पुलवामा हमले के बाद संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं!

पुलवामा हमले के बाद संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं!

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Kavita Krishnapallavi
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(एक मिनट रुकिए ! अगर आप एक शांतिप्रिय, सेक्युलर, तरक्कीपसंद, लोकतांत्रिक चेतना वाले नागरिक हैं, तो इस टिप्पणी को ज़रूर-ज़रूर पढ़िए ! अगर ये चिन्तायें और ये सरोकार आपके भी बनते हैं, तो कुछ ज़िम्मेदारियाँ आपकी भी बनती हैं ! सबसे पहले तो यह कि अगर आप सहमत हैं तो यह बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचानी है !)

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भई, संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं ! पुलवामा हमले के बाद मोदी और उनके सभी मंत्री-सांसद धुँआधार रैलियाँ कर रहे हैं ! मोदी तो सर्वदलीय बैठक बुलाकर खुद रैली में चले गए I भाजपा के मंत्री और सांसद मारे गए जवानों के शवों के साथ रोड शो कर रहे हैं ! मुख्य धारा की मीडिया के कुत्ते लाशों पर महाभोज में जुटे ही हैं ! जो हिन्दुत्ववादी साइबर गुंडे और भाड़े के टट्टू पिछले कुछ महीनों से कुछ शांत थे, वे सोशल मीडिया पर पूरी आक्रामकता के साथ सक्रिय हो गए हैं ! बस दो नारे दिए जा रहे हैं, “आम चुनाव को रोक दो और पाकिस्तान को ठोंक दो” और “देश को बचाना है, मोदीजी को फिर से लाना है!” मुस्लिम आबादी आतंक के साए तले जी रही है ! देश के विभिन्न इलाकों से कश्मीरी या तो खदेड़े और पीटे जा रहे हैं या धमकाए जा रहे हैं ! धार्मिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण तेज़ी से हो रहा है !

नोटबंदी, जी.एस.टी.आदि के कहर, 15 लाख वाले जुमले के भद्द पिटने, किसानों की आत्महत्या और अभूतपूर्व बेरोजगारी-मँहगाई से बदली हुई हवा को अपने पक्ष में करने के लिए नागरिकता रजिस्टर, तीन तलाक़ आदि-आदि कई तीन-तिकड़म करने के बाद, आखिरकार राम मंदिर के मुद्दे को फिर से हवा दिया गया, पर वह तो टांय-टांय फिस्स हो गया ! एक लोकरंजक अंतरिम बजट भी आया, पर रफ़ाल के अबतक के सबसे बड़े घोटाले का शोर दबाया न जा सका ! आप याद कीजिए, मैंने (और कई अन्य लोगों ने ) कुछ महीने पहले ही लिखा था कि जब कोई भी अस्त्र काम न आयेगा तो अपने सभी पूर्वजों-अग्रजों के नक्शे-क़दम पर चलते हुए हिन्दुत्ववादी फासिस्ट भी किसी न किसी तरह से अंधराष्ट्रवादी जुनून को हवा देंगे और उन्मादी देशभक्ति की लहर पर सवार होकर फिर से सत्ता तक पहुँचने की कोशिश करेंगे ! और एकदम वैसा ही हुआ ! अंधराष्ट्रवाद सभी फासिस्टों का अंतिम शरण्य और ब्रह्मास्त्र — दोनों होता है !

