पश्चिमी यूपी की तीन सीटों पर बीजेपी का हाज़मा ख़राब करेगा आलू

पश्चिमी यूपी की तीन सीटों पर बीजेपी का हाज़मा ख़राब करेगा आलू

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Journalist Jafri

पहले चरण में पश्चिमी यूपी में कई ऐसी सीटें थी, जिनमें गन्ना के लिए भुगतान एक प्रमुख मसला था. गन्ना मिलों से समय से भुगतान न मिलने की वजह से किसान काफी नाराज थे. तो दूसरे चरण में होने वाले चुनाव में पश्चि‍मी यूपी की कम से कम चार ऐसी सीटें हैं, जहां आलू एक निर्णायक मसला बन सकता है. इनके अलावा तीसरे और चौथे चरण में भी तीन सीटों पर आलू एक प्रमुख मसला बन सकता है. दूसरे चरण में पश्चिमी यूपी में 8 लोकसभा सीटों पर चुनाव होना है.

दरअसल आलू की बेहद कम कीमत मिलने से किसान काफी नाराज हैं. पिछले तीन साल से लगातार आलू की वाजिब कीमत न मिलने से किसानों की हालत खराब है. आलू के मसले से प्रभावित होने वाली पश्चिमी यूपी की सात सीटें हैं- आगरा, फतेहपुर सीकरी, हाथरस, अलीगढ़, फिरोजाबाद, कन्नौज और फर्रूखाबाद. इनमें से पांच सीटों पर पिछली बार बीजेपी को जीत मिली थी. इसलिए सवाल यह उठा रहा है कि आलू के मसले पर किसानों की नाराजगी किसे नुकसान पहुंचाएगी. इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, आलू आगरा जिले की प्रमुख फसल है. साल 2017-18 के आंकड़ों के मुताबिक जिले में 57, 879 हेक्टेयर जमीन पर आलू का उत्पादन हुआ था, इसमें आगरा और फतेहपुर दोनों संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है. इसके अलावा हाथरस (46,333 हेक्टेयर) और अलीगढ़ (23,332 हेक्टेयर) में भी आलू का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. इन चारों सीटों पर दूसरे चरण में 18 अप्रैल को मतदान होना है.

इसके अलावा फिरोजाबाद (48,589 हेक्टेयर) कन्नौज (50,089 हेक्टेयर) और फर्रूखाबाद (35,168 हेक्टेयर) में भी बड़े पैमाने पर आलू का उत्पादन किया जाता है. फिरोजाबाद और कन्नौज में 23 अप्रैल को तथा फर्रूखाबाद में 29 अप्रैल को चुनाव होगा. आलू की कीमतें लागत से भी कम मिलने से किसान काफी नाराज हैं. सामान्य मोटा आलू के लिए किसानों को 50 किलो की बोरी के लिए सिर्फ 300-350 रुपये, गुल्ला आलू के लिए 200-250 रुपये और किर्री आलू के लिए 100 से 150 रुपये मिल रहे हैं. किसानों का कहना है कि नोटबंदी के बाद से ही आलू के ऐसे ही बेहद कम भाव मिल रहे हैं.

कृषि छेत्र से जुड़े लोगों की मानें तो आलू की बुवाई 15 अक्टूबर से 5 नवंबर के बीच तीन हिस्से में की जाती है और इसकी फसल 20 फरवरी से 10 मार्च के बीच मिलती है. आमतौर पर फसल तैयार होने के बाद किसान उसका करीब 20 फीसदी हिस्सा ही बेचते हैं ताकि मजदूरों का भुगतान कर सकें और अपने खर्चों के लिए कुछ पैसा बच सके. बाकी आलू वे कोल्ड स्टोरेज में रख देते हैं, जहां आलू को नवंबर अंत तक 2 से 4 डिग्री सेल्सियस तापमान में रखा जाता है.

किसानों का कहना है कि 8 नवंबर, 2016 से पहले आगरा के कोल्ड स्टोरेज में आलू की कीमत प्रति बोरी 600 से 700 रुपये मिल रही थी, लेकिन नोटबंदी के बाद कोल्ड स्टोरेज में माल पड़ा रह गया और कोई आलू खरीदने वाला नहीं था. मोटे आलू के लिए 100 से 125 रुपये प्रति बोरी मिल रहे थे, जबकि गुल्ला और किर्री आलू तो कोई मुफ्त में भी लेने को तैयार नहीं था. पिछले तीन फसली सीजन आलू के किसानों के लिए भयावह साबित हुए हैं. बाजार में न तो पैसा है और न ही उछाल है, इसलिए माल की निकासी भी नहीं हो रही.

किसानों के मुताबिक आलू पर लागत ही 475 से 500 रुपये प्रति बोरी तक आ जाती है, ऐसे में तीन साल से बेहद कम कीमत पर आलू बेचना उनके लिए भयावह साबित हो रहा है.