नेपाल किसी की जागीर नहीं, एक स्वतंत्र राष्ट्र है – भारत की तरह कभी ग़ुलाम नहीं रहा

नेपाल किसी की जागीर नहीं, एक स्वतंत्र राष्ट्र है – भारत की तरह कभी ग़ुलाम नहीं रहा

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इस वाक्य में छिपी ठसक और ग़ुरूर देखिए — “चौकीदार तो नेपाल से भी मंगवा सकते हैं.”

आम आदमी पार्टी की विधायक अलका लांबा के इस ट्वीट में आए ‘मंगवा सकते हैं’ पर थोड़ा ग़ौर कीजिए. ध्वनि निकलेगी — हम मालिक हैं, हमारे पास अथाह पैसा और ताक़त है और हम कहीं से कुछ भी मँगा सकते हैं. और नेपाल से चौकीदारों के अलावा और मँगा भी क्या सकते हैं.

उबले अंडों की दुकान पर शाम को बोतल के इंतज़ार में बैठे बेवड़े भी ऐसे ही बात करते हैं – “अरे, दारू तो हम जितनी चाहे मँगा लेंगे. हमें किस बात की कमी है!”

अलका लांबा को पता भी नहीं चला कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने नेपाल के लोगों के बारे में जो कह दिया उससे विवाद खड़ा हो सकता है. उन्होंने वर्तनी की अशुद्धि के साथ ट्वीट किया – “प्रिय भारतवासियों, कृप्या इस बार प्रधानमंत्री चुनियेगा, चौकीदार तो हम नेपाल से भी मंगवा सकते हैं. नेपाल के चौकीदार चोर नहीं होते.”

लांबा को लगता है कि हम, यानी भारत, चौकीदारों की सप्लाई का ऑर्डर करेंगे, नेपाल चौखट पर खड़े दरबान की तरह सिर झुकाएगा और अगले ही दिन हमारे यहाँ नेपाली चौकीदारों की लाइन लग जाएगी? वो भूल गईं कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है – भारत की तरह कभी ग़ुलाम नहीं रहा — और वो भारत और चीन के बीच एक आज़ाद मुल्क है और अलका लांबा के लिए चौकीदारों की सप्लाई नहीं करता.

अलका लांबा पढ़ी लिखी हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष रही हैं. सुलझी हुई लगती हैं. पर उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि नेपाल में सिर्फ़ चौकीदार ही नहीं होते. वहाँ आइटी प्रोफ़ेशनल, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक, एक्टर, ब्यूटी क्वींस, संगीतकार आदि भी होते हैं. वहाँ चौकीदार, सफ़ाई कर्मचारी, मज़दूर, किसान और दूसरे मेहनतकश भी होते हैं जैसा कि दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक या केरल में होते हैं.

अलका लांबा को ये भी जानना चाहिए कि नेपाल के लोग ठीक वैसे ही रोज़गार के लिए दूसरे देशों में जाते हैं जैसे हिंदुस्तान में पंजाब, गुजरात, राजस्थान या केरल आदि राज्यों से लोग टैक्सी चलाने, सफ़ाई करने या कारख़ानों में काम करने के लिए, गल्फ़, कनाडा, अमरीका, ब्रिटेन, इटली या फ़्रांस जाते हैं. लांबा का बयान ऐसा ही है जैसे डॉनल्ड ट्रंप कहें -चलो जल्दी से कुछ इंडियंस को मँगाओ, न्यूयॉर्क शहर में बहुत गंदगी हो गई है.

पर नेपाल को अपनी जागीर समझने वाली अलका लांबा अकेली नहीं हैं. उन्होंने अपनी ग़लती का एहसास करके ये ट्वीट ज़रूर मिटा दिया है पर इससे वो मानसिकता नहीं मिट सकती जो नेपाल को भारत का ताबेदार समझती है. नेपाल के लोगों को इस बात का अच्छी तरह एहसास है कि उत्तर भारत में नेपाल को अपनी जायदाद समझने वाले काफ़ी लोग हैं.

पिछले महीने काठमांडू से दिल्ली आ रही एअर इंडिया की फ़्लाइट में मेरे साथ बैठे एक भारतीय मुसाफ़िर ने जब बीयर माँगी तो फ़्लाइट अटेंडेंट ने एक चौड़ी सी प्लास्टिक मुस्कान के साथ जवाब दिया, “सर, ये डॉमेस्टिक फ़्लाइट है इसमें हम बीयर सर्व नहीं करते.”

मैं उस अटेंडेंट से पूछना चाहता था कि नेपाल जाने वाली फ़्लाइट कब से डॉमेस्टिक या घरेलू उड़ान हो गई? कब से नेपाल को आपने भारत में शामिल कर लिया, डूड?


