जो लीक से हट के चले हैं उसे दुनियां ने अवश्य मृत्यु दण्ड दिया है

जो लीक से हट के चले हैं उसे दुनियां ने अवश्य मृत्यु दण्ड दिया है

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Er S D Ojha
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चार्वाक – लोकायत दर्शन के प्रणेता

चार्वाक बृहस्पति के शिष्य और लोकायत ( नास्तिक ) दर्शन के प्रणेता थे । इस दर्शन के हिमायती बृहस्पति भी थे । कई बार ईश्वर के प्रति बृहस्पति ने भी प्रतिकूल टिप्पणी की है , लेकिन ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठा के जो तीक्ष्ण प्रतिरोध चार्वाक ने किया वह बेमिशाल था । चर्वाक ईश्वर के अस्तित्व को हीं सिरे से खारिज करते थे । उनका कहना था – पीली मिट्टी, गोबर व दही के सयोंग से जब बिच्छू की सृष्टि हो सकती है तो बिना भगवान के शेष सृष्टि की भी रचना हो सकती है । जैसे पान, सुपारी, कत्था व चूना के मिश्रण से होठ लाल हो सकता है तो चेतना शून्य घटक तत्वों में भी चेतनता अपने आप आ सकती है । इसके लिए किसी भगवान विशेष की जरूरत नहीं है ।

जड भूतविकारेषु चैतन्यं यत्तु दृश्यते ।
ताम्बुल पूग चूर्णानां योगाद् राग इवोत्थिम ।।

चर्वाक के कहने का मतलब यह था कि प्रत्यक्ष हीं प्रमाण है । जिस चीज का प्रमाण नहीं उसका अस्तित्व भी नहीं होना चाहिए । आत्मा का देह से परे कोई अस्तित्व नहीं है । आदमी मरा, जला तो अब उसका पुनर्जन्म कैसा ? यह शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि व हवा चार तत्व से बना है । चर्वाक का कहना था कि आकाश नाम का कोई तत्व नहीं होता । आकाश तो शून्य होता है । स्वर्ग नरक जैसी कोई चीज नहीं होती । स्वर्ग और नरक के फेर में पड़ के मनुष्य अपने इह लोक को बर्बाद कर रहा है ।

न स्वर्गो न पवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिक: ।
नैव वर्णाश्रमादीनाम् क्रिमश्चफलदेयिका ।।

चर्वाक के अनुसार इस दुनिया में जब तक जीना है, सुख से जीना है । यदि कर्ज भी लेना पड़े तो भी घी पीना है जब मरने के बाद इस शरीर के जला कर भस्म कर दिया जाना है । फिर तो इस दुनियाँ में आना हीं नहीं है ? इसलिए जब तक जीना है, जिंदगी को भरपूर जीना है .

यावत् जीवेत सुखम् जीवेत् .
ऋणं कृत्वा घृतम् पिवेत ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ?

चार्वाक के समय तक केवल तीन वेद हीं लिखे गये थे । उन तीन वेदों के प्रति भी चार्वाक के नज़रिया अच्छा नहीं था । उनका कहना था कि इनके रचयिता धूर्त प्रवृति के निशाचर थे । दुनियां को मूर्ख बनाने के लिए पाप पुण्य, दान पुन्य ,स्वर्ग नरक का भरम फैलाया गया है ।

त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्ड धूर्त निशाचरा: ।
जर्फरी तुर्फरीत्यादि पण्डितानाम् वचः स्मृतम् ।।

चर्वाक के अनुसार अन्तिम सत्य मृत्यु है । जिसे मोक्ष की चाह है उसे मृत्यु का इंतज़ार करना पड़ेगा । मृत्यु हीं मोक्ष है । पशु बलि का वे घोर विरोधी थे । वे कहते थे कि जिसे पुण्य कमाना है वह क्यों नहीं अपने बाप का बलि देता ? निरीह पशु के बलि देने से क्या होगा ? चर्वाक के विचार आज के ज़माने से मिलते थे । चर्वाक पैदा आज से हज़ारों साल पहले हुए थे, पर उनके विचार आज के परिपेक्ष्य के अनुसार विल्कुल सही थे ।

यह बहुत हीं त्रासदिक है कि इस विचारक का लिखा कोई भी ग्रन्थ आज कहीं उपलब्ध नहीं है । उनके ये विचार कहीं कहीं दूसरे धर्म ग्रन्थों में मिल जाते हैं । तथाकथित पण्डितों ने उनके द्वारा रचित ग्रन्थ को नष्ट कर दिया था । यहां तक कि इस विचारक को युधिष्ठिर जैसे महान् सत्यवादी के सामने पीट पीट के मार दिया गया था । संसार में गैलीलियो, कोपरर्निक्स, ब्रूनो, सुकरात आदि जो लीक से हट के चले हैं उसे दुनियां ने अवश्य मृत्यु दण्ड दिया है ।