हमने तो कभी इन्हें देहरादून शहर में गाते नहीं सुना

हमने तो कभी इन्हें देहरादून शहर में गाते नहीं सुना

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Er S D Ojha
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पहाड़ी घसियारिनों का दर्द ।

अपने मातली, मिर्थी और मसूरी की पोस्टिंग के दौरान हमने घसियारिनों के दर्द को बहुत करीब से देखा है । हमने देखा है कि किस तरह पतरौल उनके आधे अधूरे काटे गये पेड़ की छोटी छोटी टहनियों और पत्तियों को छीन ले जाता है । यही नहीं उनकी दरांती और रस्सी भी छीनकर उनका चालान भी काट देता है । मिर्थी में शाम की सैर के वक्त अक्सर हमने ये नजारा देखा है । पतरौल तो गुस्से में होता । घसियारिनें बेचारगी की हंसी हंसती अनुनय विनय कर रहीं होती । उनकी धवल दंत पंक्तियाँ बहुत सुंदर लगतीं । कुमाऊँ में इन्हें मोतिमा कहा जाता है । मोतिमा मतलब मोतियों जैसी दांतों वाली । पतरौल पर इनका कुछ भी असर नहीं पड़ता । कई बार मैंने बीच बचाव करके इन मोतिमाओं को बचाया है । इन मोतिमाओं पर एक कविता तुलसीदास ने लिखा है –

“वरदंत की पंगति कुंदकली अधराधर पल्लव डोलन की”

पतरौल शब्द अंग्रेजी के पेट्रोलिंग से बना है । बाद में अंग्रेजी राज में हीं इसे फारेस्ट गार्ड बना दिया गया । स्वाधीनता के बाद यह वन रक्षक बना , लेकिन जन मानस में आज भी पतरौल हीं प्रचलित है । आज भी पतरौल घसियारिनों में आतंक का पर्याय बना हुआ है । एक फौजी विना किसी पूर्व सूचना के घर पहुँचे थे। पत्नी घर में नहीं थी । वह घास लेने जंगल में गयी थी । वे वहां चले गये । जिस जगह पत्नी घास काट रही थी, उससे थोड़ी दूर पर सिर झुकाकर खड़े हो गये । पी कैप पहन रखी थी । पत्नी की नजर पड़ी । पत्नी चिल्ला पड़ी – पतरौल । आस पास की सारी घसियारिनें भाग पड़ीं । फिर फौजी आगे आए । तब सबकी जान में जान आई ।

पतरौल घसियारिनों की दरांती छीनता है । उनकी जलावन की लकड़ी और पशुओं का चारा छीनता है , पर हमारी नदियों को सदा नीरा रखने वाले और पर्यावरण को संतुलित रखने वाले बांज के पेड़ों को कटने देता है । वन माफिया के आगे वन विभाग खामोश हो जाता है । पतरौल की पतरौली देखती रह जाती है – कैसे पेड़ कटता है ? कैसे उस पर बने घोंसले छिटक कर दूर जा गिरते हैं ? उनमें रह रहे बच्चों की चीं चीं का शोर कैसै इन घसियारिनों का हृदय विदीर्ण करता है ? पतरौल तब गूंगा और बहरा हो जाता है ।

घसियारिन जब घास काटतीं हैं तो ध्यान रखतीं हैं कि घास के साथ कोई छोटा पौधा न कट जाए । यही पौधा कल पेड़ बनेगा । कल यही पेड़ उसे जलावन की लकड़ी देगा । उसके पशुओं को चारा देगा । वन होगा तो वाजूबंद और न्योली जैसे गीत भी होंगे । ये गीत इन्हीं वनों की उपज हैं । ये गीत वनों की गहनता में हीं गाए जाते हैं । हमने तो कभी इन्हें देहरादून शहर में किसी को गाते नहीं सुना ।