“सत्ता की सूली” पाठकों से ज़यादा ख़ुफ़िया एजेंसियों को थी किताब की चिंता

“सत्ता की सूली” पाठकों से ज़यादा ख़ुफ़िया एजेंसियों को थी किताब की चिंता

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Mahendra Mishra
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16 अप्रैल यानी मंगलवार को अहमदाबाद में भी “सत्ता की सूली” का लोकार्पण संपन्न हो गया। लेकिन वहां जाने पर पता चला कि पाठकों से ज्यादा उसकी चिंता वहां की खुफिया एजेंसियों को थी। एक छोटे कार्यक्रम के लिए दो-दो जासूस लगा दिए गए थे। जो न केवल पूरे कार्यक्रम के दौरान बैठे रहे बल्कि अगर “दि टेलीग्राफ” के पूर्व अहमदाबाद ब्यूरो चीफ और अपने साथी बसंत रावत की मानें तो उन्होंने मेरे संबोधन की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भी की। कार्यक्रम के बाद वो कई लोगों से मेरी पहचान पूछते देखे गए।

एक साथी से पूछा कि वही जो ग्रे रंग की शर्ट पहना शख्स है वही महेंद्र मिश्रा है। तो उन्होंने उसको परेशान करने के लिहाज से कहा नहीं, जो पीले रंग की शर्ट पहने था और संचालन कर रहा था वो है। इस पर उन्होंने तपाक से जवाब दिया नहीं वह तो कलीम सिद्दीकी है उसको तो जानते हैं। उसके बाद गाड़ी पर बैठकर वहां से प्रस्थान करने तक उनकी निगाह मुझ पर बनी रही। वह बार-बार हमारे साथियों से पूछते हुए देखे गए कि आखिर किताब में है क्या? यहां तक कि एक शख्स खुद को पत्रिका का रिपोर्टर बताते हुए साथी मुजम्मिल को फोन किया। लेकिन पत्रकारों जैसी उसकी बातचीत न देखकर मुजम्मिल को तुंरत समझ में आ गया कि माजरा क्या है। लिहाजा उन्होंने भी उसे अपने तरीके से डील कर दिया।

दिन भर चली खुफिया एजेंसियों की यह हरकत किस अंजाम तक पहुंची उसका पता शाम को उस समय चला जब मेरे एक अभिन्न दोस्त ने बताया कि सीएम आफिस में भी किताब के विमोचन की चर्चा हो रही थी। दरअसल वह अपने किसी काम से गांधीनगर स्थित सीएम दफ्तर गए हुए थे। वहीं उनकी मुलाकात दफ्तर के अधिकारियों से हुयी। जहां एक अधिकारी ने उसके बारे में बताया।

वैसे तो दिल्ली में इस किताब का विमोचन हो गया था। लेकिन अहमदाबाद में कार्यक्रम का अपना महत्व था। क्योंकि अहमदाबाद इस पूरी कहानी की पैदाइशी जमीन रही है। वह सारी घटनाओं का साक्षी रहा है। लिहाजा किसी और से पहले विमोचन का पहला हक उसका बनता था। यह मौका इसलिए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था क्योंकि विमोचन स्थल सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक सभागार था। यह वह जगह थी जहां सरदार ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा बिताया था। बाद में उनकी बेटी और स्वतंत्रता सेनानी मणिबेन पटेल ने अपनी आखिरी सांस यहीं ली।

इस कार्यक्रम के जरिये न केवल किताब को उनका आशीर्वाद हासिल हुआ बल्कि उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक मौका भी साबित हुआ। इस मौके पर आए मेहमानों को तहेदिल से शुक्रिया। उन्होंने जो साहस दिखाया है वो बेमिसाल है। क्योंकि कई बड़े लोगों ने पहले विमोचन का आतिथ्य स्वीकार किया और फिर बीच में ही अपना नाम वापस ले लिया। लिहाजा इस मौके पर भाग लेने वाले सभी मेहमानों और श्रोताओं का दिल की गहराइयों से आभार। और खासकर जनचौक संवाददाता कलीम सिद्दीकी, साथी बसंत रावत और मुजम्मिल का विशेष तौर पर धन्यावद। जिनके प्रयास से ही पूरा कार्यक्रम संभव हुआ। कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट जनचौक संवाददाता कलीम सिद्दीकी अलग से देंगे।