और हमेशा की तरह हमने उस ‘कॉर्पोरल हसन’ को भुला दिया जो एक नायाब हीरे की तरह थे

और हमेशा की तरह हमने उस ‘कॉर्पोरल हसन’ को भुला दिया जो एक नायाब हीरे की तरह थे

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इस वक्त दुनिया के सारे मुसलमान परेशान है कहीं भी सुकून नहीं किसी को कुल चैन नहीं हिंदुस्तान की बात करें तो ये बात आलम आशकार है कि यहां के मुसलमान खौफ व दहशत के साए में हैं और उनकी खुद एतमादी बुरी तरह डगमगा चुकी है, इस्लामी शाओर तक खतरे में हैं सियाशत की आमद ने उनके मसाइल को मज़ीद उलझा कर रख दिया है, लोग लीडरान को भला कह रहे हैं अपने दिल कि भड़ास निकाल रहे हैं तानों और तंज़ो के तीर बरसा रहे हैं उन्हें ऐसा लगता है कि यह हरबे मुसलमानों कि अज़मत रफ्ता कि वापसी करा देंगे मगर वोह ये नहीं सोचते (कमा तकूनून कज़ालिक यौमर अलैइकुम)

जैसे तुम्हारी ज़िंदगी गुज़रेगी वैसे ही हुक्मरान तुम पर मुसल्लत किए जाएंगे इस उन्वान की कई हदीसें ज़खीरे में मौजूद हैं जिनमें से बाज़ पर अगरचे कलाम हुआ है मगर काबिल इस्तदलाल ज़रूर हैं (मिश्कात शरीफ की एक तवील हदीस है) ये भी ख्याल रहे कि यह हदीस कुदसी है ज़बान हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि ने फरमाया अल्लाह का फरमान है कि मैं ही तुम्हारा माबूद हूं मैं बादशाहों का मालिक हूं बादशाहों का बादशाह हूं बादशाहो के दिल मेरे कब्ज़े में हैं जब तक बंदे मेरी इताअत में लगे रहते हैं मैं उनके बादशाहों के दिलों के शफ्कतों और मोहब्बतों के साथ आवाम की तरफ मोड़ देता हूं और जब बंदे मेरी नाफरमानी पर उतर आते हैं तो मैं उनके बादशाहों के दिलों को सख्त और गज़बनाक बनाकर आवाम की तरफ मोड़ देता हूं नतीजा यह कि बादशाह उन्हें सख्त सज़ाएं देते हैं लिहाज़ा तुम बादशाहों को बद्दुआ देने में अपना वक्त ना लगाओ बल्कि मेरी याद और खुशू खुज़ू के साथ इबादत में अपने आपको झोंक दो ताकि इन बादशाहों के शर से तुम्हें बचा सकुं।

ये हदीस साफ-साफ कह रही है कि जब तक मुसलमान सद फीसद मुसलमान नहीं हो जाएंगे उन पर तंद खू बद एक अख़लाक़ ज़ालिम और संगदिल हुक्मरान मुसल्लत होते रहेंगे मुसलमानों कि मौजूदा हालत देख कर ये पेश गोई करना कतई दुश्वार नहीं कि अहले इस्लाम के अच्छे दिन अभी नहीं आएंगे क्योंकि हम अयाना देख रहे हैं कि पानी सर से ऊंचा होने के बावजूद मुसलमानों में बिगाड़ बढ़ता ही जा रहा है उनकी सरकशी में रोज़ इज़ाफ़ा है मस्जिदें अब भी वीरान हैं गफलत कोशी और खोर मस्तियां अब भी उरूज पर हैं फितरत से बगावत और अल्लाह या रसूल से इनहराफ में भी कोई कमी नहीं इसलिए मेरा यकीन है कि अगले दौर में भी येही सरकार की ही फतेह होगी अगर उसकी हुकूमत ना भी बनी तो तख्ते ताउस पर जो भी जमात आएगी वह मज़ीद तबाही मचाएगी।

लोग बिलावजह हुक्काम को बद्दुआएं दे रहे हैं बद्दुआ तो खुद को देनी चाहिए कि इतना कुछ होने के बावजूद मुर्दा ज़मीरी हनुज़ नहीं गई

हम जब तक अपने अमाल नहीं सुधारेंगे फिर चाहे कोई मुस्लिम ही ना हमारा हुक्मरान हो हमारे हाल ऐसे ही रहेंगे

#बेमिसाल__तुर्क__पोस्ट__1

12 मई 1972 की तारीख़ और जुमा का दिन था मै अपने पत्रकार साथी ‘सैद तेरज़ियोगलु’ के साथ इस्राईली गाईड़ की मदद से पवित्र अल अक़्सा मस्जिद की ज़ियारत कर रहा था।

तब ही मैने मस्जिद ए अक़्सा के आहते के सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर एक शख़्स को देखा, वोह क़रीब 2 मीटर लंबे क़द का मालिक था, उसने एक सिपाही के हिसाब से कपड़े पहन रखे थे, वह बुढ़ा ज़ईफ़ था, पर वह बेहद सतर्क और हिम्मत से खड़ा था, मै उसके चेहरे को देख कर डर सा गया, उसके चेहरे पर कई तरह के निशानात थे।

