‘लंदन तोड़ सिंह’,,,ये थे भारतीय कम्युनिस्ट आँदोलन के नेता कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत : जन्मदिन पर विशेष

‘लंदन तोड़ सिंह’,,,ये थे भारतीय कम्युनिस्ट आँदोलन के नेता कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत : जन्मदिन पर विशेष

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Arun Maheshwari
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देश पर तब अंग्रेज़ों की हुकूमत।कलेक्टरेट के कार्यालय पर तिरंगा झंडा फहराने का निर्णय होता है।
एक छोटे से 15 साल के लड़के को झंडा फहराते देख कर भारतीय कलेक्टर गोली चलाने से रोकने का हुक्म देता है।
तिरंगा झंडा फहराने के बाद जब उसे पकड़ा गया तो मजिस्ट्रेट ने सजा सुनाई 1 साल
उसने कहा बस एक साल ?
उसने कहा 4 साल !!
उसने कहा बस चार साल ?
उसने कहा: अब इससे ज्यादा इस कानून में हो नहीं सकती !!”
इसी अदालत में उससे जब उनका नाम पूछा गया था तो उन्होंने बताया था; लंदन तोड़ सिंह !

ये थे भारतीय कम्युनिस्ट आँदोलन के नेता कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत।आज उनके जन्मदिन पर उनकी स्मृतियों को नमन :

जंगे-आज़ादी की मुँह-जुबानियां

-सरला माहेश्वरी

जेएनयू परिसर का कन्वेंशन हॉल
बिपन चन्द्रा की याद में
मना रहा था
जश्ने-आज़ादी
या फिर एक बार
जी रहा था, लड़ रहा था
जंगे-आज़ादी
कहने की आज़ादी
सोचने की आज़ादी
मनुवाद से आज़ादी
संघवाद से आज़ादी
भूख और शोषण से आज़ादी

और
मृदुला मुखर्जी सुना रहीं थीं
मुँह-जुबानियॉं
आज़ादी के वीरों की
अपनी अलग कहानियॉं !

अलग-अलग थे रंग जहाँ
थी अलग-अलग धाराएँ
अनायास ही खिल उठा था
दूर क्षितिज एक इन्द्रधनुष यहाँ
सुनने वाले थे सब हैरान
हर वाद्य जुड़ा था एक तान
हर रंग कहता था एक बात
लड़ो, जीतो, पाओ, भोगो
फिर लड़ो, फिर जीतो, फिर पाओ, फिर भोगो
अपने लिये नहीं, देश के लिये
फिर-फिर संघर्षों की धार सनातन
एक राग थी आज़ादी
आज़ादी, आज़ादी !

कुछ भी नहीं था अकेले का
वो सब भी थे साथ हमारे
देखो ! उनसे भी बतियाना
देखो ! उनको भूल न जाना !

परिवारों की अजब कहानी
भाई-भाई में था झगड़ा
देखो तुम तो जेल जा चुके
अब की बार मेरी बारी है !

सरकार तो तब भी वैसी ही थी
जैसी आज हम देख रहे हैं
नेहरू जी की सभा कराने
जब मिली नहीं कोई जगह
तब कम्युनिस्ट सुरजीत ने अपनी
पकी फ़सल के खेत काट कर
उसके लिये जगह बनाई
नेहरूजी की सभा कराई

गांधीजी की भी चिंता थी
बचानी होगी विचारों की आज़ादी
हर क़ीमत देकर भी
कम्युनिस्ट ख़यालों की आज़ादी
कम्युनिस्टों की रक्षा में
नेहरू जी भी चोगा पहन
उतरे थे न्याय की गुहार लगाने
नहीं था कोई मान-अभिमान
सब करते थे दूजे का सम्मान !

तब भेद में यही था अभेद !
सब मुश्किल सवालों के
सहज-सरल जवाब !

आज सुनी जेएनयू के
जश्ने-आज़ादी में
हमने यही कहानी
आओ सब मिल हम दोहराएँ
इसी अभेद की अमर कहानी
आज़ादी, आज़ादी, आज़ादी !