में उनकी ग़ुलामी/मुखबिरी करने वाले आज खुद को सबसे बड़ा ‘देशभक्त’ साबित करते हैं, यही मामला बहार से आने वाले लोगों के सम्बन्ध में भी है, मतलब कि ‘विदेशी’ जो यहाँ आकर बसे थे वो अन्य को ‘बाहरी’ ‘आक्रमणकारी/लुटेरा आदि की संज्ञा देते हैं, भारत की 90 फीसद से ज़यादा आबादी विदेशी मूल की है, इनके पुखे कभी यहाँ आये और इधर बस गए,,,,यह इलाका सुरक्षित, सुविधाजनक था, यहाँ समतल ज़मीन थी, दरिया, नदियां, जंगल, पहाड़, सर्दी, गर्मी, बरसात के मौसम थे, लोग यहाँ ज़रखेज़ खेती की ज़मीन की वजह से ज़यादा आते थे

दुनियां इसी तरह से बढ़ी और फैली है, भारत में रंग/रूप/ज़ात/वर्ग/धर्म/भाषायें अनेक हैं वजह जो बहार से आता था वो अपनी विरासत साथ लाता था और इस तरह से यहाँ भिन्न भिन्न चीज़ें मिलती हैं जो देश की खूबसूरती दिखाती हैं

बटवारे के बाद एक विचार यहाँ जो पहले से पनप रहा था लगातार सक्रिय रहा और ताक़तवर होता चला गया, किसी भी देश/समाज का विकास वहां की सरकारों की पॉलिसी पर निर्भर करता है, भारत में हर सरकार में वो ‘सपोले’ पालते गए, उनका ज़हर समाज में फैलता रहा, इनकी नफरत की आंधी में कभी कभी लगता कि जैसे यहाँ कुछ नहीं बचेगा, फिर भी कुछ लोग अपना सीना ताने इनके सामने खड़े होते रहे और ये अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँच सके हैं,

70 वर्षों में कुछ नहीं हुआ वो लोग कहते हैं जिन्होंने यहाँ अशांति, दंगे, नरशंहार किये हैं, देश की सम्पतियों को दोनों हाथों से लुटा है, ये देश कैसे कैसे आगे बढ़ा है का अंदाजा इस से लगा सकते हैं कि ‘यहाँ के लोग’ जानवरों के गोबर को पानी में धो कर उसमे से अनाज के दाने निकालते थे और उस को ‘चक्की’ में पीस कर खाते थे, जो मवेशी मर जाते उनका ‘मॉस’ निकाल कर लाते थे और खाते थे,,,गॉंव में धोबी/नाई/भंगी/भिस्ती सिर्फ ‘रोटी’ अनाज के बदले मजदूरी/चाकरी करते थे,,,बस्तियों में ‘मल’ उठाने आने वाली ‘हरिजन’ महिलएं काम निपटाने के बाद हर घर जा कर रोटी मांग कर लाती थीं, नाई आ कर किसी कुआं की सफील पर अपना उस्तरा लेकर बैठ जाता था, जिस किसी को हजामत बनवानी होती वह यहाँ आ कर बनवा लेता था, बदले में नाई को फसल पर अनाज मिलता था,,,,ये समाज था तब, आज ऐसा नहीं है, अब भी मगर बहुत सारा काम है जो होना चाहिए/करना ही होगा, मगर अंग्रेज़ों के वफादार/मुखबिर रहे लोग देश को अंग्रेज़ों की तरह चलना चाहते हैं जहाँ उनका अपना कानून चले, उनको माई बाप समझा जाये, उनके गुणगान हों और उनके पूवजों की बहादुरी/शौर्य के फ़र्ज़ी किस्सों को सत्यापित कर उनका पाठ हुआ करे, भव्य/दिव्य/विशाल मंदिर का सपना दिखा कर ये देश को धोखा देते रहे हैं,,,भगवान् उनके न दिलों में है इन इनके शिवालयों में, वह ग़रीब की ‘भूख’ रोटी में है,,,वो गंदगी साफ़ करने वाले, मैला ढोने वाले, मरे जानवरों को खाने के लिए मजबूर किसे गए लोगों के ‘ख्यालों’ में है,,,परवेज़ ख़ान

 

सबकी नजरें प्रियंका पर थीं

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महासचिव नियुक्त किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश के पहले दौरे पर गईं प्रियंका गांधी पर सोमवार को कई लोगों की नजरें रहीं। आम लोगों, राजनीतिक विश्लेषकों, प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा और लखनऊ में उनके पहले रोड शो में शामिल हुए कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ताओं की नजरें उन पर टिकी रहीं। इतना ही नहीं, केंद्र एवं उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी भाजपा भी प्रियंका के हर एक कदम पर नजरें गड़ाए हुए है।

प्रियंका के लखनऊ के कार्यक्रम में एक बात गौर करने लायक रही कि कांग्रेस महासचिव के तौर पर पहला रोड शो करने के बाद भी उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया और न ही सार्वजनिक तौर पर कोई टिप्पणी की।