मैने अपने बग़ल में मौजुद इस्राईली विदेश मांत्रालय में काम करने वाले ‘यूसुफ़’ जो के इस्तंबुल के रहने वाले थे; से पुछा के यह शख़्स कौन है

उन्होंने जवाब दिया मुझे नहीं पता, होगा कोई पागल, यह शख़्स अकसर यहाँ खड़ा रहता है, ना तो किसी से कुछ बोलता है, ना ही किसी से कुछ मांगता है यहां तक के किसी को देखता भी नही है

मुझे नहीं पता क्यूँ, लेकिन मैं उसके पास गया और तुर्की ज़बान में पुछा – अस्सलाम व अलैकुम बाबा यह सुन कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई, जैसे ऐ़ैसे सवाल की उसे उम्मीद और अपेक्षा नहीं थी, उसने जवाब में कहा : वालैकुम अस्सलाम ओगुल (बेटा)

मैं हैरान था, मैने उनकी हाथों को चुमा, और पुछा – आप कौन हैं ?

उसने कहा – इससे पहले के मैं अपने बारे में कुछ बताऊँ, तुम्हें यह जानना चाहीए के सलतनत उस्मानिया ने 401 साल, 3 महीने, 6 दिन तक क़ुदुस (येरुशलम) पर हुकुमत की; और रविवार 9 दिसंबर 1917 को उन्हें फ़लस्तीन छोड़ कर जाना पड़ा, वैसे भी सलतनत उस्मानिया ख़त्म होने के कगार पर था, पर उस वक़्त भी एक स्क्वाड्रन अल अक़सा मस्जिद में मौजूद था, जिसका काम मस्जिद को अंग्रेज़ी फ़ौज के हांथो लुटने से बचाना था जो शहर में दाख़िल होने वाले थे और मैं कॉर्पोरल हसन, 20वीं कॉर्प, 36वीं बटालियन 8वीं स्क्वाड्रन की हेवी मशीनगन टीम से हूँ; जिसे 9 दिसम्बर 1917 को मस्जिद ए अक़्सा की पासबानी के लिए तैनात किया गया था।

उनकी बात सुन कर मै दंग रह गया और मेरे मुह से निकाल – या ख़ुदा! मैंने उनकी जानिब देखा, उनका सर किसी ऊंची इमारत की मानिंद था; जिस पर मानो गर्व से झंडा लहरा रहा हो, मैने उनके हाथ को वापस चुमा।

तब उन्होने मुझसे कहा – क्या तुम मुझ पर एक एहसान करोगे बेटा मेरी एक ख़्वाहिश है, जिसे मैने कई सालों से इसे छिपा कर रखा है, क्या तुम उसे मेरे लिये पुरा कर सकते हो

मैने कहा : ज़रुर, हुक्म तो कीजिए

जब तुम अपने मुल्क (तुर्की) वापस जाओ और टोकट संजक (प्रांत है) से गुज़र हो तब वहां जाना और जा कर मेरे कमांडर को ढुंडना; जिसने मुझे यहां तैनात किया था। कैप्टन मूसा नाम है उनका! जब वो मिले तो मेरी जानिब से उनके हाथों को चूमना और कहना तुर्की के इगदिर प्रांत का कॉर्पोरल हसन जो के 11वीं मशीनगन बटालियन में था; वह आज भी वहीं तैनात है जहाँ आपने उसे छोड़ा था, वह आज भी उसी पोस्ट पर अपनी सेवा दे रहा है।

ये सुनते ही मेरी धड़कन मानो रुक सी गई। मै थरथर कापने लगा। मुझे समझ मे ही नही आ रहा था के क्या जवाब दुं, मेरे गले ने मुझे धोखा दे दिया।

ये बात 57 साल से लगातार मोर्चे पर तैनात एक अज़ीम उस्मानी सिपाही ‘हसन’ तुर्की के मशहुर इतिहासकार ‘इल्हान बर्दाक्ची’ से कह रहा था।

इतिहासकार ‘इल्हान बर्दाक्ची’ ने इस हादसे का ज़िक्र तुर्की के राष्ट्रीय टीवी चैनल पर किया। कई वर्ष बाद तुर्की के सेना प्रमुख ने यह फ़ैसला किया है के वह ‘इल्हान बर्दाक्ची’ की मदद से ‘हसन’ नाम के उस अज़ीम सिपाही की खोज करेंगे।

बर्दाक्ची ने बाद में लिखा -कॉर्पोरल हसन हम में से ही एक थे, उसकी क़िस्मत उसे भूल चुकी थी, यक़ीनन हु बा-हु कुछ ऐसा ही हुआ था, हम लोगों ने कभी भी उसे खोजने की कोशिश नहीं की, वह नायाब था, वह एक दरख़्त की तरह थे जो अपने अच्छे कर्म करते हुए अपने जीवन में ऊंचा उठते जा रहे थे, वह दरख़्त की तरह आसमान की तरफ़ बढ़ते जा रहे थे, और हम उनके सामने छोटे छोटे घांस के बराबर थे, हमें बस चीज़ें भूलनी आती हैं, और हमेशा की तरह हमने उस ‘कॉर्पोरल हसन’ को भुला दिया जो एक नायाब हीरे की तरह थे।

