सेक्युलरिज़्म के झांसे मे बंटता मुस्लिम वोटर

सेक्युलरिज़्म के झांसे मे बंटता मुस्लिम वोटर

Posted by

Mohammed Yahya Saifi

सेक्युलरिज़्म के चक्कर मे और आरएसएस भाजपा के डर से हिंदुस्तान का मुस्लिम वोटर हर बार चुनाव हार जाता है इस बार भी हार तय है मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ों मे तथाकथित सेक्युलर पार्टियां मुस्लिम को अपना उम्मीदवार बनाती है और मुस्लिम वोटरस का बिखराव हो जाता है ऐसे मे उम्मीदवार तो हारते ही हैं बल्कि दुःखद ये के वोटर चुनाव हार जाता है और जिसका डर दिखाया जाता है वो बाज़ी मार ले जाता है

सेक्युलर ताक़तें नही चाहती कि मुस्लिम चुनकर संसद या विधानसभाओं मे जाएं वो अलग बात है कि बावजूद इसके इक्का दुक्का पहुंच जाएं । मुस्लिम वोट बेकार हो जाता है और हार के बाद पूरा पांच साल बिना क़यादत के डर डर के अपना वक़्त गुज़ारता है

मेनका गांधी ने सही कहा था कि अगर जीत मुसलमानो के बगैर हो गयी तो उसे अच्छा नही लगेगा क्योंकि जीत के बाद अगर मुसलमान काम के लिए आएगा तो कहीं न कहीं उसके दिल मे भी टीस तो रहेगी ही । अफ़सोस उसकी इस बात को सेक्युलर पार्टियों ने ग़लत रंग दिया और बेचारे मुसलमान सेक्यूलर पार्टियों की झूठी हमदर्दी के झांसे मे आकर अपना भविष्य ख़राब करने को तैयार हो जाते हैं

अगर ये सेक्युलर पार्टियां वाक़ई मुसलमानो की हमदर्द हैं तो जहां से एक मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है वहां से दूसरी पार्टी भी क्यों किसी मुस्लिम को ही अपना उम्मीदवार बनाती है ये सोचने की बात है मगर जिनका मक़सद ही मुसलमानो को सत्ता से दूर रखना है वो क्यों ये बात सोचेंगे ।

सबसे बड़ा बेवकूफ़ हिंदुस्तान का मुस्लिम वोटर है जो हर बार इन सेक्यूलर पार्टियों के झांसे मे आकर अपनी जीती हुई सीट हारने का काम ख़ुद अपने हाथों करता है सहारनपुर मेरठ मुरादाबाद देवबंद अलवर गुड़गांव जैसी कितनी ही सैंकड़ों सीट हम अपनी बेवकूफी से हारने वाले हैं ।

परिसीमन ऐसा किया जाता है कि मुसलमानों को कहीं का नही छोड़ा जाता मुस्लिम वोटर को ऐसा बांट दिया जाता है कि लाखों वोट होने के बावजूद मुस्लिम वोटर बे भाव हो जाते हैं अफ़सोस की फ़िर भी हमे ये बांटने वाली ताक़तें ही हमारी हमदर्दी का दम भरती हैं

परिसीमन के इस तरह बटवारे से बेहतर तो ये है कि मुसलमानों को चुनावों का ही बहिष्कार कर देना चाहिए ताकि हम मोहरे की तरह इस्तेमाल होने से बच जाएं और बिना बात की दुश्मनी से भी महफूज़ रहें ।।

मोहम्मद याहया सैफ़ी
अध्यक्ष : आल इंडिया सैफ़ी महासभा

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Ruby Arun
आजम खान मुझे कभी पसंद नहीं आए .
वह निहायत बददिमाग व्यक्ति हैं. जयाप्रदा के लिए उन्होंने जो भी अभद्र बातें कहीं हैं, उन्हें उस बात के लिए सजा मिलनी चाहिए ।

दुनिया यह जानती है की राजनीति में आजम खान ही जयाप्रदा को लेकर के आए थे और उन्होंने जयाप्रदा को भारतीय राजनीति में बहुत मजबूती से स्थापित किया। बाद में जयाप्रदा की निकटता अमर सिंह से हो गई और आजम खान को यह बात बेहद खल गई।
अमर सिंह जयाप्रदा और आजम खान के बीच इसी बात को लेकर के ज़हरीली भावनायें पनपीं। जिसकी वजह से समाजवादी पार्टी में भी खूब खिंचतान मची।
आजम खान की क्षुद्रता यह है कि वे निहायत निजी मसले को राजनीतिक रंग देने का गुनाह कर रहे हैं।

यहां खासकर अखिलेश यादव को चाहिए कि वे आजम खान की करतूत पर क्या राय रखते हैं और महिलाओं के सम्मान के मसले पर उनका नज़रिया क्या है, जनता के सामने स्पष्ट करें।

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