अमित शाह के भाषणों में भड़काऊ बयान होते हैं, विकास की बात क्यों नहीं होती?

अमित शाह के भाषणों में भड़काऊ बयान होते हैं, विकास की बात क्यों नहीं होती?

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भारत में केंद्र में सत्ता में बैठी पार्टी बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह लगातार ऐसे भाषण दे रहे हैं जिनसे विकास का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। हाल ही में एक बार फिर उन्होंने सांप्रदायिक भाषण देकर एक नए विवाद को जन्म दिया है।

प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत के राज्य केरल में होने वाले आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारियों का जायज़ा लेने पहुंचे भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए जहां केरल की सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा, वहीं उन्होंने मंदिर और मस्जिद की बात करके एक नए विवाद को जन्म दे दिया है। बीजेपी अध्यक्ष ने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टी का दुनियाभर में अस्तित्व नहीं बचा है और भारत में कांग्रेस पार्टी की यही स्थिति है। उन्होंने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वह अयप्पा के करोड़ों श्रद्धालुओं को ठग रही है और उन्हें न्याय से वंचित कर रही है।

भारत में सत्तारूढ पार्टी बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह के दावा किया कि आने वाले दिनों में कम्युनिस्ट पार्टी को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। उन्होंने केरल राज्य की वाम सरकार पर ज़ोरदार प्रहार करते हुए कहा कि सबरीमला प्रदर्शन के दौरान 2000 से अधिक श्रद्धालु सलाखों के पीछे डाल दिए गए हैं और 30000 से अधिक लोगों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए गए हैं। शाह ने कहा कि वाम मोर्चे की सरकार देश में सबरीमला के करोड़ों श्रद्धालुओं को ठगती आ रही है। उन्होंने कहा कि मस्जिदों में इस्तेमाल होने वाले लाउडस्पीकरों को क्यों नहीं हटाया जा रहा है? शाह ने कहा कि राज्य सरकार बताए कि अबतक कितनी मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाए गए हैं?

बीजेपी के अध्यक्ष के इस विवादित बयान पर भारत की विभिन्न पार्टियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपना-अपना रोष व्यक्त किया है। इन सभी का कहना है कि मोदी सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में किसी भी तरह का कोई विकास कार्य नहीं किया है इसलिए इस पार्टी के नेता और स्वयं इस पार्टी के अध्यक्ष केवल मंदिर-मस्जिद की राजनीति करने पर मजबूर हैं। भारतीय टीककारों का मानना है कि देश में जैसे-जैसे आम चुनाव नज़दीक होते जाएंगे वैसे-वैसे इस तरह के सांप्रदायिक बयानों की बारिश होने लगेगी। भारत के मामलों के जानकारों का मानना है कि जबसे इस देश में नरेंद्र मोदी की सरकार आई है तब से सांप्रदायिक हिंसाओं में बहुत अधिक वृद्धि हुई है और आने वाले दिनों में इसमें और अधिक वृद्धि देखने को मिल सकती है।

उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही अमेरिकी नैशनल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर “डैनियल कोट्स”ने अपनी एक रिपोर्ट में उन्होंने भारत में सांप्रदायिक दंगों की चेतावनी दी थी। अमेरिका के ख़ुफ़िया विभाग के प्रमुख ने कहा था कि “सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अगर राष्ट्रवादी विषयों को और अधिक हवा देती है तो भारत में संसदीय चुनावों से पहले सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है।”कोट्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, “भारत के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान उनकी पार्टी की कट्टरपंथी नीतियों ने भाजपा शासित राज्यों में सांप्रदायिक तनाव गहरा कर दिया है। उन्होंने कहा है कि इस बार चुनाव में हिन्दू राष्ट्रवादी कैंपेन देखने को मिल सकता है। बीजेपी एवं उसकी समर्थक पार्टियां हिन्दू वोटरों को रिझाने और उन्हें उत्तेजित करने के लिए निम्न स्तर पर हिंसा भड़का सकती हैं।’ कोट्स ने आगाह किया कि सांप्रदायिक संघर्ष बढ़ने से भारतीय मुसलमानों को अलग-थलग होना पड़ सकता है। इससे आतंकी गुटों को भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने का मौक़ा मिल जाएगा।