नेपाल किसी की जागीर नहीं
नेपाल एक स्वतंत्र देश है जहाँ का अलग संविधान, अलग प्रधानमंत्री, अलग संसद और अलग सेना है. पर एक स्वतंत्र देश से दूसरे स्वतंत्र देश के बीच आ रही फ़्लाइट को जैसे वो फ़्लाइट अटेंडेंट घरेलू उड़ान मानकर चल रहा था उसी तरह आम आदमी की पार्टी की विधायक अलका लांबा को भी लगता है कि “चौकीदार तो हम नेपाल से मँगा लेंगे.”

नेपाल के त्रिभुवन हवाई अड्डे में तैनात वो नेपाली इमिग्रेशन अफ़सर शायद ऐसे कई भारतीयों से मिलता रहा होगा जिसने मुझ पर कटाक्ष किया — “तपाईँ को मुलुक ठुलो, र तपाईँ को जुंगापनि ठुलो” यानी तुम्हारा देश भी बहुत बड़ा है और तुम्हारी मूछें यानी अहम (अहंकार) भी बहुत बड़ा है. फ़्लाइट में कई घंटे की देरी होने पर मैं उस अफ़सर से शिकायत करना चाह रहा था पर वो अधिकारी भरा बैठा था.

नेपालियों को वाक़ई लगता है कि भारत बड़ा मुल्क है इसलिए भारतीयों का अहम भी बहुत बड़ा है. कई बार भारतीयों को ये एहसास ही नहीं होता कि नेपाल के बारे में जो कुछ कह या सोच रहे हैं वो नेपाल के लोगों को पसंद नहीं आता. उनका मासूम सवाल होता है कि हम तो नेपाल को अपना मानते हैं फिर क्या समस्या है

काठमांडू पहुँचने के तुरंत बाद मैंने भी ऐसी ही उत्तर भारतीय नादानी में नेपाली साथियों से कहा – नेपाल बिल्कुल घर जैसा लगता है. बिना एक पल गँवाए बातचीत में शामिल एक नेपाली साथी ने तुरंत कहा – “हाँ, आपके प्रधानमंत्री मोदी जी भी ऐसा ही कहते हैं.”

मुझे तुरंत समझ में आ गया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की पहली यात्रा के दौरान जो नेपाली नागरिक मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए सड़कों पर उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े थे वो आज क्यों मोदी का ज़िक्र आते ही सवालों की झड़ी क्यों लगा देते हैं.

इस तरह के वाक्यों से नेपाल के लोगों को लगता है कि भारतीय लोग नेपाल के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे अपनी छत्रछाया में रखना चाहते हैं. धुर आज़ाद ख़याल नेपालियों को भारतीयों की ऐसी मोहब्बत क़तई पसंद नहीं आती. बल्कि इसमें उन्हें ‘सांस्कृतिक विस्तारवाद’ की बू आती है

तीन महीने तक काठमांडू में रहकर काम करने और नेपाल के कई शहरों और गाँवों में घूमने के बाद मुझे एक बार नहीं कई बार ऐसे सवालों का सामना करना पड़ा. बसों में, दुकानों में, होटलों में, सड़क पर बातचीत करते लोगों ने मुझसे बार बार एक ही सवाल किया – मोदी जी ने हमें ख़ून के आँसू रुला दिए, मगर क्यों?

 

नेपाल के लोग, ख़ास तौर पर पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले लोग 2015 के उन दिनों को भूले नहीं हैं जब नरेंद्र मोदी सरकार ने नेपाल की ‘अघोषित आर्थिक नाकेबंदी’ कर दी थी और लोग पेट्रोल, डीज़ल, गैस जैसी चीज़ों के मोहताज हो गए थे.

कई लोग अपनी कारों और मोटरसाइकिलों को ताला लगाकर साइकिल ख़रीदने पर मजबूर हो गए थे. पर नेपाल की नाकेबंदी कोई पहली बार नहीं हुई थी राजीव गाँधी जब प्रधानमंत्री थे तब भी भारत ने नेपाल का घेराव किया था.

काठमांडू से कुछ दूर चितलांग गाँव में पोखरा से अपने छात्र-छात्राओं के साथ आए एक अध्यापक ने मुझसे पूछा – नाकेबंदी करके क्या मोदी जी हमें जानबूझ कर चीन की ओर नहीं धकेल रहे हैं? मैं क्या जवाब देता.

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राजेश जोशी
संपादक, बीबीसी हिंदी रेडियो

 

https://www.youtube.com/watch?v=0eSfLGAgxeY