नंगे लोगों का समाज पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है

नंगे लोगों का समाज पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है

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Kavita Krishnapallavi
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बंद और बीमार समाजों में ही नहीं, काफ़ी हद तक अपेक्षतया खुले माने जाने वाले बुर्जुआ समाजों में भी लोग कपड़ों को साथ चरित्र या भूमिका पहने हुए होते हैं I मार्क ट्वेन ने अपने ख़ास मज़ाकिया अंदाज़ में ठीक ही कहा था,” कपड़ों से इंसान बनते हैं, नंगे लोगों का समाज पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, या कोई प्रभाव नहीं पड़ता I” और समाज में सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने और किन लोगों को किसतरह और कितना प्रभावित कर पाते हैं ! बचपन से हमारा दिमाग इसीतरह अनुकूलित किया जाता है I

लगातार हम लोगों के बाह्य आचरण और रूप से प्रभावित होते हैं और अपने बाह्य आचरण और रूप से प्रभावित करने की कोशिश करते रहते हैं ! कालान्तर में औपचारिकता का यह खेल ही हमारे जीवन का उत्सव बन जाता है ! हम अपनी अंतरात्मा के बारे में, अपनी चाहतों, उड़ानों और फंतासियों के बारे में सोचना ही छोड़ देते हैं और दूसरों से भी ऐसी अपेक्षाएँ नहीं करते I हम मानवीय सार-तत्व के बारे में सोचना छोड़ देते हैं, कभी-कभी तो उससे सर्वथा अपरिचित ही पूरा जीवन बिता देते हैं ! यानी सभ्यता हमारे लिए कपड़ों तक सिमट कर रह जाती है ! यूँ कहें कि कपड़े ही सभ्यता का मूर्त रूप बनकर रह जाते हैं ! यानी मनुष्य का मतलब होता है, कपड़ों में विचरण करता जानवर ! (वैसे भी, बिना कपड़ों के, उसका आचरण पाशविक ही होता है, उसमें कुछ भी मानवीय या काव्यात्मक नहीं होता !)

बंद समाजों में नग्नता और शारीरिक मुक्तता को लेकर तमाम रूढ़ियाँ, ग्रंथियाँ और रुग्णमानस पूर्वाग्रह होते हैं ! वास्तव में यह एक व्यंजनात्मक और लक्षणात्मक स्थिति है I जो समाज मानववाद और जनवाद के तत्वों से ऐतिहासिक तौर पर रिक्त रहा हो और जहाँ दिमागों का ‘डीकोलोनाइजेशन’ अभीतक न हो सका हो, वहाँ के कुलीन-भद्र नागरिक, ख़ास तौर पर उच्चमध्यवर्गीय सवर्ण और पुरुष, और आम तौर पर सभी स्त्री-पुरुष नागरिक, अपनी नग्न आत्माओं से कभी भी साक्षात्कार नहीं कर सकते ! वे अगर अपनी नंगी आत्मा या ज़मीर से कभी अकेले में भी मिल लें तो शर्म से डूब मरें ! आश्चर्य नहीं कि ऐसे ही समाजों में प्रगतिशीलता और जनवाद के नाम पर हमें सबसे घृणित और कायराना पाखण्ड और दुरंगेपन के दर्शन होते हैं I ऐसे समाजों का नागरिक जीवन में हर कहीं पारदर्शिता से डरता और घबराता है ! और इस डर और घबराहट के मौजूद रहते वह कभी भी अपनी और समाज की मुक्ति के बारे में स्वस्थ और साहसिक ढंग से सोच नहीं पाता ! वह कभी भी फंतासियों और सपनों के साथ यथार्थ की बहुरंगी मिलावट करने वाला कीमियागीर नहीं बन पाता I वह यदि कविता लिखता है तो उसकी कविताएँ पाखंडपूर्ण और बनावटी होती हैं, उबाऊ और बेचेहरा होती हैं ! उसके जीवन में कविता का प्रवेश कभी नहीं हो पाता ! कभी कविता आती भी है तो अन्दर की आवाज़ें सुनकर दरवाज़े पर दस्तक दिए बिना ही उलटे पाँव वापस लौट जाती है !