वार्सा सम्मेलन : अरबों ने मस्जिदुल अक़सा को बेच दिया : रिपोर्ट

वार्सा सम्मेलन : अरबों ने मस्जिदुल अक़सा को बेच दिया : रिपोर्ट

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वार्सा सम्मेलन में अरब नेताओं ने नेतनयाहू को सौंप दी बैतुल मुक़द्दस की चाभी, अबू अब्दुल्लाह सग़ीर ने भी ग्रेनाडा की चाभी फ़र्डीनान्ड को सौंपी थी मगर दोनों में फ़र्क़ है!

अमरीका के नेतृत्व में पिछले गुरुवार को वार्सा में 70 सरकारें एकत्रित हुईं लक्ष्य था ईरान पर अंकुश लगाना। यह सारा ड्रामा अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के इशारे पर हुआ।

मगर नतीजा जो निकला वह एक बयान के अलावा कुछ नहीं था बल्कि आपस में गहरे मतभेद उभरने लगे। यूरोप ने एक प्रकार से इस बैठक का बहिष्कार किया। रूस, चीन, भारत गौरवी इस्लामी व ग़ैर इस्लामी सरकारें भी इससे दूर ही रहीं। अरब विदेश मंत्री जो इस सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे थे पत्रकारों के सवालों से धोखा खाई दुल्हन की तरह शर्माकर भाग रहे थे।

 

यह लोग जो ज़ायोनी प्रधानमंत्री नेतनतयाहू की गोद में जाकर बैठ गए हैं कभी इस बारे में क्यों नहीं सोचते कि उनके लिए अमरीका और इस्राईल से बड़ा दुशमन ईरान कैसे हो गया? क्या वह इस्राईल नहीं है जिसने फ़िलिस्तीन की धरती पर और बैतुल मुक़द्दस में मुसलमानों और ईसाइयों के धार्मिक स्थानों पर ग़ैर क़ानूनी क़ब्ज़ा कर रखा है? क्या अरब सरकारों की समझ में यह बात नहीं आती कि अरब जगत में जनमत के स्तर पर ईरान एक सम्मानजनक राष्ट्र है?

यदि आज भी ईरान अपनी नीति में बदलाव करके अरबों के ख़िलाफ़ जाकर इस्राईल से हाथ मिला ले तो उसके ख़िलाफ़ अमरीका और उसके घटकों की चढ़ाई तत्काल रुका जाएगी और फिर इमारात और सऊदी अरब जैसे देश उसकी चापलूसी करने पर मजबूर हो जाएंगे।

सच बात तो यह है कि ईरान अपनी ठोस रणनीति और पारदर्शी सिद्धांतों के साथ इलाक़े में डटा हुआ है और उसकी ताक़त का लोहा दुशमन भी मानने पर मजबूर हैं। अरब देशों की जहां तक बात है कि उनका कोई एजेंडा ही नहीं है वह बस सीना पीटना जानते हैं। अरब सरकारों की रणनीति की अवधि एक हफ्ता होती है। इस रणनीति में बार बार बदलाव होता रहता है।

ईरान के बढ़ते प्रभाव का अगर कोई सामना करना चाहेगा तो वह नेतनयाहू की सेवा में नहीं जाएगा और इस्राईल से मदद नहीं मांगेगा बल्कि इस बात पर ध्यान देगा कि ईरान किन रास्तों पर चलकर मज़बूत हुआ है।

वार्सा सम्मेलन में कुछ अरबों ने मस्जिदुल अक़सा को बेच दिया उन्होंने पूरे बैतुल मुक़द्दस शहर को बेच दिया जैसे अबू अब्दुल्लाह सग़ीर ने ग्रेनेडाकी चाभी फ़र्डीनान्ड और ईज़ाबेला को दी थी मगर दोनों घटनाओं में एक बुनियादी अंतर है। अबू अब्दुल्लाह सग़ीर ने दुख और पीड़ा से रोते हुए चाभी सौंपी थी मगर उनके वंशज आज के अरब विदेश मंत्रियों ने वार्सा में क़ुद्स की चाभी हंसते मुसकुराते हुए नेतनयाहू को दी। यह निर्लज्जता की आख़िरी सीमा है।

(वरिष्ठ टीकाकार अब्दुल बारी अतवान के लेख का संक्षिप्त हिंदी अनुवाद)