बहरहाल, प्रियंका के लिए राजनीति एवं परिवार और सार्वजनिक एवं निजी जीवन की सीमा रेखाएं उस वक्त धुंधली पड़ती दिखी जब भाजपा के एक सांसद ने उनके कपड़ों को लेकर महिला विरोधी टिप्पणी कर दी।

उत्तर प्रदेश के बस्ती से भाजपा सांसद हरीश द्विवेदी ने अपने संसदीय क्षेत्र में पत्रकारों से कहा कि प्रियंका जब दिल्ली में रहती हैं, तो जींस और टॉप पहनती हैं। जैसे ही वह क्षेत्र में जनता के बीच जाती हैं तो वह साड़ी और सिंदूर लगाकर आती हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एम वीरप्पा मोइली और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने महिला विरोधी टिप्पणी के लिए भाजपा सांसद की आलोचना की।

प्रियंका ने आज ट्विटर पर दस्तक दी और कुछ ही घंटों के भीतर उनके 95 हजार से अधिक फॉलोवर हो गए।

सोमवार को एक फेसबुक पोस्ट में वाड्रा ने प्रियंका को शुभकामनाएं देते हुए लिखा कि भारत के लोगों की सेवा और उत्तर प्रदेश में आपके काम के नए सफर पर आपको मेरी शुभकामनाएं पी (प्रियंका)। आप मेरी सबसे अच्छी दोस्त, परफेक्ट पत्नी और अपने बच्चों के लिए बेहतरीन मां रही हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल के बहनोई वाड्रा ने कहा कि बदले की भावना वाला और जहरीला राजनीतिक माहौल है। लेकिन मैं जानता हूं कि लोगों की सेवा करना उनका कर्तव्य है और अब हम उन्हें भारत के लोगों को सौंपते हैं। कृपया उन्हें सुरक्षित रखें।

विदेश में संपत्तियां खरीदने और राजस्थान के बीकानेर में जमीन आवंटन से जुड़े मामलों में वाड्रा के खिलाफ जांच चल रही है। पिछले हफ्ते वह पूछताछ के सिलसिले में तीन बार ईडी के समक्ष पेश हुए। मंगलवार को भी वह जयपुर में ईडी के सामने पेश हो सकते हैं।

1997 में वाड्रा से शादी करने वाली प्रियंका ने बीते बुधवार को अपने पति का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा था कि वह मेरे पति हैं, वह मेरा परिवार हैं। मैं अपने परिवार का समर्थन करती हूं। प्रियंका बुधवार को अपने पति को ईडी के दफ्तर तक छोड़ने आई थीं।

सोमवार को लखनऊ में प्रियंका की एक झलक पाने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। कई बुजुर्गों ने कहा कि प्रियंका में अपनी दादी इंदिरा गांधी की छवि नजर आती है। प्रियंका ने अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के साथ राज्य में पहले भी चुनाव प्रचार किए हैं, लेकिन इस बार कांग्रेस महासचिव के तौर पर रोड शो करने के बावजूद उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं बोला।
जब प्रियंका का रथ आगे बढ़ रहा था, उत्साही लोग और पार्टी कार्यकर्ता उनकी एक अदद तस्वीर लेने के लिए बेसब्र दिखे। प्रियंका के रथ पर रास्ते में खड़े सैकड़ों कार्यकर्ता गुलाब और गेंदे के फूलों की वर्षा करते दिखे। कुछ पोस्टरों में प्रियंका को शेर पर सवार दुर्गा माता के अवतार में दिखाया गया।

होर्डिंगों और बैनरों पर लिखा नजर आया कि मां दुर्गा का रूप बहन प्रियंका जी का लखनऊ आगमन पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन है। इसके आगे की लाइन है, दहन करो झूठे मक्कारों की लंका, बहन प्रियंका, बहन प्रियंका…।

कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने ‘प्रियंका सेना’ भी बना ली। उन्हें गुलाबी रंग की टी-शर्ट पहने देखा गया जिस पर प्रियंका की तस्वीर थी। इससे पहले, भाजपा सांसद द्विवेदी की टिप्पणी की निंदा करते हुए मोइली ने ट्वीट किया कि लिंगभेदी और अनुचित टिप्पणियां पुरुषवादी और महिला विरोधी मानसिकता दर्शाती हैं। महबूबा ने कहा कि कोई महिला क्या पहनना पसंद करती है, इससे किसी और को कोई मतलब नहीं होना चाहिए।

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा ने कहा कि दुखद है कि आज की आधुनिक दुनिया में भी पितृसत्ता और लिंगभेद हमेशा अपना बदसूरत सिर उठा लेते हैं और इसे आम बना दिया गया है।

 

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Disclaimer : लेख में ज़ाति सूचक सब्द का स्तेमाल केवल ‘उस समय’ के समाज को दर्शाने के लिए किया गया है, उस शब्द का स्तेमाल किसी को दुःख पहुँचाने के लिए नहीं है, अगर किसी को ज़रा भी तकलीफ होती है तो उसके लिए खेद/मुआफी चाहूंगा,,,परवेज़