अब युवा तय करें कि उन्हें विकास चाहिए या विनाश : रोज़गार, अस्पताल, स्कूल चाहिए या संघ की शाखाएं

अब युवा तय करें कि उन्हें विकास चाहिए या विनाश : रोज़गार, अस्पताल, स्कूल चाहिए या संघ की शाखाएं

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भारत में आम चुनाव अपने दूसरे चरण में पहुंच गए हैं। राजनीतिक पार्टियां धीरे-धीरे और अधिक एक दूसरे पर हमलावर होती जा रही हैं। सबसे अहम बात यह है कि पार्टियां अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रही हैं और इस लड़ाई में देश की जनता के मुद्दे बहुत दूर छूटते जा रहे हैं।

भारत इस समय दुनिया का सबसे अधिक युवाओं वाला देश है इसलिए इस देश में युवाओं से जुड़े मुद्दे भी सबसे ज़्यादा हैं। भारत में बेरोज़गारी अपने चरम पर है, शैक्षिक संस्थाओं में लगातार अनियमितताएं बढ़ती जा रही है और सबसे ख़तरनाक बात जो है वह यह है कि इस देश के युवा जिनमें देश को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश बनाने की क्षमता है उन्हें कुछ चरमपंथी संस्थाएं अपने राजनीतिक लाभ के लिए ग़लत दिशा की ओर ढकेल रही हैं। आप अगर इस समय भारत में हो रहे आम चुनाव पर नज़र डालें तो स्वयं इस बात को आप महसूस करेंगे कि चुनावी मैदान में मौजूद पार्टियां इस देश के युवाओं के बारे में क्या सोच रही हैं? या केवल चुनावी रैलियों में नारा लगवाने और भीड़ ज़्यादा दिखाने के लिए देश के युवा को इस्तेमाल कर रही हैं। इस समय भारतीय युवा जिन्हें अपनी पढ़ाई, रोज़गार और अपने देश की उन्नति के बारे में अधिक सोचना चाहिए ऐसे समय में पार्टियां उन्हें धर्म, जाति और मंदिर-मस्जिद के मुद्दे पर बांट रही हैं।

रैलियों में युवाओं से यह सवाल पूछा जाता है कि आपको मंदिर चाहिए या मस्जिद, आपको राम चाहिए या रहमान, आपको हिन्दू राष्ट्र चाहिए या लोकतांत्रिक राष्ट्र, आपको युद्ध करने वाला चाहिए या शांति की बात करने वाला और तो और यह भी मालूम किया जाता है कि आपको अली चाहिए या बजरंगबली? क्या आपने कभी चुनावी रैलियों में किसी नेता को यह कहते सुना है कि आपको विश्वविद्यालय चाहिए या मंदिर-मस्जिद, आपको स्कूल चाहिए या संघ की शाखाएं, आपको अस्पताल चाहिए या पार्टी कार्यालय? इस समय भारत के युवा रोज़गार के लिए दर-दर भटक रहे हैं और राजनीतिक पार्टियां कुछ पैसों की लालच देकर उनका जमकर दुरुपयोग कर रही हैं, अगर यह युवा आज रोज़गार से होते, शिक्षित होते और धर्म के जाल में न फंसे होते तो मैं विश्वास से कह सकता हूं कि आज भारतीय राजनीति का अंदाज़ ही कुछ और होता और देश की जो स्थिति है वह ऐसी होती कि दुनिया भारत को सबसे अधिक हथियार ख़रीदने वाला देश से न जानकर सबसे अधिक उद्योग वाला देश जानती।

बहरहाल मुझे लगता है कि भारत के युवाओं में राजनीति को लेकर काफ़ी समझ आई है और वह अब समझने लगे हैं कि मंदिर-मस्जिद उनका मुख्य मुद्दा नहीं है। इस देश की युवा पीढ़ी इस बात को भली-भांति जानने लगी है कि आख़िर नेताओं के बच्चे देश की सीमा पर क्यों नहीं जाते? अब युवा यह कहने लगे हैं कि धर्म के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए बल्कि अगर भारत को महान देश बनाना है तो राजनीति को धर्म और युद्ध से दूर रखना होगा और देश को शिक्षा और उद्योग देना होगा। इस बार के चुनाव में देखना भी यही है कि आख़िर भारत के कितने प्रतिशत युवा देश को धर्म और जाति की राजनीति से निकालने में मदद करते हैं और विकास के लिए ऐसी सभी चीज़ों का विनाश करते हैं जो भारत को महान बनने से रोक रही है।

(रविश ज़ैदी)

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