साल 2017 में ही ग़ाज़ा में एक मस्जिद खोली गई जिसका नाम बैतुल मुक़द्दस – मस्जिद ए अक़्सा के एक मुहाफ़िज़ के नाम पर “कॉर्पोरल हसन मस्जिद” रखी गई।

ज्ञात रहे के 12वीं सदी में सलीबयों (क्रुसेडर) के हमले के बाद येरुशलम (फ़लस्तीन) 9 दिसम्बर 1917 को पहली बार किसी गैर-मुस्लिम के हांथ मे गया था।

प्रथम विश्व युद्ध मे इंगलैंड ने ईमान फ़रोश मुस्लिमों की मदद से उस्मानियों को फ़लस्तीन मे हरा दिया था

11 दिसम्बर 1917 को पहली बार गैर मुस्लिम फ़ौज येरुशलम में दाख़िल हुई थी!

बेमिसाल__तुर्क__पोस्ट__2

29 मई 1453 को दुनिया मे एक ऐसा वाक़्या पेश आता है जिससे पूरी दुनिया की तारीख़ ही बदल जाती है यानी 21 साल के नौजवान क़ैसर-ए-रोम सुलतान मोहम्मद दोएम के ज़रिया कुस्तुन्तुनिया का महासरा कर लिया जाता है, ये फ़तह 57 दिन के उतार चढ़ाओ की जँग के बाद नसीब होती है.. इसके बाद जो हुआ वो तारीख़ है 1500 साल से चली आ रही बाइजेण्टाइन साम्राज्य (रोमन साम्राज्य) हमेशा के लिए ख़त्म हो जाती है।

असल मे सुल्तान मुहम्मद II और उनके इस फ़तह की पेशनगोइ हुजूर ए अकरम ताजदार ए मदीना नबी ए रहमत अल्लाह के महबूब (सल्लल्लाहु व अलैही वसल्लम) ने अपनी एक हदीस (मसनद अहमद) में काफ़ी पहले कर दी थी :- “निश्चित ही तुम क़ुस्तुनतूनिया फ़तह करोगे; वो एक बहुत अज़ीम सिपहसालार होगा और उसकी बहुत अज़ीम फ़ौज होगी।

इस तरह उन्दलुस (स्पेन) के ज़वाल के बाद पहली बार उस्मानी फ़ौज को यूरोप में घुसने का रास्ता मिलता है और बालकन (सर्बिया, बोसनिया, अलबानिया) के इलाके़ ‘क्रीमिया’ व इटली के ओरंटो पर उस्मानियों का क़ब्ज़ा हो जाता है।

इस तरह यूरोपियों के पूर्व (चीन, भारत और पूर्वी अफ़्रीक़ा) के व्यापार का रास्ता (समुंद्री और ज़मीनी) पूरी तरह से मुस्लिम हाथों में चला जाता है और समूचे मध्य-पूर्व पर मुस्लिम शासकों का कब्ज़ा हो जाता है। पूर्व (चीन, भारत और पूर्वी अफ़्रीक़ा) से आने वाले रेशम, मसालों और आभूषणों पर अरब और अन्य मुस्लिम व्यापारियों का कब्जा हो गया था – जो मनचाहे दामों पर इसे यूरोप में बेचने लगे।

फ़तह क़ुस्तुन्तुनिया के बाद ख़िलाफ़ते उस्मानीया की राजधानी एदिर्न (Edirne) से हटाकर क़ुस्तुन्तुनिया ला दी गयी। फ़तह के पहले और बाद में कई यूनानी एवं अन्य दानिशवर लोग कु़स्तुन्तुनिया छोड़कर भाग निकले। इनमें से ज़्यादातर इटली जा पहुँचे जिससे यूरोपीय पुनर्जागरण को बहुत ताक़त मिली और योरप के लोग जागरुक होने लगे और इसके बाद स्पेनी और पुर्तागली (और इतालवी) शासकों को मशरिक़ (पूर्व) के रास्तों की बैहरी (सामुद्रि) जानकारी की इच्छा और जाग उठती है ।

1475 की शुरुआत से यूरोपीय देशों की नौसेना के उरुज को देखा गया. इसी सिलसिले मे वास्को डी गामा कप्पड़ पर कालीकट के निकट 20 मई 1498 ईस्वी को भारत में आया था और अमरीका की खोज क्रिस्टोफर कोलम्बस ने 12 अक्तुबर 1492 की थी. समुद्र रास्ते से दुनिया का चक्कर लगानेवाला पहला आदमी मैगलन बना था. और फिर इसके बाद शुरु हुआ योरप के साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का नंगा नाच जो आज तक जारी है। #29May1453