#पुलवामा की पड़ताल : पार्ट 6 : नागपुर की तरफ़ चलते हैं : संघ मोदी से मुक्ति चाहता है

#पुलवामा की पड़ताल : पार्ट 6 : नागपुर की तरफ़ चलते हैं : संघ मोदी से मुक्ति चाहता है

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कम ही लोग मेरी इस बात को सही मानेंगे कि गुजरात दंगों में मोदी का कोई ‘रोल’ नहीं था, दंगों की रुपरेखा/पटकथा प्रवीण तोगड़िया, गोवर्धन झड़पिया, बाबू बजरंगी, जयदीप पटेल, माया कोडनाणी आदि ने लिखी थी, हरेन पांड्या और प्रवीण तोगड़िया के आपसी सम्बन्ध बहुत ‘गहरे’ थे, पंड्या ‘संघ’ के बहुत करीब थे, मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद वहां ‘तोगड़िया’ फैक्टर और मोदी आमने सामने थे, लहर राम मंदिर की चलानी थी, विहिप/बजरंग दल संघ के सहायक संगठन हैं,,,संघ ने अपने सहायक संगठनों के काम बांटे हुए हैं,,,जैसे कि बजरंग दल का काम है, समाज में उत्तेजना, भय पैदा करना, जितना हो सके लोगों को भड़कान,,,,हिन्दू महासभा का काम है ‘कलम’ से ‘इतिहास’ को मिटाना, नए नए प्रसंग, किस्से लिखना, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, सिनेमा घर, सरकारी इमारतें,,,उड़ाने के पत्र/मेल/पेपर आदि,,,विहिप का काम है, संघ के धार्मिक पहचान लिए मुद्दों को ज़िंदा रखना, उन्हें समय समय पर उठाते रहना, प्रदर्शन आदि के ज़रिये,,,और धन एकत्रित करना,,,,,

संघ का अपना काम केवल आदेश देना, लोगों पर कड़ी नज़र रखना, सूचना लेना व् देना, कार्यक्रम बनाना, मंथन, गहन निरिक्षण करना व् राजनैतिक हितों की रक्षा करना है,,,

गुजरात में दंगे हुए, हरेन पांड्या की हत्या कर दी गयी,,,है न कहानी उलझी हुई,,,मगर समझ आ जाएगी,,,गुजरात के दंगे तत्कालीन गुजरात सरकार ने नहीं करवाए थे बल्कि वो ‘संघ’ का काम था, दंगों के बाद जो हालात थे वो काबू नहीं किये गए, हरेन पंड्या उस समय गृहमंत्रालय देख रहा था,,,दंगे शुरू होने के बाद से ख़त्म होने तक ‘मोदी’ एक तरह से ‘विलुप्त/ग़ायब’ थे,,,उनकी सरकार दंगों को रोकने की जगह उन्हें भड़कती रही, सरकार के बड़े अधिकारियों ने प्रदेश में ‘दंगाइयों’ को हथियार/पेट्रोल जो कुछ चाहिए था दिया, मोदी की सुनने को अधिकारी राज़ी नहीं थे, वो सब संघ के साथ थे, इन अधिकारियों की अगुवाई, आदेश हरेन पांड्या से मिल रहे थे,,,हरेन पांड्या डायरेक्ट ‘संघ’ से आदेश प्राप्त कर आगे के आदेश देता था,,,और तब होती है हरेन पांड्या की हत्या,,,,हत्या में सोहराबुद्दीन का नाम भी जोड़ा गया है जो कि ग़लत है, सोहराबुद्दीन 2000 के आसपास ‘D’ से संपर्क में था, वो सिर्फ खदान मालिकों, ठेकेदारों से अवैध वसूली करता था, काम उसका ‘लीगल’ था, सब मिल बाँट कर खाते थे, नेता/अधिकारी/और भाई लोग,,,D को भारत नहीं लाया जाता है या कहें आने नहीं दिया जाता है, सूत्रों के मुताबिक उनके आने के बाद गुजरात, महराष्ट्र, कर्नाटक, राजिस्थान के लगभग सभी नेता उसके साथ में बैठे ‘पत्ते’ या ‘चैस’ खेल रहे होंगे, एक से बड़ा एक सरकारी अधिकारी वहां ‘चिलम’ भर रहा होगा,,,D का कारोबार ‘ख़ौफ़’ पर चलता था, अब तो वो खुद नहीं चल पात होगा,,,जहाँ होगा,,,कहाँ होगा,,,आज तक को पता होगा,,,,डॉन ने सभी मछलियों को समंदर की गहराइयों में सैर करवा रखी है, हम डूबेंगे तो सनम तुम्हें,,,,बाकी आप जानते हैं,,,,

