भक्ति के तीन विधान प्रचलित है

भक्ति के तीन विधान प्रचलित है

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अवतारकृष्ण अग्निहोत्री
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भक्ति के तीन विधान प्रचलित है:–
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1) “गौणी भक्ति” अथवा “नवधा भक्ति”
(जिसमे शारीरिक क्रियाओं की प्रधानता रहती है),

2) “रागानुगा भक्ति” (जिसमे मानसिक भावो की प्रधानता रहती है ) तथा

3) “रागात्मिका भक्ति” (जो भगवन के प्रत्यक्ष रूप के साथ की जाती है )

गौणी भक्ति (नवधा भक्ति ) मूलतः साधन भक्ति (अपरा भक्ति) है,
और प्रेमलक्षण भक्ति (रागानुगा व रागात्मिका भक्ति) ही साध्य भक्ति (परा भक्ति) है!

साधन भक्ति में भक्ति मन की एक वृत्ति मात्र है जो अन्य प्रवत्तियो के प्रबल हो जाने से दब जाती है, परन्तु साध्य भक्ति में भक्त का अन्तकरण ही पूरी तरह भाग्वादाकार हो जाता है और तब
“भक्ति-भक्त-भगवंत-गुरु,चतुर नाम बपू एक” (श्री नाभादास)
की उक्ति चरितार्थ हो जाती है!

साहित्य में नवरसो का वर्णन है,परन्तु रसिक भक्तो ने केवल पांच रसों को ही भगवत्प्राप्ति का साधन बताया है! श्री मधुसुदन सरस्वती ने भक्ति रसायन ग्रन्थ में भक्ति के रस रूप होने का प्रतिपादन किया है, जबकि अद्वैत सम्प्रदाय में भक्ति को भाव तथा परमात्मा को रस माना गया है-{रसों वै सः} (तेत्रियोंप्निषद )

वैष्णवों की भक्ति मूलतः पांच भावो(रसों ) पर निर्भर है-
शांत-दास्य-संख्य-वात्सल्य-और माधुर्य(कांता) भाव!

1..शांत भाव में सांसारिक विषयों से मन हटाकर ऐश्वर्यशाली भगवान् में चित लगाते है! सनकादी एवं नवयोगेश्वर इसी कोटि के भक्त है!

2..दास्य भाव में भक्त अपने इष्ठ को स्वामी और स्वयं को सेवक समझता है! दास को स्वामी के गौरव एवं मर्यादा का पग-पग पैर ध्यान रखना पडता है! श्री हनुमान जी एवं श्री लक्ष्मण जी की भक्ति दास्य भाव से औत प्रोत थी!

3..सख्य भाव में साधक अपने इष्ट के प्रति सखा भाव रखता है! वस्तुत सखा दो प्रकार के हो सकते है-एक जो भगवान् को अपना सखा मानते हो(अर्जुन,उद्धव जी,सुदामा) तथा भगवान् अपना सखा मानते हो(सुग्रीव,अंगद,विभीषण आदि)

4..वात्सल्य भाव में ममतापूर्ण वात्सल्य द्वारा आराध्य की उपासना की जाती है! साधनक अपने इष्ट को डांट-फटकार भी सकता है!माता यशोदा एवं नंदजी इसका अनुपम उदहारण है!

5..माधुर्य(कांता) भाव में धारणा है-भगवान् के प्रति पूर्ण समर्पण!
स्वकीया(दम्पत्या)भाव,परकीया(गोपी) भाव,सखी भाव, मंजरी भाव,सहचरी भाव,एकाकी भाव,महा भाव एवं अधिरुढ़(राधा) भाव इसकी विभिन्न अवस्थाएं है!

मधुर रस उतरोतर बढ़ता हुआ प्रेम, सनेह,मान,राग,अनुराग के बाद भाव की स्तिथि में पहुच जाता है!
भाव की पराकाष्ठा की माहाभाव है! इसमें भक्त और भगवान् के मध्य विभिन्नता का विचार पूरी तरह से समाप्त हो जाता है!

वज्रगोपियों की कांता शक्ति प्रेम प्रधान एवं परिपूर्ण है, जिसमे स्व-सुख के लिया कोई स्थान नहीं है!
उन्होंने चारो पुरुषार्थो (धर्म,अर्थ,काम एवं मोक्ष ) का त्याग कर पंचम पुरुषार्थ (प्रेमतत्त्व) को ही आत्मसात किया है!

डूबे सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान,
गहरो प्रेम-समुद्र कोऊ डूबे चतुर सुजान!