अंधराष्ट्रवादी “देशभक्ति” की लहर उभाड़ना फासिस्टों का एक ऐसा हथकंडा है, जिसके आगे बुर्जुआ राजनीतिक दायरे में उनसे प्रतिस्पर्धा कर रहे बुर्जुआ डेमोक्रेट और सोशल डेमोक्रेट बहुत जल्दी हथियार डाल देते हैं और सोशल डेमोक्रेट और लिबरल ज़हनियत के बुद्धिजीवी भी चुप्पी साध लेते हैं ! ये सभी या तो खुद किसी हद तक बुर्जुआ राष्ट्रवाद की नक़ली “देशभक्ति” की लहर में बहने लगते हैं, या यह सोचकर डर से चुप्पी साध लेते हैं कि उन्हें ‘गद्दार’ या ‘देशद्रोही’ कह दिया जाएगा ! ऐसे तमाम लोग भी अक्सर “देशभक्ति” साबित करने की प्रतिस्पर्द्धा में उतर जाते हैं, लेकिन यह गेम और इसका फील्ड तो सबसे पहले फासिस्टों का होता है, इसलिए उनका आगे निकल जाना लाजिमी होता है !

इन तथ्यों और तर्कों के मद्देनज़र संदेह तो उठता है ! आखिर हमले के अंदेशे की इंटेलिजेंस रिपोर्ट की अनदेखी क्यों की गयी ? एक आतंकी उतनी भारी मात्रा में आर.डी.एक्स. से भरी गाड़ी लेकर गलत साइड से सी.आर.पी.एफ़. के कॉन्वॉय तक कैसे पहुँच गया ? एयरलिफ्ट कराके श्रीनगर पहुँचाए जाने की सी.आर.पी.एफ़. की माँग को क्यों नहीं माना गया ? ये सारे सवाल हैं जिन्हें शोर में डुबोने की कोशिश की जा रही है ! रफ़ाल घोटाले से जुड़े ‘हिन्दू’अखबार के जो सनसनीखेज और शर्मनाक रहस्योद्घाटन किसी भी तिकड़म-हिकमत से दब नहीं पा रहे थे, वे एकबारगी “देशभक्ति” के जुनून द्वारा नेपथ्य में धकेल दिए गए हैं ! पिछली एक पोस्ट में मैं बता चुकी हूँ कि गम्भीर आतंरिक संकटों से जूझते पाकिस्तानी शासकों को — वहाँ की महाभ्रष्ट सेना को और बुरी तरह डिसक्रेडिट हो चुकी इमरान खान की सरकार को भी शिद्दत से एक छोटी या बड़ी लड़ाई की या सीमा पर तनाव की दरकार है ! और आर्थिक संकट झेल रहे पश्चिम के साम्राज्यवादी देश तो चाहते ही हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में किसी तरह से युद्ध भड़के जहाँ उनके हथियारों के दो सबसे बड़े खरीदार देश हैं !

फासिस्ट चरम मक्कारी और परम धूर्तता के साथ अपने काम में लगे हैं ! वे चाहते हैं कि या तो बिना ई.वी.एम. माता की कृपा बरसाए “देशभक्ति” की “पवित्र गैया” की पूँछ पकड़कर ही चुनावी बैतरनी पार हो जाए या फिर माता की कृपा का कम से कम सहारा लेना पड़े, क्योंकि पूरे देश में अगर ई.वी.एम. माता की कृपा बरसेगी तो यह खेल काफ़ी रिस्की होगा !

सभी विवेकशील, शांतिप्रिय, तरक्कीपसंद, सेक्युलर और लोकतांत्रिक चेतना के नागरिकों का यह दायित्व है कि वे दिन-रात काम में लगी संघी फासिस्टों की अफवाह मशीनरी, झूठ के कारखानों और उन्माद-प्रसारक केन्द्रों को नाकाम बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दें और इसमें सोशल मीडिया का भी भरपूर इस्तेमाल करें ! पूँजी की ताक़त और संगठित गुंडा गिरोहों का मुकाबला सिर्फ़ और सिर्फ़ जनशक्ति को जागृत और संगठित करके ही किया जा सकता है !इस महत्वपूर्ण काम को अंजाम देने में आप की भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, होनी ही चाहिए, होनी ही होगी ! वे अपने काम में लगे हैं ! आप अपने काम में कब लगेंगे ?

Disclaimer : लेख सोशल मीडिया में वायरल हुआ है, लेखक के निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है