गुजरात के दंगों के शांत हो जाने के बाद ‘मोदी’ ने खुद के हाथ में सरकार की कमान थामी,,,, देखें,,,,,मोदी और तोगड़िया के नंबर आपस में नहीं मिलते, गुजरात में ‘पटेल’ फैक्टर हावी रहता है, मोदी ‘घांची’ हैं, घांची मुस्लमान भी होते हैं और हिन्दू भी,,,पटेल ये पचा नहीं पा रहे थे कि एक घांची कैसे मुख्यमंत्री बन गया,,,गुजरात दंगा पटेल-ब्राह्मणों ने करवाया था,,,

गुजरात का मुख्यमंत्री रहते मोदी अमित शाह की जोड़ी ने आगे चल कर ‘चालाकी’ से काम लिया और खुद पर ‘संघ’ का दबाव न रहे उसका पुख्ता ‘बंदोबस्त’ कर के रखा गया,,,प्रवीण तोगड़िया, मोहन भगवत, इंद्रेश, और जो भी संघ के बड़े नेता हैं की हिम्मत नहीं है कि मोदी से कोई भी बात ‘हड़का कर’ मनवा लें,,,

राजनीती में ‘टोपी’ पहनी और पहनाई जाती है, मोदी ने ‘संघ’ को टोपी पहना दी है, इस समय संघ ‘संकट’ में है, वोह मोदी से मुक्त होना चाहता है, मोदी बीजेपी/संघ/भागवत सबसे बड़ा बन चुके हैं,,,मोदी के पास काम के लोगों की बहुत कमी है, संघ की ‘शै और मात’ से बचने के लिए वो अपने अधिकारियों से काम नहीं करवा पाते हैं, यह भी कह सकते हैं कि ‘मोदी’ खुद को असुरक्षित समझते हैं,,,,,मोदी की ‘असुरक्षा’ की भावना ‘संघ’ के कारण है,,,,

पुलवामा का मामला जांच के बाद जब सामने आएगा अगर जाँच एजेंसियों ने सही दिशा में जांच की तो लोगों के होश उड़ जायेंगे, गुजरात दंगे ‘मोदी’ के लिए लाभकारी साबित हुए और जिन्होंने उन्हें करवाने का काम किया था ‘ठिकाने’ लग चुके हैं,,,

अब तक पूरी दुनियां में आतंकवाद की कोई साफ परिभाषा नहीं बन सकी है। संयुक्त राष्ट्र भी ऐसी परिभाषा बनाने के लिये प्रयत्नशील है। कट्टरवाद, उग्रवाद तथा आतंकवाद एक दूसरे साथ जुडे हुये शब्द है इसलिये विषय कठिन होते हुये भी इस पर चर्चा आवश्यक है, विशेष रूप से वर्तमान स्थिति में जब सारी दुनियां उग्रवाद और आतंकवाद से परेशान होकर उसका कोई न कोई समाधान करने का प्रयास कर रही है।

