दो साल में 50 लाख पुरुषों की नौकरियों गयीं, चुनाव में बेरोज़गारी सत्ताधारी पार्टी को नुक़सान पहुंचाएगी!

दो साल में 50 लाख पुरुषों की नौकरियों गयीं, चुनाव में बेरोज़गारी सत्ताधारी पार्टी को नुक़सान पहुंचाएगी!

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भारत में दो साल के भीतर 50 लाख पुरुषों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। यह ख़बर वैसे तो पूरे भारत के लिए चिंता का विषय है लेकिन सबसे ज़्यादा चिंता सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को होगी क्योंकि यह चुनाव का समय है और मोदी सरकार की साख दांव पर लगी हुई है।

सत्ता में आने से पहले भाजपा ने वादा किया था कि वह हर साल रोज़गार के 2 करोड़ अवसर उपलब्ध कराएगी।

ज़ाहिर है तीव्र गति से आगे बढ़ रही भारत की अर्थ व्यवस्था के लिए यह बहुत बड़ी जीत हो सकती थी कि हर साल 2 करोड़ रोज़गार सृजन हो क्योंकि कई देशों की तरह भारत के आर्थिक विकास की यह समस्या यह है कि अर्थ व्यवस्था का आकार तो बड़ा हो रहा है लेकिन नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं नतीजे में बेरोज़गारी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है।

भाजपा ने दो करोड़ नौकरियों का वादा करके आम नागरिकों के बीच जो उम्मीद की किरण जगाई थी वह पूरी तरह मायूसी में बदल चुकी है। इस बीच यह रिपोर्ट आ गई है कि 2 करोड़ लोगों को रोज़गार मिलना तो दरकिनार पिछले दो साल में 50 लाख पुरुषों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है।

बैंगलोर की अज़ीम प्रेमजी युनिवर्सिटी के स्थायी रोज़गार के केन्द्र की ओर से जारी अनुसंधान रिपोर्ट में चिंताजनक तथ्य तब सामने आए हैं जब भारत में चुनाव चल रहे हैं।

भारत की सरकारी पालीसी के थिंक टैंक नेशनल इंस्टीट्यूशन फ़ार ट्रान्सफ़ार्मिंग इंडिया के डिप्टी चेयरमैन राजीव कुमार का कहना है कि यह रिपोर्ट अभी पुष्ट नहीं है और इसके आंकड़ों की सच्चाई के बारे में कुछ मालूम नहीं है। लेकिन स्थायी रोज़गार केन्द्र की ओर से स्टेट आफ़ वर्किंग इंडिया 2019 रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 2011 के बाद से भारत में बेरोज़गारी में भारी वृद्धि हुई है।

सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार बेरोज़गार लोगों में अधिक संख्या युवाओं की है और उनमें वह युवा जो उच्च शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं ज़्यादा बेरोज़गार हैं। कम शिक्षित युवाओं में भी बेरोज़गारी बढ़ी है।

यह एक बड़ी समस्या है कि भारत में सरकारें भावनात्मक मुद्दे उठाकर धुव्रीकरण को अपनी चुनावी जीत का आसान रास्ता समझती हैं जबकि ज़मीन से जुड़े मुद्दों पर चुनाव लड़ना और चुनाव जीतने के बाद वादों को पूरा करना बड़ी चुनौती है।

अलबत्ता इस बार के चुनाव में यह बात देखने में आ रही है कि राजनेता राष्ट्रवाद, सीमाओं की रक्षा और सांप्रदायिक मुद्दे उठाने की कोशिश तो कर रहे हैं लेकिन जनता के बीच मुख्य बहस के रूप में इन मुद्दों को स्थान नहीं मिल पा रहा है। बेरोज़गारी का मुद्दा इस समय अधिक प्रखर रूप से उठ रहा है जिसका कारण यह है कि बेरोज़गारी का दंश आम जनमानस को बुरी तरह परेशान कर रहा है। देखना यह है कि इस स्थिति का चुनाव के परिणामों पर क्या प्रभाव पड़ता है?