व्यक्ति से लेकर संपूर्ण समाज तक व्यवस्था की अनेक इकाई होती है। व्यक्ति से लेकर समाज तक के बीच की इकाईयां अंतिम इकाई नहीं होती। किन्तु जब कोई व्यक्ति बीच की किसी इकाई को अंतिम इकाई मानकर उपर की अन्य इकाईयाें का अस्तित्व अस्वीकार कर देता है तब उस व्यक्ति के स्वभाव में कट्टरता शुरू हो जाती है। इस कट्टरता के कारण उस व्यक्ति का सहजीवन सीमित हो जाता है। इसका अर्थ होगा कि वह व्यक्ति अपनी इकाई को अंतिम मानकर उसके साथ अच्छा तालमेल करता है तथा समाज की दूसरी इकाईयों के साथ सामन्जस्य नहीं बिठा पाता है। ऐसी कट्टरता जब दूसरी इकाईयाें से टकराव का कारण बनती है तब व्यक्ति के स्वभाव में कट्टरवाद उग्रवाद में बदल जाता है और जब ऐसा उग्रवाद सामूहिक हिंसा का रूप ले ले तब व्यक्ति को आतंकवादी मान लिया जाता है। कट्टरवाद सिर्फ विचारों तक सीमित होता है, उग्रवाद कभी कभी हिंसा का रूप ले लेता है और आंतकवाद स्थायी रूप से सामूहिक हिंसा के रूप में बदल जाता है। वैसे तो कट्टरवाद कई आधार पर आता है और उग्रवाद तथा आतंकवाद में बदलता रहता है किन्तु वर्तमान विश्व में धार्मिक और राष्ट्रीय आधार पर बढने वाला आतंकवाद ज्यादा खतरनाक हो चुका है। इसकी गति लगातार बढती ही जा रही है और इसका कोई समाधान नहीं दिख रहा है। दुनियां में दो प्रकार के लोग है, बुद्धिजीवी और भावना प्रधान। बुद्धिजीवी लोग आतंकवाद को संचालित करते हुये भी अप्रत्यक्ष रहते है और भावना प्रधान लोग ऐसे बुद्धिजीवियों से प्रभावित होकर आतंकवाद को कार्यान्वित करते है। बुद्धि प्रधान लोग सुरक्षित रहते है और भावना प्रधान लोग सक्रिय होने के कारण प्रत्यक्ष परिणाम भुगतते है। इन दोनो को यह अप्रत्यक्ष गठजोड उग्रवाद और आतंकवाद की रोकथाम में बडी बाधा है क्योंकि बुद्धिजीवी लोग प्रत्यक्ष दिखते नहीं और सारी बागडोर उन्हीं के हाथ में रहती है। किसी समस्या की जड तक पहुॅचे बिना पत्तों तक सीमित रहकर समाधान नहीं होता। इसी तरह क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच भी बहुत अंतर होता है। इन दोनो को अलग अलग ना समझने के कारण भी समाधान खोजना कठिन होता है। कोई व्यक्ति स्वतंत्रता संघर्ष में लगा है या आतंकवाद में यह अंतर करना भी कठिन होता है।

हम वर्तमान भारत की समीक्षा करे तो धर्म के नाम पर भारत में लगभग नब्बे प्रतिशत हिन्दू धार्मिक कट्टरवाद से प्रभावित है। उन्हें बचपन से ही कुछ इस प्रकार की संगठनात्मक शिक्षा दी जाती है कि वे अपने धार्मिक संगठन को ही समाज से उपर मानना शुरू कर देते है। इतना ही नहीं वे दुनियां बदलने को अपना पहला लक्ष्य मान लेते है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये ये निरंतर सक्रिय है और इन्हीं कट्टरवादी में से बडी संख्या मे लोग उग्रवादी हो जाते है जो हिंसा पर विश्वास करते है। ऐसे लोग भारत की लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था की अपेक्षा अपनी धार्मिक संगठनात्मक व्यवस्था को अधिक महत्व देते है। ऐसेे ही उग्रवादी में से कुछ अति भावना प्रधान लोग आतंकवाद की तरफ चले जाते है। आमतौर पर जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है उनमें साहस बहुत अधिक होता है इसलिये कुछ लोग रोजगार के आधार पर भी आतंकवाद की तरफ बढ जाते है।

संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल आदि के नाम पर संगठित लोग उग्रवाद की दिशा में बढ रहे है। ऐसे लोगो ने पिछले पांच दस वर्षो में आतंकवाद की दिशा में बढने का प्रयास किया लेकिन इनकी सच्चाई सामने आने के कारण हिन्दू आतंकवाद आगे नहीं बढ सका। इसका एक कारण यह है कि आमतौर पर हिन्दू कट्टरवादी नही होता बल्कि यदि कायरता और कट्टरता में से एक का चुनाव करना हो तो वह मुसलमानों के ठीक विपरीत कट्टरता की जगह कायरता को चुनना अधिक पसंद करता है। मैं मानता हूॅ कि कट्टरता और कायरता के बीच क्या उचित है यह कहना वर्तमान में कठिन है लेकिन हिन्दू और मुसलमान के बीच यह कायरता और कट्टरता का अंतर साफ देखा जा सकता है। भारत में धार्मिक आतंकवाद की जो भी घटनाएं होती है उनमें संघ का हाथ है। संघ परिवार के लोग कट्टरवाद तक ही सीमित नहीं है और आशिंक रूप से उग्रवाद की तरफ भी चले जाते है

उग्रवादियों मेें से कुछ भावना प्रधान लोग नक्सलवाद के चंगुल में फंस जाते है

कट्टरवाद, उग्रवाद और आतंकवाद में मूलभूत अंतर होता है। कट्टरवाद अपने आंतरिक विचारो तक सीमित होता है। उग्रवाद हिंसक टकराव में बदल जाता है और आतंकवाद एक पक्षीय हिंसा में। एक मूलभूत फर्क और होता है कि उग्रवादी अपने निश्चित लक्ष्य पर आक्रमण करता है तथा असंबद्ध लोगो को मारने में उसकी कोई सक्रियता नहीं होती। आतंकवादी इस बात की परवाह नहीं करता कि मरने वाला कौन है? वह असंबद्ध लोगो को भी मारना कर्तव्य मानता है। ऐसा आंतकवादी चाहे धार्मिक हो या नक्सलवादी किन्तु अधिक से अधिक हत्या करना उसका उददेश्य होता है इसलिये आतंकवाद को वर्तमान समय में सबसे बडी समस्या माना जा रहा है क्योंकि उसमें असंबद्ध लोग ही अधिक मारे जाते है।

संघ कानून को नहीं मानता है, वो किसी संविधान को नहीं मानता है, संघ का अपना ‘भविष्य’ का संविधान तैय्यार है, कोई भी ट्रैन ‘बाहर’ से कभी नहीं जाई जा सकती है, ट्रैन के डिब्बे में केवल और केवल अंदर से ही आग लग सकती है, ‘गोधरा’ शब्द को ध्यान में रखना,,,,पुलवामा का आतंकी हमला ‘शक’ के आगे की तरफ जाता है, हरेन पांड्या की हत्या किसने की ‘आज’ तक उसका खुलासा नहीं हुआ है जबकि उसके हत्यारे आज भी ज़िंदा हैं, पुलवामा की पड़ताल जारी रहेगी,,,,आप ये समझलें की एक ‘चोर’ है एक ‘चोर’ का ‘बाप’ और ये झगड़ा बाप बेटे के बीच का है,,,बेटा खुद को काबिल समझता है ‘बाप’ अपने आप को,,,बाप शातिर है/अपराधी है/मानसिक रोगी है/,,,,,पुलवामा की घटना को अंजाम देने वाला कोई ‘पागल’ ही है ये तो पकका है…… परवेज़ ख़ान